चावंड शैली
चित्रकार – नसीरुद्दीन (निसरदी)
विषय – प्रताप के शाशनकाल में शुरू में एवं अमर सिंह के समय नसीरुद्दीन ने रागमाला ग्रन्थ चित्रित किया।
विशेष – आकाश को सर्पिला कार व् लहरिया दार तरंगित बादलों के रूप में प्रदर्शित किया।
Join ~ @OnlineNotesStore ❣️
चित्रकार – नसीरुद्दीन (निसरदी)
विषय – प्रताप के शाशनकाल में शुरू में एवं अमर सिंह के समय नसीरुद्दीन ने रागमाला ग्रन्थ चित्रित किया।
विशेष – आकाश को सर्पिला कार व् लहरिया दार तरंगित बादलों के रूप में प्रदर्शित किया।
Join ~ @OnlineNotesStore ❣️
👍2🏆1
बूंदी शैली
राव उम्मेदसिंह बूंदी शैली राजस्थान की विचारधारा का प्रारंभिक केंद्र था राव उम्मेदसिंह के समय बूंदी शैली का सर्वाधिक विकास हुआ।
इस शैली का राव उम्मेदसिंह द्वारा जंगली सूअर का शिकार करते हुए एक चित्र प्रसिद्ध है जिसका निर्माण 1750 ई में हुआ। इस शैली में शिकार के चित्र हरे रंग में बनाये गये है।
प्रमुख चित्र – पशु-पक्षी के चित्र, फल-फूलों के चित्र, रागमाला (सर्वाधिक प्रमुख चित्र), दरबार, घुड़दौड़, हाथियों की लड़ाई, बसंत रागिनी, बारहमासा, वासुकसज्जा नायिका।
पुरुष आकृति – पतला शरीर, बड़ी मूछें, झुकी पगड़ी।
स्त्री आकृति -आम के पत्तों जैसी आँखे, लाल चुनरी, लम्बी बाहें।
बूंदी शाली में लाल व पीले रंगों का प्रयोग सर्वाधिक किया गया है।
इस शैली में प्रमुखत: खजूर के वृक्ष को चित्रित किया गया है।
वर्षा में नाचता हुआ मोर राजस्थान की विशेषता है तथा यह क्षेत्र इसके लिए प्रसिद्ध है।
बूंदी शैली मुख्यतः मेवाड़ शैली से प्रभावित थी।
प्रमुख चित्रकार – राजा रामसिंह, राव गोपीनाथ, छत्रसाल और बिशनसिंह आदि ने बूंदी शैली को विशेष प्रोत्साहन दिया
बूंदी शैली में मुख्यतः बत्तख, हिरण व शेर जैसे पशुओं को चित्रित किया गया है।
Join ~ @OnlineNotesStore ❣️
राव उम्मेदसिंह बूंदी शैली राजस्थान की विचारधारा का प्रारंभिक केंद्र था राव उम्मेदसिंह के समय बूंदी शैली का सर्वाधिक विकास हुआ।
इस शैली का राव उम्मेदसिंह द्वारा जंगली सूअर का शिकार करते हुए एक चित्र प्रसिद्ध है जिसका निर्माण 1750 ई में हुआ। इस शैली में शिकार के चित्र हरे रंग में बनाये गये है।
प्रमुख चित्र – पशु-पक्षी के चित्र, फल-फूलों के चित्र, रागमाला (सर्वाधिक प्रमुख चित्र), दरबार, घुड़दौड़, हाथियों की लड़ाई, बसंत रागिनी, बारहमासा, वासुकसज्जा नायिका।
पुरुष आकृति – पतला शरीर, बड़ी मूछें, झुकी पगड़ी।
स्त्री आकृति -आम के पत्तों जैसी आँखे, लाल चुनरी, लम्बी बाहें।
बूंदी शाली में लाल व पीले रंगों का प्रयोग सर्वाधिक किया गया है।
इस शैली में प्रमुखत: खजूर के वृक्ष को चित्रित किया गया है।
वर्षा में नाचता हुआ मोर राजस्थान की विशेषता है तथा यह क्षेत्र इसके लिए प्रसिद्ध है।
बूंदी शैली मुख्यतः मेवाड़ शैली से प्रभावित थी।
प्रमुख चित्रकार – राजा रामसिंह, राव गोपीनाथ, छत्रसाल और बिशनसिंह आदि ने बूंदी शैली को विशेष प्रोत्साहन दिया
बूंदी शैली में मुख्यतः बत्तख, हिरण व शेर जैसे पशुओं को चित्रित किया गया है।
Join ~ @OnlineNotesStore ❣️
👍2🏆1
प्रतापगढ़ के बारे में
राजस्थान का 33वां जिला
निर्माण – 26 जनवरी 2008
समिति – परमेशचन्द्र समिति
5 तहसीलें – प्रतापगढ़, अरनोद, छोटीसादड़ी, धरियावद एवं पीपलखुंट
जाखम बांध जाखम नदी पर 81 मीटर की ऊंचाई पर बनाया गया है।
चित्तौड़गढ़ से—प्रतापगढ़, अरनोद, छोटी सादड़ी,
उदयपुर से—धारियावाद तथा
बाँसवाड़ा से- पीपलखूँट तहसीलें ली गई।
Join ~ @OnlineNotesStore ❣️
राजस्थान का 33वां जिला
निर्माण – 26 जनवरी 2008
समिति – परमेशचन्द्र समिति
5 तहसीलें – प्रतापगढ़, अरनोद, छोटीसादड़ी, धरियावद एवं पीपलखुंट
जाखम बांध जाखम नदी पर 81 मीटर की ऊंचाई पर बनाया गया है।
चित्तौड़गढ़ से—प्रतापगढ़, अरनोद, छोटी सादड़ी,
उदयपुर से—धारियावाद तथा
बाँसवाड़ा से- पीपलखूँट तहसीलें ली गई।
Join ~ @OnlineNotesStore ❣️
👍2🏆1
कन्हैया लाल सेठिया, कोमल कोठारी, डॉक्टर सीताराम लालम तथा विजयदान देथा के नाम पर घोषित पुरस्कार
कन्हैया लाल सेठिया, कोमल कोठारी, डॉक्टर सीताराम लालम तथा विजयदान देथा के नाम से नव घोषित पुरस्कारों के तहत 11 लाख की पुरस्कार राशि प्रदान की जाएगी।
नोडल एजेंसी – राजस्थान साहित्य अकादमी उदयपुर
प्रशासनिक विभाग – कला साहित्य, संस्कृति, पुरातत्व विभाग
पुरस्कारों की श्रेणियां विजयदान देथा साहित्य पुरस्कार – अनुसंधान तथा गद्य श्रेणी में
डॉक्टर सीताराम लालस आषा पुरस्कार – भाषा व अनुसंधान श्रेणी में
कोमल कोठारी लोक साहित्य पुरस्कार – लोक साहित्य या लोक श्रेणी में कन्हैयालाल सेठिया साहित्य पुरस्कार पद्म श्रेणी
Join ~ @OnlineNotesStore ❣️
कन्हैया लाल सेठिया, कोमल कोठारी, डॉक्टर सीताराम लालम तथा विजयदान देथा के नाम से नव घोषित पुरस्कारों के तहत 11 लाख की पुरस्कार राशि प्रदान की जाएगी।
नोडल एजेंसी – राजस्थान साहित्य अकादमी उदयपुर
प्रशासनिक विभाग – कला साहित्य, संस्कृति, पुरातत्व विभाग
पुरस्कारों की श्रेणियां विजयदान देथा साहित्य पुरस्कार – अनुसंधान तथा गद्य श्रेणी में
डॉक्टर सीताराम लालस आषा पुरस्कार – भाषा व अनुसंधान श्रेणी में
कोमल कोठारी लोक साहित्य पुरस्कार – लोक साहित्य या लोक श्रेणी में कन्हैयालाल सेठिया साहित्य पुरस्कार पद्म श्रेणी
Join ~ @OnlineNotesStore ❣️
🤔1🏆1
👉⏩ पुष्कर मृगवन
सन् 1985 में ऐतिहासिक, धार्मिक और पवित्र तीर्थस्थल पुष्कर के पास प्राचीन पचंकुण्ड के आसपास पहाड़ी क्षेत्र में यह मृगवन विकसित किया गया है। इसमें मृग, चिंकारा, नीलगाय एवं खरगोश प्रमुख रूप से रहते है।
👉⏩ अशोक विहार मगृवन
जयपुर शहर के हृदय स्थल सचिवालय के पीछे अशोक विहार के बीच 12 हैक्टेयर के एक भूखण्ड को अशोक विहार मृगवन के नाम से 1985 में विकसित किया गया है। इसके पास ही 7500 वर्ग मीटर में एक और क्षेत्र विकसित किया गया है। इसमें 24 हिरण तथा 8 चिंकारा संरक्षण हेतु छोडे़ गए है।
Join ~ @OnlineNotesStore ❣️
सन् 1985 में ऐतिहासिक, धार्मिक और पवित्र तीर्थस्थल पुष्कर के पास प्राचीन पचंकुण्ड के आसपास पहाड़ी क्षेत्र में यह मृगवन विकसित किया गया है। इसमें मृग, चिंकारा, नीलगाय एवं खरगोश प्रमुख रूप से रहते है।
👉⏩ अशोक विहार मगृवन
जयपुर शहर के हृदय स्थल सचिवालय के पीछे अशोक विहार के बीच 12 हैक्टेयर के एक भूखण्ड को अशोक विहार मृगवन के नाम से 1985 में विकसित किया गया है। इसके पास ही 7500 वर्ग मीटर में एक और क्षेत्र विकसित किया गया है। इसमें 24 हिरण तथा 8 चिंकारा संरक्षण हेतु छोडे़ गए है।
Join ~ @OnlineNotesStore ❣️
👍1🏆1
🎉 माचिया सफारी पार्क
जोधपुर से 5 किमी दूर कायलाना झील के पास यह 1985 में शुरू किया गया था। इसका क्षेत्रफल 600 हैक्टेयर में फैला है। इस सफारी पार्क में एक पुराना ऐतिहासिक माचिया दुर्ग, प्राचीन भवन भी विद्यमान है। यहाँ भेड़िया, लंगूर, सेही, खरगोश मरू बिल्ली, नीलगाय, काला हिरण, चिंकारा नामक वन्य जीव तथा अनेक पक्षी देखे जा सकते हैं।
☺️ चित्तौड़गढ़ मृगवन
चित्तौड़गढ़ दुर्ग के दक्षिणी छोर की प्राचीर के सहारे स्थित इस मृगवन की स्थापना 1969 में की गयी थी, इसमें खरगोश, नीलगाय, चीतल, चिंकारा एवं काला हिरण आदि वन्य जीव पाये जाते है। दो स्थानों पर पानी भरने हेतु जलाशय भी बनाये गये है।
Join ~ @OnlineNotesStore ❣️
जोधपुर से 5 किमी दूर कायलाना झील के पास यह 1985 में शुरू किया गया था। इसका क्षेत्रफल 600 हैक्टेयर में फैला है। इस सफारी पार्क में एक पुराना ऐतिहासिक माचिया दुर्ग, प्राचीन भवन भी विद्यमान है। यहाँ भेड़िया, लंगूर, सेही, खरगोश मरू बिल्ली, नीलगाय, काला हिरण, चिंकारा नामक वन्य जीव तथा अनेक पक्षी देखे जा सकते हैं।
☺️ चित्तौड़गढ़ मृगवन
चित्तौड़गढ़ दुर्ग के दक्षिणी छोर की प्राचीर के सहारे स्थित इस मृगवन की स्थापना 1969 में की गयी थी, इसमें खरगोश, नीलगाय, चीतल, चिंकारा एवं काला हिरण आदि वन्य जीव पाये जाते है। दो स्थानों पर पानी भरने हेतु जलाशय भी बनाये गये है।
Join ~ @OnlineNotesStore ❣️
👍2🏆1
मीणा जनजाति के नृत्य -
रसिया नृत्य - यह नृत्य युगल में रसिया गाते हुए किया जाता है।
सुगनी नृत्य - यह नृत्य युवक-युवतियों द्वारा श्रावण महीने में किया जाता है।
नेजा नृत्य - यह नृत्य युगल में किया जाता है।
Join ~ @OnlineNotesStore ❣️
रसिया नृत्य - यह नृत्य युगल में रसिया गाते हुए किया जाता है।
सुगनी नृत्य - यह नृत्य युवक-युवतियों द्वारा श्रावण महीने में किया जाता है।
नेजा नृत्य - यह नृत्य युगल में किया जाता है।
Join ~ @OnlineNotesStore ❣️
👍2
कंजर जनजाति के नृत्य -
मछली नृत्य - यह नृत्य घूमर का एक रूप है। यह स्त्रियों द्वारा किया जाता है।
चकरी/फूँदी नृत्य - यह नृत्य बूढी तीज 'कजली तीज' के अवसर पर बूंदी क्षेत्र में महिलाओं द्वारा ढप, ढोलक एवं मजीरा की लय पर किया जाता है। यह मुख्यत: अविवाहित लड़कियों द्वारा किया जाता है।
धाकड़ नृत्य - यह नृत्य पुरुषो द्वारा झाला पाव की विजय की ख़ुशी में युद्ध का अभिनय करते हुए किया जाता है।
Join ~ @OnlineNotesStore ❣️
मछली नृत्य - यह नृत्य घूमर का एक रूप है। यह स्त्रियों द्वारा किया जाता है।
चकरी/फूँदी नृत्य - यह नृत्य बूढी तीज 'कजली तीज' के अवसर पर बूंदी क्षेत्र में महिलाओं द्वारा ढप, ढोलक एवं मजीरा की लय पर किया जाता है। यह मुख्यत: अविवाहित लड़कियों द्वारा किया जाता है।
धाकड़ नृत्य - यह नृत्य पुरुषो द्वारा झाला पाव की विजय की ख़ुशी में युद्ध का अभिनय करते हुए किया जाता है।
Join ~ @OnlineNotesStore ❣️
👍3
संजय उद्यान मृगवन
यह उद्यान राष्ट्रीय राजमार्ग संख्या 8 पर शाहपुरा (जयपुर) के निकट पर लगभग 10 हैक्टेयर क्षेत्रफल में विकसित किया गया है। इस उद्यान में पर्यावरण संरक्षण की जानकारी देने हेतु ग्रामीण चेतना केन्द्र के रूप में विकसित किया गया है। इसमें चिंकारा, नीलगाय, चीतल आदि वन्य जीव मिलते है।
सज्जनगढ़ मृगवन
सन् 1984 में यह उदयपुर से 4 किलोमीटर दूर सज्जनगढ़ दुर्ग के पहाड़ी व तलहटी के 1.5 किलोमीटर क्षेत्र में मृग, चीतल, नीलगाय, चिंकारा व खरगोश के लिये यह मृगवन विकसीत किया गया है। इसमें भू एवं जल संरक्षण कार्य, पौधारोपण एंव बाड़बंदी कर प्राकृतिक क्षेत्रों को वन्य जीवों के उत्तम आवास के अनुरूप विकसित किया गया है।
अमृता देवी मृगवन
जोधपुर के समीप खेजड़ली में काला हिरण, चिंकारा, मरू लोमड़ी हेतु प्रसिद्व मृगवन है।
Join ~ @OnlineNotesStore ❣️
यह उद्यान राष्ट्रीय राजमार्ग संख्या 8 पर शाहपुरा (जयपुर) के निकट पर लगभग 10 हैक्टेयर क्षेत्रफल में विकसित किया गया है। इस उद्यान में पर्यावरण संरक्षण की जानकारी देने हेतु ग्रामीण चेतना केन्द्र के रूप में विकसित किया गया है। इसमें चिंकारा, नीलगाय, चीतल आदि वन्य जीव मिलते है।
सज्जनगढ़ मृगवन
सन् 1984 में यह उदयपुर से 4 किलोमीटर दूर सज्जनगढ़ दुर्ग के पहाड़ी व तलहटी के 1.5 किलोमीटर क्षेत्र में मृग, चीतल, नीलगाय, चिंकारा व खरगोश के लिये यह मृगवन विकसीत किया गया है। इसमें भू एवं जल संरक्षण कार्य, पौधारोपण एंव बाड़बंदी कर प्राकृतिक क्षेत्रों को वन्य जीवों के उत्तम आवास के अनुरूप विकसित किया गया है।
अमृता देवी मृगवन
जोधपुर के समीप खेजड़ली में काला हिरण, चिंकारा, मरू लोमड़ी हेतु प्रसिद्व मृगवन है।
Join ~ @OnlineNotesStore ❣️
👍3
भील जनजाति के नृत्य -
गवरी/राई नृत्य - यह नृत्य भीलों का धार्मिक नृत्य है। इसका सम्बन्ध पार्वती की पूजा से है। इस नृत्य का मुख्य पात्र शिव तथा पार्वती होते है। यह राजस्थान का सबसे प्राचीन लोक नाट्य है। इसे लोक नाट्यों का मेरुनाटय कहा जाता है।
नेजा नृत्य - यह नृत्य महिलाओं द्वारा होली के तीसरे दिन किया जाता है।
गैर नृत्य - यह नृत्य भील पुरुषों द्वारा होली के अवसर पर ढोल, मादल तथा थाली वाद्य के साथ किया जाता है। 'कनाणा' बाड़मेर का गैर नृत्य है।
द्विचक्री नृत्य - यह नृत्य युगल में दो अलग-अलग वृत्त बनाकर किया जाता है।
घूमरा/झूमर नृत्य - यह नृत्य महिलाओं द्वारा मांगलिक अवसरों पर ढोल एवं थाली वाद्य के साथ अर्द्धवृत्त में घूम-घूम कर किया जाता है।
हाथिमना नृत्य - यह नृत्य विवाह के अवसर बैठकर किया जाता है।
युद्ध नृत्य - यह नृत्य दो दल बनाकर तीर कमना, भाले, बरछी और तलवारें लेकर तालबद्ध तरिके से किया जाता है। इस नृत्य का रणघोष फाइरे-फाइरे होता है। इसका वाद्य यंत्र मादल होता है।
Join ~ @OnlineNotesStore ❣️
गवरी/राई नृत्य - यह नृत्य भीलों का धार्मिक नृत्य है। इसका सम्बन्ध पार्वती की पूजा से है। इस नृत्य का मुख्य पात्र शिव तथा पार्वती होते है। यह राजस्थान का सबसे प्राचीन लोक नाट्य है। इसे लोक नाट्यों का मेरुनाटय कहा जाता है।
नेजा नृत्य - यह नृत्य महिलाओं द्वारा होली के तीसरे दिन किया जाता है।
गैर नृत्य - यह नृत्य भील पुरुषों द्वारा होली के अवसर पर ढोल, मादल तथा थाली वाद्य के साथ किया जाता है। 'कनाणा' बाड़मेर का गैर नृत्य है।
द्विचक्री नृत्य - यह नृत्य युगल में दो अलग-अलग वृत्त बनाकर किया जाता है।
घूमरा/झूमर नृत्य - यह नृत्य महिलाओं द्वारा मांगलिक अवसरों पर ढोल एवं थाली वाद्य के साथ अर्द्धवृत्त में घूम-घूम कर किया जाता है।
हाथिमना नृत्य - यह नृत्य विवाह के अवसर बैठकर किया जाता है।
युद्ध नृत्य - यह नृत्य दो दल बनाकर तीर कमना, भाले, बरछी और तलवारें लेकर तालबद्ध तरिके से किया जाता है। इस नृत्य का रणघोष फाइरे-फाइरे होता है। इसका वाद्य यंत्र मादल होता है।
Join ~ @OnlineNotesStore ❣️
👍1
सहरिया जनजाति के नृत्य -
स्वांग नृत्य - यह नृत्य होली के अवसर पर पुरुषो द्वारा किया जाता है।
शिकारी नृत्य - यह नृत्य पुरुषों शिकार का अभिनय करते हुए किया जाता है।
इंद्रपुरी नृत्य - यह नृत्य पुरुषो द्वारा इंद्रपुरी के स्वांग के रूप में किया जाता है।
लहँगी नृत्य - यह नृत्य पुरुषों द्वारा किया जाता है।
झेला नृत्य - यह नृत्य युगल में गायन के साथ किया जाता है।
बेडिनी नृत्य - यह नृत्य पुरुषो द्वारा किया जाता है।
Join ~ @OnlineNotesStore ❣️
स्वांग नृत्य - यह नृत्य होली के अवसर पर पुरुषो द्वारा किया जाता है।
शिकारी नृत्य - यह नृत्य पुरुषों शिकार का अभिनय करते हुए किया जाता है।
इंद्रपुरी नृत्य - यह नृत्य पुरुषो द्वारा इंद्रपुरी के स्वांग के रूप में किया जाता है।
लहँगी नृत्य - यह नृत्य पुरुषों द्वारा किया जाता है।
झेला नृत्य - यह नृत्य युगल में गायन के साथ किया जाता है।
बेडिनी नृत्य - यह नृत्य पुरुषो द्वारा किया जाता है।
Join ~ @OnlineNotesStore ❣️
👍2
राजस्थान के प्रमुख जनजातीय नृत्य
गरासिया जनजाति के नृत्य -
गौर नृत्य - यह नृत्य युगल में गणगौर के अवसर पर गौरजा वाद्य यंत्र के साथ किया जाता है।
वालर नृत्य - यह नृत्य युगल में गीत की लय के साथ पद संचालित करते हुए किया जाता है। इस नृत्य में वाद्य यंत्र का प्रयोग नहीं किया जाता है।
गर्वा नृत्य - यह नृत्य महिलाओं द्वारा किया जाता है।
कूद नृत्य - यह नृत्य युगल में बिना वाद्य यंत्र के पंक्तिबद्ध होकर किया जाता है।
जवारा नृत्य - यह नृत्य युगल में होली दहन के पूर्व उसके चारों ओर घेरा बनाकर ढोल के गहरे घोष के साथ किया जाता है।
लूर नृत्य - यह नृत्य महिलाओं द्वारा वर पक्ष द्वारा वधु पक्ष से रिश्ते की मांग के समय किया जाता है।
मोरिया नृत्य - यह नृत्य पुरुषों द्वारा विवाह के अवसर पर गणपति स्थापना के बाद रात में किया जाता है।
मांदल नृत्य - यह नृत्य महिलाओं द्वारा थाली एवं बांसुरी के साथ किया जाता है।
रायण नृत्य - यह नृत्य पुरुषों द्वारा मांगलिक अवसरों पर किया जाता है।
गरबा नृत्य - यह महिलाओं द्वारा किया जाता है।
Join ~ @OnlineNotesStore ❣️
गरासिया जनजाति के नृत्य -
गौर नृत्य - यह नृत्य युगल में गणगौर के अवसर पर गौरजा वाद्य यंत्र के साथ किया जाता है।
वालर नृत्य - यह नृत्य युगल में गीत की लय के साथ पद संचालित करते हुए किया जाता है। इस नृत्य में वाद्य यंत्र का प्रयोग नहीं किया जाता है।
गर्वा नृत्य - यह नृत्य महिलाओं द्वारा किया जाता है।
कूद नृत्य - यह नृत्य युगल में बिना वाद्य यंत्र के पंक्तिबद्ध होकर किया जाता है।
जवारा नृत्य - यह नृत्य युगल में होली दहन के पूर्व उसके चारों ओर घेरा बनाकर ढोल के गहरे घोष के साथ किया जाता है।
लूर नृत्य - यह नृत्य महिलाओं द्वारा वर पक्ष द्वारा वधु पक्ष से रिश्ते की मांग के समय किया जाता है।
मोरिया नृत्य - यह नृत्य पुरुषों द्वारा विवाह के अवसर पर गणपति स्थापना के बाद रात में किया जाता है।
मांदल नृत्य - यह नृत्य महिलाओं द्वारा थाली एवं बांसुरी के साथ किया जाता है।
रायण नृत्य - यह नृत्य पुरुषों द्वारा मांगलिक अवसरों पर किया जाता है।
गरबा नृत्य - यह महिलाओं द्वारा किया जाता है।
Join ~ @OnlineNotesStore ❣️
👍3
राजस्थान के प्रमुख जातीय लोकनृत्य
कालबेलिया जाति के नृत्य -
कालबेलिया नृत्य - यह नृत्य महिलाओं द्वारा गीत गाने के साथ किया जाता है। यह सपेरों का प्रसिद्ध नृत्य है। कालबेलिया नृत्य को वर्ष 2010 में यूनेस्को द्वारा अमूर्त विरासत सूची में शामिल किया गया।
शंकरिया नृत्य - यह नृत्य युगल में प्रेम कहानी के साथ किया जाता है। इसकी प्रसिद्ध नृत्यांगना गुलाबो है।
बांगड़िया नृत्य - यह नृत्य स्त्रियों द्वारा भीख मांगते वक्त चंग वाद्य यंत्र के साथ किया जाता है।
पणिहारी नृत्य - यह नृत्य युगल में पणिहारी गीत के साथ करते है।
इण्डोणी नृत्य - यह नृत्य युगल में इण्डोणी की तरह गोल घेरे में पूंगी तथा खंजरी वाद्य यंत्र के साथ किया जाता है।
Join ~ @OnlineNotesStore ❣️
कालबेलिया जाति के नृत्य -
कालबेलिया नृत्य - यह नृत्य महिलाओं द्वारा गीत गाने के साथ किया जाता है। यह सपेरों का प्रसिद्ध नृत्य है। कालबेलिया नृत्य को वर्ष 2010 में यूनेस्को द्वारा अमूर्त विरासत सूची में शामिल किया गया।
शंकरिया नृत्य - यह नृत्य युगल में प्रेम कहानी के साथ किया जाता है। इसकी प्रसिद्ध नृत्यांगना गुलाबो है।
बांगड़िया नृत्य - यह नृत्य स्त्रियों द्वारा भीख मांगते वक्त चंग वाद्य यंत्र के साथ किया जाता है।
पणिहारी नृत्य - यह नृत्य युगल में पणिहारी गीत के साथ करते है।
इण्डोणी नृत्य - यह नृत्य युगल में इण्डोणी की तरह गोल घेरे में पूंगी तथा खंजरी वाद्य यंत्र के साथ किया जाता है।
Join ~ @OnlineNotesStore ❣️
👍6❤1
संगीत जीवी जातियाँ
👇👇👇👇👇👇👇👇
कूलावत – जयपुर में निवास करने वाली संगीत जीवी जाति जो अपना संबंध तानसेन से जोडते है। नाम के साथ सेन लगाने है।
जयपुर के जमाल/जमील सेन ने वंदे मातरम् की धुन तैयार की।
ढाढी−राजस्थान की संगीत जीवी जाति जो मध्यकाल में युद्ध के मैदान मे अपने गायन द्वारा सैनिको का उत्साह बढाते थे।
ढाढी – ढोलामारू गीत के लिये जाने जाते हे।
राज्य के जैसलमेर और बाड़मेर में अधिक पाए जाने वाले ढाढी कलाकारों को अब मांगणियार के नाम से अधिक जाना जाता है। पश्चिमी राजस्थान के ये कलाकार जहां एक ओर नमाज अदा करते हैं, वहीं देवी-देवताओं को भी उसी आस्था से मानते हैं। ये कलाकार कमायचा, खड़ताल, सुरणाई, आदि लोकवाद्य बजाते हैं।
राणा− मध्यकाल में युद्ध के मैदान में सैनिको के उत्साहवर्धन हेतु नगाडा बजाने का काम करते थे।
Join ~ @OnlineNotesStore ❣️
👇👇👇👇👇👇👇👇
कूलावत – जयपुर में निवास करने वाली संगीत जीवी जाति जो अपना संबंध तानसेन से जोडते है। नाम के साथ सेन लगाने है।
जयपुर के जमाल/जमील सेन ने वंदे मातरम् की धुन तैयार की।
ढाढी−राजस्थान की संगीत जीवी जाति जो मध्यकाल में युद्ध के मैदान मे अपने गायन द्वारा सैनिको का उत्साह बढाते थे।
ढाढी – ढोलामारू गीत के लिये जाने जाते हे।
राज्य के जैसलमेर और बाड़मेर में अधिक पाए जाने वाले ढाढी कलाकारों को अब मांगणियार के नाम से अधिक जाना जाता है। पश्चिमी राजस्थान के ये कलाकार जहां एक ओर नमाज अदा करते हैं, वहीं देवी-देवताओं को भी उसी आस्था से मानते हैं। ये कलाकार कमायचा, खड़ताल, सुरणाई, आदि लोकवाद्य बजाते हैं।
राणा− मध्यकाल में युद्ध के मैदान में सैनिको के उत्साहवर्धन हेतु नगाडा बजाने का काम करते थे।
Join ~ @OnlineNotesStore ❣️
👍5
• सलीम सागर व सूरजकुंड जल तड़ाग अवस्थित हैं –
(VDO pre 2021 , सांख्यिकी अधिकारी 2021)
— बाला किला, अलवर में
• हसन खां मेवाती ने 1550 ई. में बनवाया था।
• आंख वाला किला (प्राचीर में गोले लगने से बने छेदों के कारण)
• बाला यानि कुंवारा किला भी कहते हैं
• यहां मुगल बादशाह बाबर भी एक रात के लिए ठहरा था ।
• शेरशाह के सेनापति हकीम हाजी खां ने बाला किले में सलीम सागर बनवाया।
Join ~ @OnlineNotesStore ❣️
(VDO pre 2021 , सांख्यिकी अधिकारी 2021)
— बाला किला, अलवर में
• हसन खां मेवाती ने 1550 ई. में बनवाया था।
• आंख वाला किला (प्राचीर में गोले लगने से बने छेदों के कारण)
• बाला यानि कुंवारा किला भी कहते हैं
• यहां मुगल बादशाह बाबर भी एक रात के लिए ठहरा था ।
• शेरशाह के सेनापति हकीम हाजी खां ने बाला किले में सलीम सागर बनवाया।
Join ~ @OnlineNotesStore ❣️
👍5
🏆नो बैग डे के दिन स्कूलों में पढ़ाया जाएगा सविधान का पाठ💐
💥स्कूलों में इसकी शुरुआत 15 जुलाई से होगी
👉 @OnlineNotesStore 🙏
💥स्कूलों में इसकी शुरुआत 15 जुलाई से होगी
👉 @OnlineNotesStore 🙏
👍9
Be Ready For Sanskrit Education Third Grade Recruitment
@OnlineNotesStore
सबसे ज्यादा पद गणित–विज्ञान के होंगे।
@OnlineNotesStore
सबसे ज्यादा पद गणित–विज्ञान के होंगे।
👍7
10 हजार पदों पर व्याख्याता भर्ती परीक्षा होगी एवं 8000 पदों पर द्वितीय श्रेणी शिक्षक भर्ती परीक्षा होगी।
विस्तृत अधिसूचना जुलाई के अंतिम सप्ताह या अगस्त के प्रथम वीक में हो सकती जारी।
विस्तृत अधिसूचना जुलाई के अंतिम सप्ताह या अगस्त के प्रथम वीक में हो सकती जारी।
👍2
🧶 Chronology 🤩
💥 जुलाई, 2023 💫
✍ Click Here 🥳
╭─❀⊰╯टेलीग्राम पर जुड़े 👇
🥇 @Latest_Jobs_News ───────────────────━❥
💥 जुलाई, 2023 💫
✍ Click Here 🥳
╭─❀⊰╯टेलीग्राम पर जुड़े 👇
🥇 @Latest_Jobs_News ───────────────────━❥
👍2