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Hello gyusss
पाँच साल की बेटी बाज़ार में गोल गप्पे खाने के लिए मचल गई। 🍥🌏 “किस भाव से दिए भाई?” पापा नें सवाल् किया। “10 रूपये के 8 दिए हैं। गोल गप्पे वाले ने जवाब दिया…… पापा को मालूम नहीं था गोलगप्पे इतने महँगे हो गये है….जब वे खाया करते थे तब तो एक रुपये के 10 मिला करते थे। . पापा ने जेब मे हाथ डाला 15 रुपये बचे थे। बाकी रुपये घर की जरूरत का सामान लेने में खर्च हो गए थे। उनका गांव शहर से दूर है 10 रुपये तो बस किराए में लग जाने है। “नहीं भई 5 रुपये में 10 दो तो ठीक है वरना नही लेने।

यह सुनकर बेटी नें मुँह फुला लिया…. “अरे अब चलो भी , नहीं लेने इतने महँगे। पापा के माथे पर लकीरें उभर आयीं …. “अरे खा लेने दो ना साहब… अभी आपके घर में है तो आपसे लाड़ भी कर सकती है… कल को पराये घर चली गयी तो पता नहीं ऐसे मचल पायेगी या नहीं. … तब आप भी तरसोगे बिटिया की फरमाइश पूरी करने को… गोलगप्पे वाले के शब्द थे तो चुभने वाले पर उन्हें सुनकर पापा को अपनी बड़ी बेटी की याद आ गयी….

जिसकी शादी उसने तीन साल पहले
एक खाते -पीते पढ़े लिखे परिवार में की थी……

उन्होंने पहले साल से ही उसे छोटी
छोटी बातों पर सताना शुरू कर दिया था…..

दो साल तक वह मुट्ठी भरभर के
रुपये उनके मुँह में ठूँसता रहा पर
उनका पेट बढ़ता ही चला गया ….

और अंत में एक दिन सीढियों से
गिर कर बेटी की मौत की खबर
ही मायके पहुँची….

आज वह छटपटाता है
कि उसकी वह बेटी फिर से
उसके पास लौट आये..?
और वह चुन चुन कर उसकी
सारी अधूरी इच्छाएँ पूरी कर दे…

पर वह अच्छी तरह जानता है
कि अब यह असंभव है.
“दे दूँ क्या बाबूजी

गोलगप्पे वाले की आवाज से
पापा की तंद्रा टूटी…

“रुको भाई दो मिनिट ….
पापा पास ही पंसारी की दुकान थी उस पर गए जहाँ से जरूरत का सामान खरीदा था। खरीदी गई पाँच किलो चीनी में से एक किलो चीनी वापस की तो 40 रुपये जेब मे बढ़ गए।

फिर ठेले पर आकर पापा ने डबडबायी आँखें
पोंछते हुए कहा
अब खिलादे भाई। हाँ तीखा जरा कम डालना। मेरी बिटिया बहुत नाजुक है….
सुनकर पाँच वर्ष की गुड़िया जैसी बेटी की आंखों में चमक आ गई और पापा का हाथ कस कर पकड़ लिया।

जब तक बेटी हमारे घर है
उनकी हर इच्छा जरूर पूरी करे,…👏👏

क्या पता आगे कोई इच्छा
पूरी हो पाये या ना हो पाये ।

ये बेटियां भी कितनी अजीब होती हैं
जब ससुराल में होती हैं
तब माइके जाने को तरसती हैं….

सोचती हैं
कि घर जाकर माँ को ये बताऊँगी
पापा से ये मांगूंगी
बहिन से ये कहूँगी
भाई को सबक सिखाऊंगी
और मौज मस्ती करुँगी…

लेकिन

जब सच में मायके जाती हैं तो
एकदम शांत हो जाती है
किसी से कुछ भी नहीं बोलती….

बस माँ बाप भाई बहन से गले मिलती है।
बहुत बहुत खुश होती है।
भूल जाती है
कुछ पल के लिए पति ससुराल…..

क्योंकि
एक अनोखा प्यार होता है मायके में
एक अजीब कशिश होती है मायके में…..
ससुराल में कितना भी प्यार मिले…..

माँ बाप की एक मुस्कान को
तरसती है ये बेटियां….

ससुराल में कितना भी रोएँ
पर मायके में एक भी आंसूं नहीं
बहाती ये बेटियां….

क्योंकि
बेटियों का सिर्फ एक ही आंसू माँ
बाप भाई बहन को हिला देता है
रुला देता है…..

कितनी अजीब है ये बेटियां
कितनी नटखट है ये बेटियां
भगवान की अनमोल देंन हैं
ये बेटियां ……

हो सके तो
बेटियों को बहुत प्यार दें
उन्हें कभी भी न रुलाये
क्योंकि ये अनमोल बेटी दो
परिवार जोड़ती है
दो रिश्तों को साथ लाती है।
अपने प्यार और मुस्कान से।

हम चाहते हैं कि
सभी बेटियां खुश रहें
हमेशा भले ही हो वो
मायके में या ससुराल में।

●●●●●●●●
खुशकिस्मत है वो
जो बेटी के बाप हैं,
●●●●●●●●●
#अपनी_कलम_से ✍️🌻
एक बार राजा ने खुश होकर लोहार को चंदन का बाग भेंट कर दिया।

लोहार को चंदन के पेड़ की उपयोगिता और कीमत का अंदाजा नहीं था इसलिए उसने पेड़ो को काटकर उन्हें जलाकर उसका कोयला बना कर बेचना शुरू कर दिया।

ऐसा करते-करते, धीरे-धीरे सारा बाग खाली हो गया।

एक दिन राजा घुमते हुए लोहार के घर के बाहर से गुजर रहे थे तो राजा ने सोचा अब तो लोहार चंदन बेच-बेचकर बहुत अमीर हो गया होगा। प्रत्यक्ष देखने पर लोहार कि स्थिति जैसे की तैसी पहले जैसी नजर आई यह देखकर राजा को आश्चर्य हुआ। राजा के मुँह से अनायास निकला यह कैसे हो सकता है? राजा ने सच का पता लगाया तो पाया चंदन तो कोयला हो गया।

तब राजा ने लोहार से पूछा- तेरे पास एकाध लकडी बाकी है या सबका कोयला बना दिया लोहार के पास मात्र कुल्हाडी में लगे चंदन के बेट के अलावा कुछ भी नहीं था वह लाकर राजा को दे दिया।

राजा ने लोहार को कुल्हाड़ी का बेट लेकर चंदन के व्यापारी के पास भेज दिया वहाँ जाकर लोहार को कुल्हाड़ी के बेट के बदले बहुत सारे पैसे मिल गये यह देखकर लोहार की आंखो मे आसू आ गये वह बहुत रोने लगा फिर उसने रोते हुए आँसू पोछकर राजा से और एक बाग देने की विनती की। तब राजा ने उसे कहा ऐसी भेंट बार-बार नहीं, एक ही बार मिलती है।

SC, ST, OBC के लिये संविधान प्रदत्त अधिकार चंदन के बाग की भेंट कि तरह है। इन्हें सस्ते राशन, गैस, बाथरूम एवं चन्द आर्थिक सहायता में बेचा जा रहा है।

अगर संविधान प्रदत्त अधिकारों का संरक्षण ठीक से नहीं किया गया तो हम सब की हालत उस लोहार जैसी हो जाऐगी।

इसलिए समय रहते ही सावधान हो जाएँ और अपने संवैधानिक अधिकारों का मूल्य पहचान कर उनकी रक्षा करें।
0763
और चांद मुस्कुरा दिया (कहानी)

दिनकर बाबा आज कुछ ज्यादा ही थक गए थे, इसीलिए आराम फरमाने के लिए धरती की गोद में सरकते चले जा रहे थे । संध्या ने अपनी गुलाबी चुनरी को चारों ओर फैला दिया था । दिन भर काम से थके लोग भी अब थोड़े आराम की चाह में अपने अपने घरों को जा रहे थे । हर किसी के झोले में कुछ ना कुछ ज़रूर था । किसी ने 400 की देहाड़ी में से 20 रुपए की खुशियां खरीद ली थीं, अपने बच्चों के लिए, तो कोई स्वार्थी अपनी थकान का बहाना बना कर ठेके की तरफ घर का कलेश खरीदने निकल पड़ा था, किसी ने बूढ़े पिता के लिए आज बुखार के तीसरे दिन कोई एक ज़रुरत मार कर दवाइयां ले ली थीं, तो किसी ने राशन का सामान खरीद लिया था ।

मगर इन्हीं जैसों में से एक हरिराम आज फिर अपने झोले में सिर्फ मायूसी बटोरे जा रहा था । आज चौथे दिन भी मज़दूर यूनियन की हड़ताल ना टूटी थी । गेहूं ख़ुशी से पिस रहा था, क्योंकि वो जनता था कि आंटा बन कर महंगे दाम में बिक जायेगा मगर हरिराम जैसे घुन तो बेकार में ही पीसे जा रहे थे । मगर करते भी क्या आखिर थे तो घुन ही ना । वही ठेके का काम, वही रोज़ की देहाड़ी । मगर चार दिन से ये देहाड़ी भी बंद थी । पिछला राशन दो दिन तो भूखे पेट की आग को थोड़ा शांत कर गया मगर बाक़ी के दो दिन पहाड़ लग रहे थे । रोज़ इस आस में घर से जाता कि आज हड़ताल टूटेगी, आज कोई काम मिल जायेगा मगर रोज़ निराशा के सिवा और कुछ हाथ नहीं लगता था ।

“नुनुआ की माँ ।” अपने क्वाटर के बाहर छोटे से बरामदे में बिछी टाट पर बैठते हुए हरिराम ने थके हुए स्वर में अपनी पत्नी को पुकारा ।

“आज भी नहीं टूटा ना हड़ताल ?” अन्दर से लोटा में पानी लिए संतोषी आई ।

“कैसे जान जाती हो बिना कहे ही सब बात ?” हरिराम ने लोटा पकड़ते हुए कुछ पल को मायूसी चेहरे से उतार कर उसकी जगह मुस्कराहट सजाते हुए कहा ।

“दस बरस हो गए हैं जी, अब तो आपके बुलाने से ही समझ आ जाता है कि बात खुसी का है या दुखी का ।” पास पड़े गत्ते के टुकड़े को हाथ पंखा बना कर हरिराम को हवा देते हुए संतोषी बोली ।

“रहने दो अब गरम नहीं लगता है, मौसम ठंढाने लगा है ।” मौसम में ठण्ड की आहट महसूस होते ही गरीब का कलेजा एक पल के लिए धक से रह जाता है ये सोच कर कि ठण्ड आ रही है, पता नहीं कैसे समय कटेगा ।

“नहीं तो, अभी कहाँ ठंढा आया है, छठ बाद ठंढा पड़ता है । देखिए आपको पसेना आ रहा है ।” संतोषी ने मन में ठान ही लिया था कि दिसंबर के अंत से पहले वो मानेगी ही नहीं कि ठण्ड पड़ने लगी है । अगर वो ना मानती तो हरिराम को इस तंग हाली में ओढना बिछौना का चिंता भी खाने लगता और वो ऐसा कभी नहीं चाहती थी ।

“आज भी हड़ताल नहीं टूटा । बड़का सब अपना काम अच्छा से चला ही रहा है मगर हम जैसा गरीब सब को सौ रुपैया रोज बढ़ने के नाम पर ई पांच पांच दिन भूखे मार रहा है ।

“अरे आप बेकार का चिंता करते हैं जी, हम मंगला के इहाँ से आंटा ले आये हैं । उसको कोटा में से गहूम मिल जाता है ना तो उसके पास आंटा था । बिहान तक काम चल जायेगा । आप देखिएगा बिहान हड़तालो टूट जाएगा । फिर सब ठीक हो जायेगा ।” हमेशा ही संतोषी की बोली हरिराम के शरीर का सारा थकान निचोड़ लेती है । उसको अपना मन शांत करने के लिए बस संतोषी को एक टक ताकते रहने भर की ज़रुरत ही होती है ।

हरिराम ने अपनी सारी चिंता को किनारे रख कर संतोषी की ओर देखते हुए बड़े शरारती लहज़े में कहा “तुम बोलती बहुते अच्छा हो नुनुआ की माँ ।”

“आपका भी नहीं बुझाता, अभिये केतना टेंसन में थे आ अभिये कईसे बोल रहे हैं ।” संतोषी शर्मा गयी थी ।

हरिराम कुछ और भी कहता मगर तब तक नुनुआ आगया था । फिर संतोषी खाना बनाने चली गयी । रात के समय नुनुआ को खिला कर संतोषी ने हरिराम के लिए खाना परोसा । रोटी और नमक और सूखी मिर्च की चटनी हरिराम के आगे परोस दी संतोषी ने ।

“दाल हम नुनुआ को खिला दिए, आज भर खा लीजिए कल सब ठीक हो जायेगा ।” संतोषी कितनी आशावादी है ये सोच कर हरिराम गहरे से मुस्कुरा दिया ।

“कल क्या होगा वो छोड़ो, आओ पहले खाना खा लें ।”

“अरे आप खाइए ना, हम बर्तन मांज कर खा लेंगे ।” संतोषी ने हरिराम की बात को टालते हुए कहा ।

“बचा होगा तब ना खाओगी, हम जानते हैं इतना ही रोटी बनाई हो और बांकी का कल के लिए बचा ली हो । अब चुप चाप खा लो ।” संतोषी अपनी चोरी पकड़े जाने पर झेंप गयी । दोनों ने साथ साथ खाना खा लिया । पेट भले ही दोनों का ना भरा हो मगर खाने में प्यार की मात्र इतनी थी कि दोनों का मन ज़रूर भर गया । कल कुछ अच्छा होगा इस उम्मीद के साथ दोनों एक दुसरे की तरफ़ देख कर मुस्कुराते हुए सपनों की दुनिया घूमने निकल पड़े ।

अगले दिन सुबह के चार बजे

बर्तनों की आवाज़ से हरिराम की नींद खुल गयी । उसने बिस्तर पर देखा तो संतोषी नहीं थी । “अभी तो दिन भी नहीं चढ़ा फिर संतोषी काहे उठ गयी।" हरिराम भी बिस्तर से उठ गया । बाहर जा कर देखा तो संतोषी के हाथ में गुड़ का एक टुकड़ा था जिसके साथ वो पानी पी रही थी ।
“कहे थे थोड़ा और खा लो हमारी रोटी में से बात नहीं मानी, अब देखो खाली गुड़ का डिब्बा झाड़ कर खा रही हो ।” हरिराम ने संतोषी से मजाक करते हुए कहा ।

“नहीं भूख थोड़े ना लगा है । ऊ आज दिन में पानी नहीं ना पीना है इसीलिए अभी पानी पी रहे थे । भोरे भोरे खली पानी नहीं घोंटा रहा था तो गुड़ वाला डिब्बा झाड़ लिए ।” अपनी बात बताते हुए संतोषी के चेहरे पर पांच साल की बच्ची जैसी मासूमियत झलक रही थी ।

“कहे आज पानी कहे नहीं पीओगी ?”

“ऊ आज, करवाचौथ का पबनी है ना इसीलिए ।” संतोषी व्रत की बात बताते हुए शर्मा गयी ।

“अरे ई सब कबसे करने लगी तुम । चार दिन से तो पबनीये कर रही हो तब इसका क्या जरूरत है बताओ । वैसे भी तुम हमारे साथ हो ना हमको कुछो नहीं होगा । ई सब बड़ा लोग का बात है पगली ।” हरिराम ने संतोषी को समझाते हुए कहा ।

“नहीं जी ऐसा नहीं बोलिए, ई सब अपना संतोस का बात होता है । जब तक हम नहीं जानते थे हम नहीं किए लेकिन अब सब औरत लोग करती है तो हमको भी करना है । सब अपना पति से प्रेम करती है तो रखती है, तो सोचो हम तो आपसे बहुते जादा.....” इस से आगे संतोषी शर्मा गयी के चुप हो गयी ।

“हम जानते हैं तुम हमसे बहुत प्रेम करती हो मगर.....”आगे कुछ बोलने से पहले संतोषी ने अपनी ऊँगली हरिराम के होंठों पर रख दी । हरिराम बेचारा पत्नी की जिद के आगे मुस्कुराने के सिवा और कुछ नहीं कर पाया ।

आज हड़ताल टूट जाएगी इस आस में हरिराम काम पर जाने के लिए निकलने लगा तो संतोषी ने उसे टोका “अरे दू ठो रोटी खा लीजिए तब जईयेगा ।”

“अरे नहीं रात का मिरचाई वाला चटनी गर्मी कर दिया है, पेट ठीक नहीं है । क्या पता आज भी हड़ताल नहीं टूटा तो रात में फिर वही खाना होगा इसी लिए अभी नहीं खायेंगे । हड़ताल नहीं टूटा तो आज जल्दी घर आजाएंगे ।” इतना कहते हुए हरिराम ने अपने कदम तेज़ कर लिए ।

“हाँ आज कईसे भी कर के जल्दी आइयेगा ।” संतोषी की बात पर मुस्कुराते हुए हरिराम आगे बढ़ गया ।

शाम घिर आई थी, हरिराम अभी तक घर नहीं लौटा था । संतोषी को पूरी उम्मीद थी कि आज पक्का हड़ताल टूट गयी होगी । संतोषी को ना जाने क्यों आज बहुत घबराहट हो रही थी । हरिराम भी अभी तक लौटा नहीं था, जबकि वो इतनी देर नहीं करता था । संतोषी की बेचैनी बढती जा रही थी ।

इतने में हरिराम सामने से आता दिखा । संतोषी ने सोच लिया था कि आज वो हरिराम को टोकेगी नहीं, क्योंकि उसने उसकी बात नहीं मानी । मगर जब हरिराम पास आया तो उसके सर पर बंधी पट्टी देख संतोषी अपना सारा गुस्सा भूल गयी ।

“हे भगबान, ई क्या हो गया जी ।” संतोषी ने हैरानी में पूछा ।

“अरे कुछो नहीं जरा सा चोट है ।”

“जरा सा चोट है ई ? इतना बड़ा पट्टी बंधा है आ कहते हैं जरा सा चोट है । आप ठीक हैं ना ।” संतोषी की बेचैनी बढती जा रही थी ।

“हाँ हाँ एक दम ठीक हैं, ई लो इसमें मिठाई है और रासन है ।” हरिराम ने ख़ुशी से थैला संतोषी की ओर बढ़ाते हुए कहा ।

“अरे आग लगे मिठाई आ रासन में, आप ई बताइए ई सब कैसे होगया । ई चोट कैसे लगा ।” हरिराम अपनी पीड़ा भरी कराहटों को छुपाने की कोशिश तो कर रहा था मगर वो संतोषी से छुप ना पायीं ।

“बताते हैं जरा साँस लेने दो । दिन में जब गए काम के लिए तो पता चला हड़ताल नहीं टूटा है । हम बहुत मायूस हो कर लौट ही रहे थे कि एक ठो सेठ जी मिल गए । उनको मजदूर नहीं मिल रहा था । हमको बोले कि हजार रुपईया देंगे देहाड़ी का । सीमेंट लोड करना ट्रक में । काम भरी था मगर पईसा अच्छा था इसीलिए हम हाँ बोल दिए । सारा काम हो गया लेकिन अंत में देह में बहुत कमजोरी बुझाने लगा और हम सीमेंट के बोरी लिए गिर गए । सर हमारा एक ठो पत्थर से जा टकराया, ऊ तो तुम्हारा ही पुन परताप था जो बच गए नहीं तो कहीं सीमेंट का बोरा हमारे सर पर गिरता तो समझो बचते नहीं । सेठ जी अच्छा आदमी थे, अपने से इलाज करा दिए आ इहाँ तक छोड़ भी गए ।” हरिराम बोलता रहा संतोषी आंसू बहती रही ।

“आपको कहे थे कुछो खा लीजिए, इहाँ नहीं तो बहार ही खा लेते मगर आप हमारा सुनते कहाँ हैं ।” संतोषी अब बच्चों की तरह रोने लगी ।

“तुम भी हमारा कहाँ सुनती हो, हम बोले थे मत करो पबनी लेकिन नहीं सुनी । अब तुम भूखी रही तो हम कईसे खा लेते । सेठ जी के यहाँ नास्ता मिला था, हम ही नहीं किये । हाँ एक ठो गलती हो गया दबाई खाना था तब पानी पीना पड़ा । देखना कहीं हमारा पबनी टूटने से तुम मत मर जाना ।” हरिराम की आखरी बात पर संतोषी रोते हुए भी हँस पड़ी । उसकी आँखों में हरिराम के प्रति पहले से कहीं ज्यादा स्नेह उमड़ आया ।

“आप नहीं सुधरिएगा । और हम नहीं मरने वाले इतना जल्दी, जान लीजिए । अब जल्दी चलिए चंदरमा देख के कुछो खा लिया जाए ।
“हाँ चलो, सब आज का पबनी ख़तम करेगा आ हम लोग तीन दिन से सह रहा पबनी समाप्त करेंगे ।” हरिराम की बात पर दोनों खिलखिला कर हँस पड़े । उधर नुनुआ सब बातों से अंजान झोले में से मिठाई निकल कर उसे अमृत जान गपागप खाने लगे । उसे खाता देख दोनों की जैसे तीन दिन से पेट में जल रही भूख की आग अचानक से शांत हो गयी । सब चाँद को देख अपना व्रत तोड़ने में लगे हुए थे और चाँद इन दोनों के प्रेम को देख कर अपने चेहरे पर सुकून भरी मुस्कराहट सजाए बैठा था ।

#फिर_दोबारा_से

धीरज झा
*जामुन एक ऐसा वृक्ष जिसके अंग अंग में औषधि है।*🍇 🍇अगर जामुन की मोटी लकड़ी का टुकडा पानी की टंकी में रख दे तो टंकी में शैवाल, हरी काई नहीं जमेगी और पानी सड़ेगा भी नहीं।

🍇जामुन की इस खुबी के कारण इसका इस्तेमाल नाव बनाने में बड़ा पैमाने पर होता है।

🍇पहले के जमाने में गांवो में जब कुंए की खुदाई होती तो उसके तलहटी में जामून की लकड़ी का इस्तेमाल किया जाता है जिसे जमोट कहते है।

🍇दिल्ली की निजामुद्दीन बावड़ी का हाल ही में हुए जीर्णोद्धार से ज्ञात हुआ 700 सालों के बाद भी गाद या अन्य अवरोधों की वजह से यहाँ जल के स्तोत्र बंद नहीं हुए हैं।

🍇भारतीय पुरातत्व विभाग के प्रमुख के.एन. श्रीवास्तव के अनुसार इस बावड़ी की अनोखी बात यह है कि आज भी यहाँ लकड़ी की वो तख्ती साबुत है जिसके ऊपर यह बावड़ी बनी थी। श्रीवास्तव जी के अनुसार उत्तर भारत के अधिकतर कुँओं व बावड़ियों की तली में जामुन की लकड़ी का इस्तेमाल आधार के रूप में किया जाता था।

🍇स्वास्थ्य की दृष्टि से विटामिन सी और आयरन से भरपूर जामुन शरीर में न केवल हीमोग्लोबिन की मात्रा को बढ़ाता। पेट दर्द, डायबिटीज, गठिया, पेचिस, पाचन संबंधी कई अन्य समस्याओं को ठीक करने में अत्यंत उपयोगी है।

🍇एक रिसर्च के मुताबिक, जामुन के पत्तियों में एंटी डायबिटिक गुण पाए जाते हैं, जो रक्त शुगर को नियंत्रित करने करती है। ऐसे में जामुन की पत्तियों से तैयार चाय का सेवन करने से डायबिटीज के मरीजों को काफी लाभ मिलेगा।

🍇सबसे पहले आप एक कप पानी लें। अब इस पानी को तपेली में डालकर अच्छे से उबाल लें। इसके बाद इसमें जामुन की कुछ पत्तियों को धो कर डाल दें। अगर आपके पास जामुन की पत्तियों का पाउडर है, तो आप इस पाउडर को 1 चम्मच पानी में डालकर उबाल सकते हैं। जब पानी अच्छे से उबल जाए, तो इसे कप में छान लें। अब इसमें आप शहद या फिर नींबू के रस की कुछ बूंदे मिक्स करके पी सकते हैं।

🍇जामुन की पत्तियों में एंटी बैक्टीरियल गुण होते हैं. इसका सेवन मसूड़ों से निकलने वाले खून को रोकने में और संक्रमण को फैलने से रोकता है। जामुन की पत्तियों को सुखाकर टूथ पाउडर के रूप में प्रयोग कर सकते हैं. इसमें एस्ट्रिंजेंट गुण होते हैं जो मुंह के छालों को ठीक करने में मदद करते हैं। मुंह के छालों में जामुन की छाल के काढ़ा का इस्तेमाल करने से फायदा मिलता है। जामुन में मौजूद आयरन खून को शुद्ध करने में मदद करता है।

🍇जामुन की लकड़ी न केवल एक अच्छी दातुन है अपितु पानी चखने वाले (जलसूंघा) भी पानी सूंघने के लिए जामुन की लकड़ी का इस्तेमाल करते।

*☘️एक कदम आयुर्वेद की ओर☘️*
🙏🏻
65 वर्षीय शर्मा जी थे। उनकी दोस्ती एक सुंदर महिला से फेसबुक पर हो गयी।
गुड मॉर्निंग, nice pic , wow, से आगे कुछ बातें इनबॉक्स में भी होने लगी।

शर्मा जी खुश रहने लगे। रोज़ इधर उधर से फेसबुकिया फूल💐 भेज देते।

एक दिन उनके मन की हो गयी।
इनबॉक्स में नंबर मांग लिया महिला ने।
अब क्या था। व्हाट्सअप शुरू।
जनाब रोमांटिक मैसेज👨‍❤️‍👨 भेजने लगे।

अरे फेसबुक पर महिला आपकी पोस्ट लाइक भर कर ले तो आप स्वयं को शाहरुख खान के अवतार समझने लगते हो। और अगर इस उम्र में फ्रेंड रिक्वेस्ट आ जाये तो कहना ही क्या।

खैर...एक दिन महिला ने फ़ोन लगा लिया: "जल्दी आ जाओ..मेरे पति बाहर गए हैं।"
जनाब बिजली की स्पीड से पहुंच गए।
बात शुरू होने से पहले ही शर्मा जी ने पूछा: “तुम्हारे पति आ गए तो?”

महिला बोली: “नहीं आएंगे और अगर आ भी जाएं तो तुम कालीन साफ करने लगना, थोड़ी देर में चले जायेंगे। वरना टेबल , पंखे साफ करते रहना”

ये बात चल ही रही थी कि डोर बेल बज गई। पतिदेव आ गए।

जनाब शर्मा जी घबरा कर अपना रुमाल निकाल कर टेबल साफ करने लगे।
महिला ने झाड़ू , फटका, डस्टर , वाइपर ला कर पटक दिया।

“लो साफ करो”

पति ने पूछा "कौन है ये।”

पत्नी बोली।
सफाई के लिए हाउसकीपिंग कम्पनी ने भेजा है।

सफाई चलती रही। एक पुराने कप में सफाई वाले शर्मा जी को चाय भी मिली

पंखे, खिड़कियों, कालीनों आदि की सफाई के बाद बुरी तरह थके हारे जनाब शर्मा जी बोले:
“जाऊं मैडम”.
क्योंकि पतिदेव तो खिसकने का नाम ही नहीं ले रहे थे।

मैडम बोली: ओके।

हस्बैंड ने कहा , “पैसे कितने देना है”
पत्नी मुस्कुराते हुए बोली
इनकी कंपनी में एडवांस जमा कर दिया था।
_बाहर निकलते ही शर्मा जी को उनके मित्र भटनागर साहब मिल गये और छूटते ही बोले.. कर आए सफाई शर्मा साहब... पिछले , साल मुझसे करवाई थी....🥴😃😜_
*फिलहाल शर्मा जी ने अब फेसबुक से दूरी बना ली है...* *_

📌दीवाली नजदीक है इसलिए सावधान रहें.. या फिर रुमाल लेकर सफाई करने के लिए तैयार रहें...जनहित में जारी_* 😃😃😃🤣🤣

दीपावली की अग्रिम शुभकामनाएं
और चांद मुस्कुरा दिया (कहानी)

दिनकर बाबा आज कुछ ज्यादा ही थक गए थे, इसीलिए आराम फरमाने के लिए धरती की गोद में सरकते चले जा रहे थे । संध्या ने अपनी गुलाबी चुनरी को चारों ओर फैला दिया था । दिन भर काम से थके लोग भी अब थोड़े आराम की चाह में अपने अपने घरों को जा रहे थे । हर किसी के झोले में कुछ ना कुछ ज़रूर था । किसी ने 400 की देहाड़ी में से 20 रुपए की खुशियां खरीद ली थीं, अपने बच्चों के लिए, तो कोई स्वार्थी अपनी थकान का बहाना बना कर ठेके की तरफ घर का कलेश खरीदने निकल पड़ा था, किसी ने बूढ़े पिता के लिए आज बुखार के तीसरे दिन कोई एक ज़रुरत मार कर दवाइयां ले ली थीं, तो किसी ने राशन का सामान खरीद लिया था ।

मगर इन्हीं जैसों में से एक हरिराम आज फिर अपने झोले में सिर्फ मायूसी बटोरे जा रहा था । आज चौथे दिन भी मज़दूर यूनियन की हड़ताल ना टूटी थी । गेहूं ख़ुशी से पिस रहा था, क्योंकि वो जनता था कि आंटा बन कर महंगे दाम में बिक जायेगा मगर हरिराम जैसे घुन तो बेकार में ही पीसे जा रहे थे । मगर करते भी क्या आखिर थे तो घुन ही ना । वही ठेके का काम, वही रोज़ की देहाड़ी । मगर चार दिन से ये देहाड़ी भी बंद थी । पिछला राशन दो दिन तो भूखे पेट की आग को थोड़ा शांत कर गया मगर बाक़ी के दो दिन पहाड़ लग रहे थे । रोज़ इस आस में घर से जाता कि आज हड़ताल टूटेगी, आज कोई काम मिल जायेगा मगर रोज़ निराशा के सिवा और कुछ हाथ नहीं लगता था ।

“नुनुआ की माँ ।” अपने क्वाटर के बाहर छोटे से बरामदे में बिछी टाट पर बैठते हुए हरिराम ने थके हुए स्वर में अपनी पत्नी को पुकारा ।

“आज भी नहीं टूटा ना हड़ताल ?” अन्दर से लोटा में पानी लिए संतोषी आई ।

“कैसे जान जाती हो बिना कहे ही सब बात ?” हरिराम ने लोटा पकड़ते हुए कुछ पल को मायूसी चेहरे से उतार कर उसकी जगह मुस्कराहट सजाते हुए कहा ।

“दस बरस हो गए हैं जी, अब तो आपके बुलाने से ही समझ आ जाता है कि बात खुसी का है या दुखी का ।” पास पड़े गत्ते के टुकड़े को हाथ पंखा बना कर हरिराम को हवा देते हुए संतोषी बोली ।

“रहने दो अब गरम नहीं लगता है, मौसम ठंढाने लगा है ।” मौसम में ठण्ड की आहट महसूस होते ही गरीब का कलेजा एक पल के लिए धक से रह जाता है ये सोच कर कि ठण्ड आ रही है, पता नहीं कैसे समय कटेगा ।

“नहीं तो, अभी कहाँ ठंढा आया है, छठ बाद ठंढा पड़ता है । देखिए आपको पसेना आ रहा है ।” संतोषी ने मन में ठान ही लिया था कि दिसंबर के अंत से पहले वो मानेगी ही नहीं कि ठण्ड पड़ने लगी है । अगर वो ना मानती तो हरिराम को इस तंग हाली में ओढना बिछौना का चिंता भी खाने लगता और वो ऐसा कभी नहीं चाहती थी ।

“आज भी हड़ताल नहीं टूटा । बड़का सब अपना काम अच्छा से चला ही रहा है मगर हम जैसा गरीब सब को सौ रुपैया रोज बढ़ने के नाम पर ई पांच पांच दिन भूखे मार रहा है ।

“अरे आप बेकार का चिंता करते हैं जी, हम मंगला के इहाँ से आंटा ले आये हैं । उसको कोटा में से गहूम मिल जाता है ना तो उसके पास आंटा था । बिहान तक काम चल जायेगा । आप देखिएगा बिहान हड़तालो टूट जाएगा । फिर सब ठीक हो जायेगा ।” हमेशा ही संतोषी की बोली हरिराम के शरीर का सारा थकान निचोड़ लेती है । उसको अपना मन शांत करने के लिए बस संतोषी को एक टक ताकते रहने भर की ज़रुरत ही होती है ।

हरिराम ने अपनी सारी चिंता को किनारे रख कर संतोषी की ओर देखते हुए बड़े शरारती लहज़े में कहा “तुम बोलती बहुते अच्छा हो नुनुआ की माँ ।”

“आपका भी नहीं बुझाता, अभिये केतना टेंसन में थे आ अभिये कईसे बोल रहे हैं ।” संतोषी शर्मा गयी थी ।

हरिराम कुछ और भी कहता मगर तब तक नुनुआ आगया था । फिर संतोषी खाना बनाने चली गयी । रात के समय नुनुआ को खिला कर संतोषी ने हरिराम के लिए खाना परोसा । रोटी और नमक और सूखी मिर्च की चटनी हरिराम के आगे परोस दी संतोषी ने ।

“दाल हम नुनुआ को खिला दिए, आज भर खा लीजिए कल सब ठीक हो जायेगा ।” संतोषी कितनी आशावादी है ये सोच कर हरिराम गहरे से मुस्कुरा दिया ।

“कल क्या होगा वो छोड़ो, आओ पहले खाना खा लें ।”

“अरे आप खाइए ना, हम बर्तन मांज कर खा लेंगे ।” संतोषी ने हरिराम की बात को टालते हुए कहा ।

“बचा होगा तब ना खाओगी, हम जानते हैं इतना ही रोटी बनाई हो और बांकी का कल के लिए बचा ली हो । अब चुप चाप खा लो ।” संतोषी अपनी चोरी पकड़े जाने पर झेंप गयी । दोनों ने साथ साथ खाना खा लिया । पेट भले ही दोनों का ना भरा हो मगर खाने में प्यार की मात्र इतनी थी कि दोनों का मन ज़रूर भर गया । कल कुछ अच्छा होगा इस उम्मीद के साथ दोनों एक दुसरे की तरफ़ देख कर मुस्कुराते हुए सपनों की दुनिया घूमने निकल पड़े ।

अगले दिन सुबह के चार बजे

बर्तनों की आवाज़ से हरिराम की नींद खुल गयी । उसने बिस्तर पर देखा तो संतोषी नहीं थी । “अभी तो दिन भी नहीं चढ़ा फिर संतोषी काहे उठ गयी।" हरिराम भी बिस्तर से उठ गया । बाहर जा कर देखा तो संतोषी के हाथ में गुड़ का एक टुकड़ा था जिसके साथ वो पानी पी रही थी ।
“कहे थे थोड़ा और खा लो हमारी रोटी में से बात नहीं मानी, अब देखो खाली गुड़ का डिब्बा झाड़ कर खा रही हो ।” हरिराम ने संतोषी से मजाक करते हुए कहा ।

“नहीं भूख थोड़े ना लगा है । ऊ आज दिन में पानी नहीं ना पीना है इसीलिए अभी पानी पी रहे थे । भोरे भोरे खली पानी नहीं घोंटा रहा था तो गुड़ वाला डिब्बा झाड़ लिए ।” अपनी बात बताते हुए संतोषी के चेहरे पर पांच साल की बच्ची जैसी मासूमियत झलक रही थी ।

“कहे आज पानी कहे नहीं पीओगी ?”

“ऊ आज, करवाचौथ का पबनी है ना इसीलिए ।” संतोषी व्रत की बात बताते हुए शर्मा गयी ।

“अरे ई सब कबसे करने लगी तुम । चार दिन से तो पबनीये कर रही हो तब इसका क्या जरूरत है बताओ । वैसे भी तुम हमारे साथ हो ना हमको कुछो नहीं होगा । ई सब बड़ा लोग का बात है पगली ।” हरिराम ने संतोषी को समझाते हुए कहा ।

“नहीं जी ऐसा नहीं बोलिए, ई सब अपना संतोस का बात होता है । जब तक हम नहीं जानते थे हम नहीं किए लेकिन अब सब औरत लोग करती है तो हमको भी करना है । सब अपना पति से प्रेम करती है तो रखती है, तो सोचो हम तो आपसे बहुते जादा.....” इस से आगे संतोषी शर्मा गयी के चुप हो गयी ।

“हम जानते हैं तुम हमसे बहुत प्रेम करती हो मगर.....”आगे कुछ बोलने से पहले संतोषी ने अपनी ऊँगली हरिराम के होंठों पर रख दी । हरिराम बेचारा पत्नी की जिद के आगे मुस्कुराने के सिवा और कुछ नहीं कर पाया ।

आज हड़ताल टूट जाएगी इस आस में हरिराम काम पर जाने के लिए निकलने लगा तो संतोषी ने उसे टोका “अरे दू ठो रोटी खा लीजिए तब जईयेगा ।”

“अरे नहीं रात का मिरचाई वाला चटनी गर्मी कर दिया है, पेट ठीक नहीं है । क्या पता आज भी हड़ताल नहीं टूटा तो रात में फिर वही खाना होगा इसी लिए अभी नहीं खायेंगे । हड़ताल नहीं टूटा तो आज जल्दी घर आजाएंगे ।” इतना कहते हुए हरिराम ने अपने कदम तेज़ कर लिए ।

“हाँ आज कईसे भी कर के जल्दी आइयेगा ।” संतोषी की बात पर मुस्कुराते हुए हरिराम आगे बढ़ गया ।

शाम घिर आई थी, हरिराम अभी तक घर नहीं लौटा था । संतोषी को पूरी उम्मीद थी कि आज पक्का हड़ताल टूट गयी होगी । संतोषी को ना जाने क्यों आज बहुत घबराहट हो रही थी । हरिराम भी अभी तक लौटा नहीं था, जबकि वो इतनी देर नहीं करता था । संतोषी की बेचैनी बढती जा रही थी ।

इतने में हरिराम सामने से आता दिखा । संतोषी ने सोच लिया था कि आज वो हरिराम को टोकेगी नहीं, क्योंकि उसने उसकी बात नहीं मानी । मगर जब हरिराम पास आया तो उसके सर पर बंधी पट्टी देख संतोषी अपना सारा गुस्सा भूल गयी ।

“हे भगबान, ई क्या हो गया जी ।” संतोषी ने हैरानी में पूछा ।

“अरे कुछो नहीं जरा सा चोट है ।”

“जरा सा चोट है ई ? इतना बड़ा पट्टी बंधा है आ कहते हैं जरा सा चोट है । आप ठीक हैं ना ।” संतोषी की बेचैनी बढती जा रही थी ।

“हाँ हाँ एक दम ठीक हैं, ई लो इसमें मिठाई है और रासन है ।” हरिराम ने ख़ुशी से थैला संतोषी की ओर बढ़ाते हुए कहा ।

“अरे आग लगे मिठाई आ रासन में, आप ई बताइए ई सब कैसे होगया । ई चोट कैसे लगा ।” हरिराम अपनी पीड़ा भरी कराहटों को छुपाने की कोशिश तो कर रहा था मगर वो संतोषी से छुप ना पायीं ।

“बताते हैं जरा साँस लेने दो । दिन में जब गए काम के लिए तो पता चला हड़ताल नहीं टूटा है । हम बहुत मायूस हो कर लौट ही रहे थे कि एक ठो सेठ जी मिल गए । उनको मजदूर नहीं मिल रहा था । हमको बोले कि हजार रुपईया देंगे देहाड़ी का । सीमेंट लोड करना ट्रक में । काम भरी था मगर पईसा अच्छा था इसीलिए हम हाँ बोल दिए । सारा काम हो गया लेकिन अंत में देह में बहुत कमजोरी बुझाने लगा और हम सीमेंट के बोरी लिए गिर गए । सर हमारा एक ठो पत्थर से जा टकराया, ऊ तो तुम्हारा ही पुन परताप था जो बच गए नहीं तो कहीं सीमेंट का बोरा हमारे सर पर गिरता तो समझो बचते नहीं । सेठ जी अच्छा आदमी थे, अपने से इलाज करा दिए आ इहाँ तक छोड़ भी गए ।” हरिराम बोलता रहा संतोषी आंसू बहती रही ।

“आपको कहे थे कुछो खा लीजिए, इहाँ नहीं तो बहार ही खा लेते मगर आप हमारा सुनते कहाँ हैं ।” संतोषी अब बच्चों की तरह रोने लगी ।

“तुम भी हमारा कहाँ सुनती हो, हम बोले थे मत करो पबनी लेकिन नहीं सुनी । अब तुम भूखी रही तो हम कईसे खा लेते । सेठ जी के यहाँ नास्ता मिला था, हम ही नहीं किये । हाँ एक ठो गलती हो गया दबाई खाना था तब पानी पीना पड़ा । देखना कहीं हमारा पबनी टूटने से तुम मत मर जाना ।” हरिराम की आखरी बात पर संतोषी रोते हुए भी हँस पड़ी । उसकी आँखों में हरिराम के प्रति पहले से कहीं ज्यादा स्नेह उमड़ आया ।

“आप नहीं सुधरिएगा । और हम नहीं मरने वाले इतना जल्दी, जान लीजिए । अब जल्दी चलिए चंदरमा देख के कुछो खा लिया जाए ।
“हाँ चलो, सब आज का पबनी ख़तम करेगा आ हम लोग तीन दिन से सह रहा पबनी समाप्त करेंगे ।” हरिराम की बात पर दोनों खिलखिला कर हँस पड़े । उधर नुनुआ सब बातों से अंजान झोले में से मिठाई निकल कर उसे अमृत जान गपागप खाने लगे । उसे खाता देख दोनों की जैसे तीन दिन से पेट में जल रही भूख की आग अचानक से शांत हो गयी । सब चाँद को देख अपना व्रत तोड़ने में लगे हुए थे और चाँद इन दोनों के प्रेम को देख कर अपने चेहरे पर सुकून भरी मुस्कराहट सजाए बैठा था ।

#फिर_दोबारा_से

धीरज झा
गुप्ता जी, पेशे से प्राइमरी अध्यापक थे।

कस्बे से विद्यालय की दूरी महज़ 9 किलोमीटर थी।

एकदम वीराने में था उनका विद्यालय।

कस्बे से वहाँ तक पहुंचने का साधन यदा कदा ही मिलता था, तो अक्सर लिफ्ट मांग कर ही काम चलाना पड़ता था और न मिले तो प्रभु के दिये दो पैर, भला किस दिन काम आएंगे।

"कैसे उजड्ड वीराने में विद्यालय खोल धरा है सरकार ने, इससे भला तो चुंगी पर परचून की दुकान खोल लो।"
लिफ्ट मांगते, साधन तलाशते गुप्ता जी रोज यही सोचा करते।

धीरे धीरे कुछ जमापूंजी इकठ्ठा कर, उन्होंने एक स्कूटर ले लिया।

बिलकुल नया चमचमाता स्कूटर।

स्कूटर लेने के साथ ही उन्होंने एक प्रण लिया कि वो कभी किसी को लिफ्ट के लिए मना न करेंगें।।
आखिर वो जानते थे जब कोई लिफ्ट को मना करे तो कितनी शर्मिंदगी महसूस होती है।

अब गुप्ता जी रोज अपने चमचमाते स्कूटर से विद्यालय जाते, और रोज कोई न कोई उनके साथ जाता। लौटते में भी कोई न कोई मिल ही जाता।

एक रोज लौटते वक्त एक व्यक्ति परेशान सा लिफ्ट के लिये हाथ फैलाये था, , अपनी आदत अनुसार गुप्ता जी ने स्कूटर रोक दिया। वह व्यक्ति पीछे बैठ गया।

थोड़ा आगे चलते ही उस व्यक्ति ने चाकू निकाल गुप्ता जी की पीठ पर लगा दिया।

"जितना रुपया है वो, और ये स्कूटर मेरे हवाले करो।" व्यक्ति बोला।

गुप्ता जी की सिट्टी पिट्टी गुम, डर के मारे स्कूटर रोक दिया। पैसे तो पास में ज्यादा थे नहीं, पर प्राणों से प्यारा, पाई पाई जोड़ कर खरीदा स्कूटर तो था।

*"एक निवेदन है,"* स्कूटर की चाभी देते हुए गुप्ता जी बोले ।

"क्या?" वह व्यक्ति बोला।

"यह कि तुम कभी किसी को ये मत बताना कि ये स्कूटर तुमने कहाँ से और कैसे चोरी किया, विश्वास मानो मैं भी रपट नहीं लिखउँगा।" गुप्ता जी बोले।

"क्यों?" व्यक्ति हैरानी से बोला।

"यह रास्ता बहुत उजड्ड है, निरा वीरान | सवारी मिलती नहीं, उस पर ऐसे हादसे सुन आदमी लिफ्ट देना भी छोड़ देगा।" गुप्ता जी बोले।

व्यक्ति का दिल पसीजा, उसे गुप्ता जी भले मानुष प्रतीत हुए, पर धंधा तो धंधा होता है। 'ठीक है कहकर' वह व्यक्ति स्कूटर ले उड़ा।

अगले दिन गुप्ता जी सुबह सुबह अखबार उठाने दरवाजे पर आए, दरवाजा खोला तो स्कूटर सामने खड़ा था। गुप्ता जी की खुशी का ठिकाना न रहा, दौड़ कर गए और अपने स्कूटर को बच्चे जैसा प्यार लगे, देखा तो उसमें एक कागज भी लगा था।

*"मास्साब, यह मत समझना कि तुम्हारी बातें सुन मेरा हृदय पिघल गया।*

कल मैं तुमसे स्कूटर लूट उसे कस्बे ले गया, सोचा कबाड़ी वाले के पास बेच दूँ।
"अरे ये तो मास्साब का स्कूटर है। " इससे पहले मैं कुछ कहता कबाड़ी वाला बोला......

"अरे, मास्साब ने मुझे बाजार कुछ काम से भेजा है।" कहकर मैं बाल बाल बचा। परन्तु शायद उस व्यक्ति को मुझ पर शक सा हो गया था।

फिर मैं एक हलवाई की दुकान गया, जोरदार भूख लगी थी तो कुछ सामान ले लिया। "अरे ये तो मास्साब का स्कूटर है।" वो हलवाई भी बोल पड़ा।

"हाँ, उन्हीं के लिये तो ये सामान ले रहा हूँ, घर में कुछ मेहमान आये हुए हैं।" कहकर मैं जैसे तैसे वहां से भी बचा।

फिर मैंने सोचा कस्बे से बाहर जाकर कहीं इसे बेचता हूँ। शहर के नाके पर एक पुलिस वाले ने मुझे पकड़ लिया।

"कहाँ, जा रहे हो और ये मास्साब का स्कूटर तुम्हारे पास कैसे।" वह मुझ पर गुर्राया। किसी तरह उससे भी बहाना बनाया।

"हे, मास्साब तुम्हारा यह स्कूटर है या आमिताभ बच्चन। सब इसे पहचानते हैं। आपकी अमानत मैं आपके हवाले कर रहा हूँ, इसे बेचने की न मुझमें शक्ति बची है न हौसला। आपको जो तकलीफ हुई उस एवज में स्कूटर का टैंक फुल करा दिया है।"

पत्र पढ़ गुप्ता जी मुस्कुरा दिए, और बोले। "कर भला तो हो भला।"
#कहानी- सपनों के पंख

“ख़ुद को कब तक यूं ही आईने में निहारती रहोगी? अच्छी ही लग रही हो. अब चलो भी, वरना पार्टी में सबसे देर से पहुंचेंगे.” विवेक ने मंदा की तरफ देखते हुए झुंझलाते स्वर में कहा.

“वैसे भी इतने सारे लोग होंगे, किसको फुर्सत होगी कि तुम्हें देखे? पार्टी में सब खाने-पीने के लिए जाते हैं. देखा जाए तो पीने और ग्लैमर्स तितलियों को ताकने जाते हैं. न जाने किसके लिए इतना तैयार होना चाहती हो? मैं तो रोज़ ही तुम्हें देखता हूं. जैसी हो, मेरे लिए ठीक हो. वैसे भी शादी के इतने सालों बाद कुछ फर्क नहीं पड़ता.” विवेक एक बार बोलना शुरू कर दे, तो उसके तानों में उपहास घुल जाता है और वह जो मन आता है, बोल देता है. बिना यह सोचे कि सुनने वाले को कैसा लगेगा. लेकिन ऐसा वह केवल मंदा के साथ ही करता है, वरना अपनी प्रोफेशनल लाइफ में तो बहुत नाप-तौल कर बात करता है. पता नहीं मंदा के साथ ही क्यों उसका व्यवहार बदल जाता है?

“दूसरों के लिए क्यों, खुद के लिए तैयार होती हूं मैं. अच्छा लगता है.” मंदा बुदबुदाई.
“जानता हूं. तुम्हें बन-ठनकर रहना पसंद है, लेकिन वह सब भी एक उम्र तक ही ठीक लगता है. हर उम्र की अपनी मर्यादा और शालीनता होती है.” विवेक ने कार स्टार्ट करते हुए कहा.

खीझ हुई यह सुनकर मंदा को. पल भर को उसे घूरा. कोबाल्ट ब्लू सूट, व्हाइट शर्ट और लाइट ब्लू टाई, ब्लैक शूज, आफ्टर शेव की भीनी-भीनी सुगंध और ढेर सारा परफ्यूम. विवेक हमेशा बेहतरीन ढंग से तैयार होकर घर से निकलता है. पार्टी के लिए ही नहीं, कहीं भी जाना हो, हमेशा टिप-टॉप रहता है. गजब का आकर्षक व्यक्तित्व है. उसकी भी तो उम्र हो गई है? मंदा से चार साल बड़ा है, फिर यह क्यों सज-संवरकर निकलता है? अगर कभी वह यह सवाल पूछ बैठी, तो जानती है इस सवाल का कोई सटीक जवाब विवेक के पास नहीं होगा. घिसा-पिटा जवाब ही होगा कि ‘मैं पुरुष हूं, काम पर जाता हूं, 10 लोगों से मिलना होता है. आख़िर सोसायटी में मेरा कोई स्टेटस है.’

तो? मंदा के भीतर जैसे सवाल-जवाब की उठा-पटक चलने लगी. वह स्त्री है, उसके लिए संवरे रहना क्यों ज़रूरी नहीं है? जबकि श्रृंगार की तमाम वस्तुएं, सारे ताम-झाम और रौनकें स्त्रियों के लिए ही होती हैं. फैशन की सारी दुनिया उनसे ही चलती है, उनकी वजह से ही फलती-फूलती है. पूरा बाज़ार पुरुषों की बजाय स्त्रियों के कपड़ों और उनके साज-श्रृंगार की चीज़ों से ज़्यादा भरा रहता है. माना वह नौकरी नहीं करती, तो क्या घर में यूं ही झल्ली बनी घूमती रहे. नहीं रह सकती वह ऐसे. नौकरी करने पर भी विवेक ने ही पाबंदी लगाई थी, इसलिए लाख विवेक टोके, वह शादी के बाद मेनीक्योर, पेडीकेयोर, फेशियल से लेकर ज़रूरी ब्यूटी ट्रीटमेंट करवाती रही. नेलपॉलिश, लिपस्टिक सब लगाती रही. घर पर भी तैयार होकर रहना ही पसंद था उसे. विवेक को इस बात से ख़ुश होना चाहिए था कि उसकी बीवी स्मार्ट है, सही तरह से रहने के तौर-तरीके जानती है, लेकिन उसे ये सब फिजूल की बातें लगती हैं.
वैसे भी मंदा की हर बात को काटना या टिप्पणी करना विवेक अपना जन्मसिद्ध अधिकार मानता है. और उम्र की बात करें तो 42 साल की हुई है बस.

22 साल में शादी हो गई थी. एक साल बाद बेटा और उसके दो साल बाद बेटी. बच्चे बाहर हॉस्टल में रहकर पढ़ाई कर रहे हैं, इसलिए समय ही समय है उसके पास. इतना कि बिल्कुल बोर हो जाती है. शादी के बाद सारे शौक, सपने कब चूल्हे और गृहस्थी की भेंट चढ़ गए, पता ही नहीं चला. वह जिस क्षेत्र में अपना मुकाम बनाना चाहती थी, उसके बारे में पता चलते ही शादी के बाद भड़क गया था विवेक. साफ ताकीद दी थी, “कोई ज़रूरत नहीं है, ऐसी बेकार की बातों को दिमाग में लाने की भी. शादी से पहले के जो शौक हैं, उन्हें जाकर किसी मिट्टी के ढेर के नीचे दबा दो, वरना परेशानी तुम्हें ही होगी. यह समझ लो तुम्हें किसी चीज़ की कमी कभी नहीं होने दूंगा. तुम मेरी ज़िम्मेदारी हो और मैं उसे निभाऊंगा.”

विवेक ने सच में उसे कोई कमी नहीं होने दी कभी. बढ़-चढ़कर उसके लिए चीज़ें खरीदकर लाता है, लेकिन क्या चीज़ें ही सारी इच्छाओं की भरपाई करने की पर्याय होती हैं?

वैसे धीरे-धीरे कम ही हो रहा है उसका अपने ऊपर ध्यान देना. इन दिनों बिना प्रेस की साड़ी पहन लेती है, कभी बाल बिखरे भी रहते हैं. फेशियल कराए महीनों बीत जाते हैं. हाथ-पैरों के नाखून तराशना नज़रअंदाज़ कर जाती है. एक अजीब-सा आलस उस पर हावी हो रहा है. आलस से ज़्यादा शायद बोरियत है, कुछ न कर पाने की बोरियत है, पीछे जो छूटा है, उसे संभाल न पाने की एक चिढ़. तो एक ज़िद की तरह करती है वह बनाव-श्रृंगार, वह भी कभी-कभी. इसीलिए अब जब कहीं बाहर जाती है, तो कुछ ज़्यादा ही देर लगती है उसे शीशे के सामने से हटने में. मानो सारी कसर उसी दिन पूरी कर लेना चाहती हो.
उम्र हो जाए तो क्या सजना-संवरना, खुद पर ध्यान देना छोड़ देना चाहिए. इस तरह तो अपने लिए जीना भी छोड़ देना चाहिए. नहीं कर सकती वह विवेक से सवाल और बहस तो कतई नहीं. इसलिए सारे रास्ते चुप ही बैठी रही कार में.

पार्टी में नीलोत्पल दा को देख हैरान रह गई. हमेशा की तरह खादी का कुर्ता-पाजामा पहना हुआ था. अक्सर वह कहती, “दा, गांधीजी के बाद आप खादी के सबसे बड़ा प्रचारक हैं.” तो वह ज़ोर-ज़ोर से हंसते हुए कहते, “बहुत शैतान हो तुम, मंदा. लेकिन अपनी ये शरारतें, ये चुलबुलापन हमेशा कायम रखना. इससे व्यक्तित्व और कला दोनों में निखार आता है. जीवन की जीवंतता बनी रहती है.”

शैतानी और चुलबुलापन दोनों को ही वह संभाल नहीं पाई.
“आप यहां? इस शहर में? कब आए दिल्ली से? आपको देखकर बहुत अच्छा लगा, दा.” ख़ुशी के अतिरेक में उसने प्रश्‍नों की झड़ी लगा दी.
“बीवी जो बोले मानना पड़ता है बाबा. उसका आदेश कि मुंबई शिफ्ट हो जाते हैं. यहां ज़्यादा अवसर हैं हमारे लिए.“ नीलोत्पल दा ज़ोर से हंसे.

“आपने शादी कर ली. घोर आश्‍चर्य दा. आप तो हमेशा कहते थे कि चाहे कोई अप्सरा भी आ जाए, शादी नहीं करूंगा.”
“नहीं चली मेरी उसके सामने. ऐ रुपाली, देखो तो कौन है यहां.”

रुपाली दी को देख मंदा उनसे लिपट गई. हमेशा की तरह बालों में गजरा लगा था और पीले रंग की सिल्क की साड़ी में वह अद्वितीय लग रही थीं. ग्रुप के सारे लोग उन्हें शिल्पकार का ऐसा शिल्प कहा करते थे, जिसे गढ़ते हुए हथौड़ी-छेनी भी बहुत कोमलता से चलाई गई होगी. तभी तो हर अंग कलात्मक ढंग से तराशा हुआ लगता था.

“आपने रुपाली दी से शादी की?” मंदा की हैरानी और बढ़ गई थी.
“करनी पड़ी मंदा. मानी ही नहीं. तुम सबसे बिंदास थीं हमारे ग्रुप में. तुम तो शादी करके गायब ही हो गईं, फिर मुझे कौन बचाता?” दा हंसे.

रुपाली ने प्यार से उनकी पीठ पर मुक्का मारा. “बदमाश मानुष. मंदा, इनकी बातों में मत आना. कितने पीछे पड़े कि शादी कर लो, वरना इस रूखे इंसान के साथ बंधती क्या मैं?”

“नहीं दी. दा बिलकुल रूखे इंसान नहीं हैं. कलाकार तो संवेदनशील होता है. अपने गुरु के बारे में मैं कुछ नहीं सुनूंगी.”
“तुम थियेटर कर रही हो कि नहीं?” विवेक तो अपने दोस्तों के साथ ड्रिंक करने में व्यस्त था. मंदा साथ में आई है, यह भी भूल गया था. वे तीनों कोने की एक टेबल पर आकर बैठ गए.

“दा, कुछ नहीं कर रही मैं. विवेक को पसंद नहीं, लेकिन आप लोगों का थियेटर ग्रुप कैसा चल रहा है?”
“एकदम बढ़िया. यहां मुंबई में भी अच्छा लग रहा है. लोग थियेटर पसंद करते हैं. ग्लैमरस होने के साथ-साथ मुंबई में कला की भी बहुत कद्र है. तुम वापस ज्वाइन कर लो हमारे साथ.” रुपाली दी ने चीज़ बॉल्स खाते हुए कहा.
“संभव नहीं होगा दी.” मंदा ने धीमे स्वर में कहा. थियेटर के बारे में सोचते ही एक टीस उठी थी मन में. उसका सपना था एक बेहतरीन थियेटर कलाकार बनने का.

“अपना पता दो. कल आते हैं हम तुम्हारे घर.” नीलोत्पल दा उसे भावुक होते देख माहौल को सहज बनाने के लिए बोले.
“दा, दोपहर में आइएगा.” अचानक मंदा के मुंह से निकला. विवेक घर पर होगा, तो नाहक ही गुस्सा होगा.

“मंदा, हमारे ग्रुप की एक लड़की की मां बहुत बीमार है. वह रिहर्सल पर भी नहीं आ रही है. और अगले महीने ही नाटक का मंचन है. विज्ञापन जा चुके हैं, पोस्टर छप गए हैं. प्रचार काम जोरों पर है. वेन्यू के लिए एडवांस का भुगतान किया जा चुका है. लगभग सारी तैयारियां हो चुकी हैं. ऐसे में नाटक मंचन की तारीख़ आगे बढ़ाना संभव नहीं. और तुम तो जानती हो हमारे पास इतना पैसा भी नहीं है कि शो कैंसल कर दें और नुकसान सह लें. बरबाद हो जाएंगे हम.” नीलोत्पल दा ने पूरी नाटकीयता से, चेहरे पर दयनीय भाव लाकर कहा.

“हां मंदा. अब तुम ही हमें बचा सकती हो.” रुपाली दी ने भी अभिनय के सारे दांव-पेंच आजमाते हुए स्वर में वेदना के सारे तार झनझनाते हुए कहा.
“मैं कैसे? यह आप लोग क्या कह रहे हैं? मुझे नहीं लगता कि आर्थिक रूप से इस काम के लिए मैं आपकी कोई मदद कर पाऊंगी. विवेक को थियेटर की दुनिया कतई पसंद नहीं.”

“अरे नहीं, पैसे से मदद करने के लिए नहीं कह रहे हैं. मैं चाहता हूं कि उस लड़की की भूमिका तुम करो. एक महीना है, आराम से रिहर्सल हो जाएगी. और तुम जैसी पारंगत कलाकार के लिए कौन-सा मुश्किल काम है अभिनय करना.” नीलोत्पल दा ने समझाने और मनाने के ख़्याल से अपनी खास शैली में कहा.
बुरी तरह से चौंक गई मंदा. “यह आप क्या कह रहे हैं, दा? असंभव बात है.”

“क्यों, इसमें इतनी चौंकने वाली बात क्या है?” रुपाली दी ने पूछा. “तुम स्कूल टाइम से थियेटर करती आ रही हो. मंजी हुई कलाकार हो. हमारे ग्रुप का हिस्सा रही हो. अब हमें ज़रूरत है तो क्या हमारे लिए इतना भी नहीं कर सकतीं? नीलोत्पल को गुरु मानती हो. उनका मान नहीं रखोगी क्या?” रुपाली ने मंदा की भावनाओं को झिंझोड़ा. वह जानती थीं कि मंदा वैसे मानने वाली नहीं है.
“शादी के बाद अभिनय करना तो दूर, किसी नाटक का मंचन होते देखा तक नहीं. सब भूल चुकी हूं. इतने बरस हो गए हैं, रुपाली दी.”

“कला हमारे भीतर होती है, वह ख़त्म नहीं होती. अगर समय का अंतराल आ जाए, तो उसे केवल तराशने की ज़रूरत होती है. बस तुम्हें पुनः अभ्यास करना होगा. रिहर्सल करोगी तो पुरानी मंदा स्टेज पर छा जाएगी पहले की तरह.” नीलोत्पल दा बोले.
“दा, विवेक मुझे कभी इसकी अनुमति नहीं देंगे.” मंदा ने कंपकंपाते स्वर में कहा. ‘मैं जिस सपने को दफना चुकी हूं, उसे क्यों खोदकर बाहर लाने की ज़िद कर रहे हैं ये दोनों?’ मंदा अपने भीतर एक लड़ाई लड़ रही थी. ‘क्यों वापस ये उसे उस दुनिया में ले जाना चाहते हैं, जहां जाना संभव नहीं है!’

“अनुमति नहीं देंगे मतलब? तुम्हें अपने बारे में फैसले लेने का अधिकार तो होगा ही? और क्या तुम अपनी कला को मरने दोगी? अभिनय तो तुम्हारे लिए जीवन की संतुष्टि रहा है हमेशा. कैसे जी पा रही हो उसके बिना?” रुपाली दी ने जैसे उसके आत्मसम्मान को झिंझोड़ा.

“रुपाली रहने दो. मंदा को इस तरह परेशान मत करो. विवेक को नहीं पसंद तो कोई बात नहीं. हम तुम्हें बाध्य नहीं करेंगे, लेकिन बस इस बार यह नाटक कर लो, वरना बहुत मुश्किल स्थिति पैदा हो जाएगी हमारे लिए.” नीलोत्पल दा ने अनुरोध किया.
“दा, इस तरह अनुनय कर आप मुझे शर्मिंदा न करें. मैं कोशिश करूंगी, पर अभिनय ठीक से कर पाऊंगी कि नहीं इसकी गारंटी नहीं ले सकती.”
“वह तुम मुझ पर छोड़ दो.” रुपाली दी बोलीं.
“मैं दोपहर में ही रिहर्सल के लिए आ सकती हूं.”

“कोई दिक्कत नहीं. हमारी टोली का विमल तुम्हें कार लेकर लेने आएगा और छोड़ भी जाएगा. कॉलेज में पढ़ता है, पर अच्छा कलाकार है. जब तुम हमारे ग्रुप से जुड़ी थीं, उस समय जैसा जुनून तुम में था अभिनय को लेकर, वैसा ही जुनून उसमें भी दिखाई देता है मुझे. वह भी एक भूमिका निभा रहा है नाटक में.” नीलोत्पल दा ने उसे स्क्रिप्ट पकड़ाते हुए कहा.
इतने वर्षों बाद अभिनय करते हुए भी रिहर्सल के दौरान मंदा को नहीं लगा कि वह कुछ भूली थी. बहुत ही सहज ढंग से वह संवाद पढ़ती गई. धीरे-धीरे अभिनय और मंज गया. नीलोत्पल दा और रुपाली दी के निर्देशों के साथ वह निखरती गई.
“मंदा दी, आपका अभिनय एकदम स्वाभाविक है. जान डाल दी है आपने ध्रुवस्वामिनी की भूमिका में.” उसे वापस छोड़ते समय विमल बोला.

“अच्छा विमल, अब उस लड़की की मां की तबीयत कैसी है, जो पहले यह भूमिका निभाने वाली थी?”
“नहीं तो दी. यह भूमिका तो कोई नहीं निभाने वाला था. नीलोत्पल दा किसी को ढूंढ रहे थे इसके लिए. फिर आप मिल गईं तो वह बहुत प्रसन्न हुए.”
कुछ पूछा नहीं मंदा ने नीलोत्पल दा और रुपाली दी से इस बारे में, लेकिन मन ही मन धन्यवाद ज़रूर दिया. इतने दिनों से वह खुद बहुत अच्छा महसूस कर रही थी. आलस, बोझिलता और कुछ कर न पाने की कसक दूर हो गई थी. हालांकि वह जानती थी कि जिस दिन विवेक को पता चला, तो तूफान आ जाएगा. जानती है नाटक करने वालों को वह भांड कहता है. लिपे-पुते चेहरे वाले भांड, तिरस्कार होता है उसके शब्दों में.

बस आज फाइनल रिहर्सल है और दो दिन बाद मंचन. उस दिन के लिए कोई बहाना बनाना पड़ेगा सुबह से रात तक घर से बाहर रहने के लिए.

फाइनल रिहर्सल में देर हो गई थी. विवेक का आने का समय हो रहा है, सोचकर मंदा ने न कपड़े बदले थे और न ही मेकअप उतारा था. अंधेरा हो गया था. विमल उसे छोड़कर निकल ही रहा था कि बोला, “मंदा दी, एक बार खड़्गधारिणी के साथ जो आपका संवाद है, उसे सुनाओ न. वाह! कितना अद्भुत है आपका कहने का अंदाज़.”

मंदा हंस पड़ी. पैसेज में ही रुक गई. “भला मैं क्या कर सकूंगी? मैं तो अपने ही प्राणों का मूल्य नहीं समझ पाती. मुझ पर राजा का कितना अनुग्रह है, यह भी मैं आज तक न जान सकी. मैंने तो कभी उनका संभाषण सुना ही नहीं. विलासिनियों के साथ मदिरा में उन्मत, उन्हें अपने आनंद से अवकाश कहां!”
अचानक जड़ हो गई मंदा. विवेक सामने खड़ा था।
“दी, मैं चलता हूं. प्रणाम.” विमल चला गया.

सजी-धजी, मेकअप की परतों से चेहरे को रंगत दिए, भौंहों में कटाव और नकली आभूषणों से सुसज्जित मंदा को देख हतप्रभ रह गया विवेक. घर के अंदर उसके पीछे आते हुए वह उसे बताने का प्रयत्न कर रही थी कि कैसे नीलोत्पल दा और रुपाली दी से उसकी भेंट हुई और उसके बाद बस परसों मंचन है. “उसके बाद मैं अभिनय नहीं करूंगी विवेक, लेकिन अब मैं मना नहीं कर सकती. सारी तैयारियां हो चुकी हैं. मैं तुम्हारी बात की अवहेलना नहीं करनी चाहती थी, बस न जाने कैसे मेरे सपनों ने उड़ान भर ली. कुछ तो बोलो विवेक. तुम समझ रहे हो न मेरी बात?”
कोई प्रतिक्रिया नहीं. मंदा इस बात से ज़्यादा परेशान थी. ज्वालामुखी के फटने का इंतज़ार था उसे. सुबह तक चुप्पी छाई रही. न ताना, न उलाहना. हैरानी की बात तो यह कि बड़ी देर तक दूसरे कमरे में जाकर बच्चों से बात करता रहा विवेक. मंदा ही करती थी बच्चों से हमेशा बात और वह उसी से उनका हाल-चाल पूछ लिया करता था. बेटी तो हमेशा कहती थी कि ‘मां आपको इस तरह अपने अभिनय के पैशन को नहीं छोड़ना चाहिए था. कला तो हर रूप में अच्छी और प्रशंसा योग्य होती है. मुझे वापस आने दें, फिर देखती हूं पापा आपको कैसे रोक पाएंगे.’ बेटी की बात सुन मंदा कुछ नहीं कहती थी. अपने सपनों को वह कब का दफन कर चुकी है, नाहक क्यों उन्हें बाहर निकालने की कोशिश में वर्तमान में उठा-पटक करे!

“कितने बजे का शो है?” सुबह चुप्पी टूटी. “आऊंगा मैं भी देखने तुम्हारा अभिनय. सुना तुम्हारी डायलॉग डिलीवरी तो अच्छी है. और हां सजी-संवरी ज़्यादा अच्छा लगती हो तुम. अपना ध्यान रखना क्यों छोड़ दिया है तुमने?”

मंदा आश्‍चर्यचकित सी उसे ताक रही थी. नहीं ताना तो नहीं लग रहा यह, न ही तानों में लिपटा उपहास है. क्या सचमुच विवेक नाराज नहीं है? कहीं वह अभिनय तो नहीं कर रहा?
वह धीरे-धीरे क़दम रखते हुए बिल्कुल उसके पास जाकर खड़ी हो गई. उसकी आंखों में झांका. उसके चेहरे के भावों को पढ़ने लगी. नहीं अभिनय तो नहीं लग रहा!
मंदा को लगा जैसे उसके सपनों ने हौले से पंख फड़फड़ाए हैं.-सुमन बाजपेयी