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पाँच साल की बेटी बाज़ार में गोल गप्पे खाने के लिए मचल गई। 🍥🌏 “किस भाव से दिए भाई?” पापा नें सवाल् किया। “10 रूपये के 8 दिए हैं। गोल गप्पे वाले ने जवाब दिया…… पापा को मालूम नहीं था गोलगप्पे इतने महँगे हो गये है….जब वे खाया करते थे तब तो एक रुपये के 10 मिला करते थे। . पापा ने जेब मे हाथ डाला 15 रुपये बचे थे। बाकी रुपये घर की जरूरत का सामान लेने में खर्च हो गए थे। उनका गांव शहर से दूर है 10 रुपये तो बस किराए में लग जाने है। “नहीं भई 5 रुपये में 10 दो तो ठीक है वरना नही लेने।
यह सुनकर बेटी नें मुँह फुला लिया…. “अरे अब चलो भी , नहीं लेने इतने महँगे। पापा के माथे पर लकीरें उभर आयीं …. “अरे खा लेने दो ना साहब… अभी आपके घर में है तो आपसे लाड़ भी कर सकती है… कल को पराये घर चली गयी तो पता नहीं ऐसे मचल पायेगी या नहीं. … तब आप भी तरसोगे बिटिया की फरमाइश पूरी करने को… गोलगप्पे वाले के शब्द थे तो चुभने वाले पर उन्हें सुनकर पापा को अपनी बड़ी बेटी की याद आ गयी….
जिसकी शादी उसने तीन साल पहले
एक खाते -पीते पढ़े लिखे परिवार में की थी……
उन्होंने पहले साल से ही उसे छोटी
छोटी बातों पर सताना शुरू कर दिया था…..
दो साल तक वह मुट्ठी भरभर के
रुपये उनके मुँह में ठूँसता रहा पर
उनका पेट बढ़ता ही चला गया ….
और अंत में एक दिन सीढियों से
गिर कर बेटी की मौत की खबर
ही मायके पहुँची….
आज वह छटपटाता है
कि उसकी वह बेटी फिर से
उसके पास लौट आये..?
और वह चुन चुन कर उसकी
सारी अधूरी इच्छाएँ पूरी कर दे…
पर वह अच्छी तरह जानता है
कि अब यह असंभव है.
“दे दूँ क्या बाबूजी
गोलगप्पे वाले की आवाज से
पापा की तंद्रा टूटी…
“रुको भाई दो मिनिट ….
पापा पास ही पंसारी की दुकान थी उस पर गए जहाँ से जरूरत का सामान खरीदा था। खरीदी गई पाँच किलो चीनी में से एक किलो चीनी वापस की तो 40 रुपये जेब मे बढ़ गए।
फिर ठेले पर आकर पापा ने डबडबायी आँखें
पोंछते हुए कहा
अब खिलादे भाई। हाँ तीखा जरा कम डालना। मेरी बिटिया बहुत नाजुक है….
सुनकर पाँच वर्ष की गुड़िया जैसी बेटी की आंखों में चमक आ गई और पापा का हाथ कस कर पकड़ लिया।
जब तक बेटी हमारे घर है
उनकी हर इच्छा जरूर पूरी करे,…👏👏
क्या पता आगे कोई इच्छा
पूरी हो पाये या ना हो पाये ।
ये बेटियां भी कितनी अजीब होती हैं
जब ससुराल में होती हैं
तब माइके जाने को तरसती हैं….
सोचती हैं
कि घर जाकर माँ को ये बताऊँगी
पापा से ये मांगूंगी
बहिन से ये कहूँगी
भाई को सबक सिखाऊंगी
और मौज मस्ती करुँगी…
लेकिन
जब सच में मायके जाती हैं तो
एकदम शांत हो जाती है
किसी से कुछ भी नहीं बोलती….
बस माँ बाप भाई बहन से गले मिलती है।
बहुत बहुत खुश होती है।
भूल जाती है
कुछ पल के लिए पति ससुराल…..
क्योंकि
एक अनोखा प्यार होता है मायके में
एक अजीब कशिश होती है मायके में…..
ससुराल में कितना भी प्यार मिले…..
माँ बाप की एक मुस्कान को
तरसती है ये बेटियां….
ससुराल में कितना भी रोएँ
पर मायके में एक भी आंसूं नहीं
बहाती ये बेटियां….
क्योंकि
बेटियों का सिर्फ एक ही आंसू माँ
बाप भाई बहन को हिला देता है
रुला देता है…..
कितनी अजीब है ये बेटियां
कितनी नटखट है ये बेटियां
भगवान की अनमोल देंन हैं
ये बेटियां ……
हो सके तो
बेटियों को बहुत प्यार दें
उन्हें कभी भी न रुलाये
क्योंकि ये अनमोल बेटी दो
परिवार जोड़ती है
दो रिश्तों को साथ लाती है।
अपने प्यार और मुस्कान से।
हम चाहते हैं कि
सभी बेटियां खुश रहें
हमेशा भले ही हो वो
मायके में या ससुराल में।
●●●●●●●●
खुशकिस्मत है वो
जो बेटी के बाप हैं,
●●●●●●●●●
#अपनी_कलम_से ✍️🌻
यह सुनकर बेटी नें मुँह फुला लिया…. “अरे अब चलो भी , नहीं लेने इतने महँगे। पापा के माथे पर लकीरें उभर आयीं …. “अरे खा लेने दो ना साहब… अभी आपके घर में है तो आपसे लाड़ भी कर सकती है… कल को पराये घर चली गयी तो पता नहीं ऐसे मचल पायेगी या नहीं. … तब आप भी तरसोगे बिटिया की फरमाइश पूरी करने को… गोलगप्पे वाले के शब्द थे तो चुभने वाले पर उन्हें सुनकर पापा को अपनी बड़ी बेटी की याद आ गयी….
जिसकी शादी उसने तीन साल पहले
एक खाते -पीते पढ़े लिखे परिवार में की थी……
उन्होंने पहले साल से ही उसे छोटी
छोटी बातों पर सताना शुरू कर दिया था…..
दो साल तक वह मुट्ठी भरभर के
रुपये उनके मुँह में ठूँसता रहा पर
उनका पेट बढ़ता ही चला गया ….
और अंत में एक दिन सीढियों से
गिर कर बेटी की मौत की खबर
ही मायके पहुँची….
आज वह छटपटाता है
कि उसकी वह बेटी फिर से
उसके पास लौट आये..?
और वह चुन चुन कर उसकी
सारी अधूरी इच्छाएँ पूरी कर दे…
पर वह अच्छी तरह जानता है
कि अब यह असंभव है.
“दे दूँ क्या बाबूजी
गोलगप्पे वाले की आवाज से
पापा की तंद्रा टूटी…
“रुको भाई दो मिनिट ….
पापा पास ही पंसारी की दुकान थी उस पर गए जहाँ से जरूरत का सामान खरीदा था। खरीदी गई पाँच किलो चीनी में से एक किलो चीनी वापस की तो 40 रुपये जेब मे बढ़ गए।
फिर ठेले पर आकर पापा ने डबडबायी आँखें
पोंछते हुए कहा
अब खिलादे भाई। हाँ तीखा जरा कम डालना। मेरी बिटिया बहुत नाजुक है….
सुनकर पाँच वर्ष की गुड़िया जैसी बेटी की आंखों में चमक आ गई और पापा का हाथ कस कर पकड़ लिया।
जब तक बेटी हमारे घर है
उनकी हर इच्छा जरूर पूरी करे,…👏👏
क्या पता आगे कोई इच्छा
पूरी हो पाये या ना हो पाये ।
ये बेटियां भी कितनी अजीब होती हैं
जब ससुराल में होती हैं
तब माइके जाने को तरसती हैं….
सोचती हैं
कि घर जाकर माँ को ये बताऊँगी
पापा से ये मांगूंगी
बहिन से ये कहूँगी
भाई को सबक सिखाऊंगी
और मौज मस्ती करुँगी…
लेकिन
जब सच में मायके जाती हैं तो
एकदम शांत हो जाती है
किसी से कुछ भी नहीं बोलती….
बस माँ बाप भाई बहन से गले मिलती है।
बहुत बहुत खुश होती है।
भूल जाती है
कुछ पल के लिए पति ससुराल…..
क्योंकि
एक अनोखा प्यार होता है मायके में
एक अजीब कशिश होती है मायके में…..
ससुराल में कितना भी प्यार मिले…..
माँ बाप की एक मुस्कान को
तरसती है ये बेटियां….
ससुराल में कितना भी रोएँ
पर मायके में एक भी आंसूं नहीं
बहाती ये बेटियां….
क्योंकि
बेटियों का सिर्फ एक ही आंसू माँ
बाप भाई बहन को हिला देता है
रुला देता है…..
कितनी अजीब है ये बेटियां
कितनी नटखट है ये बेटियां
भगवान की अनमोल देंन हैं
ये बेटियां ……
हो सके तो
बेटियों को बहुत प्यार दें
उन्हें कभी भी न रुलाये
क्योंकि ये अनमोल बेटी दो
परिवार जोड़ती है
दो रिश्तों को साथ लाती है।
अपने प्यार और मुस्कान से।
हम चाहते हैं कि
सभी बेटियां खुश रहें
हमेशा भले ही हो वो
मायके में या ससुराल में।
●●●●●●●●
खुशकिस्मत है वो
जो बेटी के बाप हैं,
●●●●●●●●●
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एक बार राजा ने खुश होकर लोहार को चंदन का बाग भेंट कर दिया।
लोहार को चंदन के पेड़ की उपयोगिता और कीमत का अंदाजा नहीं था इसलिए उसने पेड़ो को काटकर उन्हें जलाकर उसका कोयला बना कर बेचना शुरू कर दिया।
ऐसा करते-करते, धीरे-धीरे सारा बाग खाली हो गया।
एक दिन राजा घुमते हुए लोहार के घर के बाहर से गुजर रहे थे तो राजा ने सोचा अब तो लोहार चंदन बेच-बेचकर बहुत अमीर हो गया होगा। प्रत्यक्ष देखने पर लोहार कि स्थिति जैसे की तैसी पहले जैसी नजर आई यह देखकर राजा को आश्चर्य हुआ। राजा के मुँह से अनायास निकला यह कैसे हो सकता है? राजा ने सच का पता लगाया तो पाया चंदन तो कोयला हो गया।
तब राजा ने लोहार से पूछा- तेरे पास एकाध लकडी बाकी है या सबका कोयला बना दिया लोहार के पास मात्र कुल्हाडी में लगे चंदन के बेट के अलावा कुछ भी नहीं था वह लाकर राजा को दे दिया।
राजा ने लोहार को कुल्हाड़ी का बेट लेकर चंदन के व्यापारी के पास भेज दिया वहाँ जाकर लोहार को कुल्हाड़ी के बेट के बदले बहुत सारे पैसे मिल गये यह देखकर लोहार की आंखो मे आसू आ गये वह बहुत रोने लगा फिर उसने रोते हुए आँसू पोछकर राजा से और एक बाग देने की विनती की। तब राजा ने उसे कहा ऐसी भेंट बार-बार नहीं, एक ही बार मिलती है।
SC, ST, OBC के लिये संविधान प्रदत्त अधिकार चंदन के बाग की भेंट कि तरह है। इन्हें सस्ते राशन, गैस, बाथरूम एवं चन्द आर्थिक सहायता में बेचा जा रहा है।
अगर संविधान प्रदत्त अधिकारों का संरक्षण ठीक से नहीं किया गया तो हम सब की हालत उस लोहार जैसी हो जाऐगी।
इसलिए समय रहते ही सावधान हो जाएँ और अपने संवैधानिक अधिकारों का मूल्य पहचान कर उनकी रक्षा करें।
लोहार को चंदन के पेड़ की उपयोगिता और कीमत का अंदाजा नहीं था इसलिए उसने पेड़ो को काटकर उन्हें जलाकर उसका कोयला बना कर बेचना शुरू कर दिया।
ऐसा करते-करते, धीरे-धीरे सारा बाग खाली हो गया।
एक दिन राजा घुमते हुए लोहार के घर के बाहर से गुजर रहे थे तो राजा ने सोचा अब तो लोहार चंदन बेच-बेचकर बहुत अमीर हो गया होगा। प्रत्यक्ष देखने पर लोहार कि स्थिति जैसे की तैसी पहले जैसी नजर आई यह देखकर राजा को आश्चर्य हुआ। राजा के मुँह से अनायास निकला यह कैसे हो सकता है? राजा ने सच का पता लगाया तो पाया चंदन तो कोयला हो गया।
तब राजा ने लोहार से पूछा- तेरे पास एकाध लकडी बाकी है या सबका कोयला बना दिया लोहार के पास मात्र कुल्हाडी में लगे चंदन के बेट के अलावा कुछ भी नहीं था वह लाकर राजा को दे दिया।
राजा ने लोहार को कुल्हाड़ी का बेट लेकर चंदन के व्यापारी के पास भेज दिया वहाँ जाकर लोहार को कुल्हाड़ी के बेट के बदले बहुत सारे पैसे मिल गये यह देखकर लोहार की आंखो मे आसू आ गये वह बहुत रोने लगा फिर उसने रोते हुए आँसू पोछकर राजा से और एक बाग देने की विनती की। तब राजा ने उसे कहा ऐसी भेंट बार-बार नहीं, एक ही बार मिलती है।
SC, ST, OBC के लिये संविधान प्रदत्त अधिकार चंदन के बाग की भेंट कि तरह है। इन्हें सस्ते राशन, गैस, बाथरूम एवं चन्द आर्थिक सहायता में बेचा जा रहा है।
अगर संविधान प्रदत्त अधिकारों का संरक्षण ठीक से नहीं किया गया तो हम सब की हालत उस लोहार जैसी हो जाऐगी।
इसलिए समय रहते ही सावधान हो जाएँ और अपने संवैधानिक अधिकारों का मूल्य पहचान कर उनकी रक्षा करें।
और चांद मुस्कुरा दिया (कहानी)
दिनकर बाबा आज कुछ ज्यादा ही थक गए थे, इसीलिए आराम फरमाने के लिए धरती की गोद में सरकते चले जा रहे थे । संध्या ने अपनी गुलाबी चुनरी को चारों ओर फैला दिया था । दिन भर काम से थके लोग भी अब थोड़े आराम की चाह में अपने अपने घरों को जा रहे थे । हर किसी के झोले में कुछ ना कुछ ज़रूर था । किसी ने 400 की देहाड़ी में से 20 रुपए की खुशियां खरीद ली थीं, अपने बच्चों के लिए, तो कोई स्वार्थी अपनी थकान का बहाना बना कर ठेके की तरफ घर का कलेश खरीदने निकल पड़ा था, किसी ने बूढ़े पिता के लिए आज बुखार के तीसरे दिन कोई एक ज़रुरत मार कर दवाइयां ले ली थीं, तो किसी ने राशन का सामान खरीद लिया था ।
मगर इन्हीं जैसों में से एक हरिराम आज फिर अपने झोले में सिर्फ मायूसी बटोरे जा रहा था । आज चौथे दिन भी मज़दूर यूनियन की हड़ताल ना टूटी थी । गेहूं ख़ुशी से पिस रहा था, क्योंकि वो जनता था कि आंटा बन कर महंगे दाम में बिक जायेगा मगर हरिराम जैसे घुन तो बेकार में ही पीसे जा रहे थे । मगर करते भी क्या आखिर थे तो घुन ही ना । वही ठेके का काम, वही रोज़ की देहाड़ी । मगर चार दिन से ये देहाड़ी भी बंद थी । पिछला राशन दो दिन तो भूखे पेट की आग को थोड़ा शांत कर गया मगर बाक़ी के दो दिन पहाड़ लग रहे थे । रोज़ इस आस में घर से जाता कि आज हड़ताल टूटेगी, आज कोई काम मिल जायेगा मगर रोज़ निराशा के सिवा और कुछ हाथ नहीं लगता था ।
“नुनुआ की माँ ।” अपने क्वाटर के बाहर छोटे से बरामदे में बिछी टाट पर बैठते हुए हरिराम ने थके हुए स्वर में अपनी पत्नी को पुकारा ।
“आज भी नहीं टूटा ना हड़ताल ?” अन्दर से लोटा में पानी लिए संतोषी आई ।
“कैसे जान जाती हो बिना कहे ही सब बात ?” हरिराम ने लोटा पकड़ते हुए कुछ पल को मायूसी चेहरे से उतार कर उसकी जगह मुस्कराहट सजाते हुए कहा ।
“दस बरस हो गए हैं जी, अब तो आपके बुलाने से ही समझ आ जाता है कि बात खुसी का है या दुखी का ।” पास पड़े गत्ते के टुकड़े को हाथ पंखा बना कर हरिराम को हवा देते हुए संतोषी बोली ।
“रहने दो अब गरम नहीं लगता है, मौसम ठंढाने लगा है ।” मौसम में ठण्ड की आहट महसूस होते ही गरीब का कलेजा एक पल के लिए धक से रह जाता है ये सोच कर कि ठण्ड आ रही है, पता नहीं कैसे समय कटेगा ।
“नहीं तो, अभी कहाँ ठंढा आया है, छठ बाद ठंढा पड़ता है । देखिए आपको पसेना आ रहा है ।” संतोषी ने मन में ठान ही लिया था कि दिसंबर के अंत से पहले वो मानेगी ही नहीं कि ठण्ड पड़ने लगी है । अगर वो ना मानती तो हरिराम को इस तंग हाली में ओढना बिछौना का चिंता भी खाने लगता और वो ऐसा कभी नहीं चाहती थी ।
“आज भी हड़ताल नहीं टूटा । बड़का सब अपना काम अच्छा से चला ही रहा है मगर हम जैसा गरीब सब को सौ रुपैया रोज बढ़ने के नाम पर ई पांच पांच दिन भूखे मार रहा है ।
“अरे आप बेकार का चिंता करते हैं जी, हम मंगला के इहाँ से आंटा ले आये हैं । उसको कोटा में से गहूम मिल जाता है ना तो उसके पास आंटा था । बिहान तक काम चल जायेगा । आप देखिएगा बिहान हड़तालो टूट जाएगा । फिर सब ठीक हो जायेगा ।” हमेशा ही संतोषी की बोली हरिराम के शरीर का सारा थकान निचोड़ लेती है । उसको अपना मन शांत करने के लिए बस संतोषी को एक टक ताकते रहने भर की ज़रुरत ही होती है ।
हरिराम ने अपनी सारी चिंता को किनारे रख कर संतोषी की ओर देखते हुए बड़े शरारती लहज़े में कहा “तुम बोलती बहुते अच्छा हो नुनुआ की माँ ।”
“आपका भी नहीं बुझाता, अभिये केतना टेंसन में थे आ अभिये कईसे बोल रहे हैं ।” संतोषी शर्मा गयी थी ।
हरिराम कुछ और भी कहता मगर तब तक नुनुआ आगया था । फिर संतोषी खाना बनाने चली गयी । रात के समय नुनुआ को खिला कर संतोषी ने हरिराम के लिए खाना परोसा । रोटी और नमक और सूखी मिर्च की चटनी हरिराम के आगे परोस दी संतोषी ने ।
“दाल हम नुनुआ को खिला दिए, आज भर खा लीजिए कल सब ठीक हो जायेगा ।” संतोषी कितनी आशावादी है ये सोच कर हरिराम गहरे से मुस्कुरा दिया ।
“कल क्या होगा वो छोड़ो, आओ पहले खाना खा लें ।”
“अरे आप खाइए ना, हम बर्तन मांज कर खा लेंगे ।” संतोषी ने हरिराम की बात को टालते हुए कहा ।
“बचा होगा तब ना खाओगी, हम जानते हैं इतना ही रोटी बनाई हो और बांकी का कल के लिए बचा ली हो । अब चुप चाप खा लो ।” संतोषी अपनी चोरी पकड़े जाने पर झेंप गयी । दोनों ने साथ साथ खाना खा लिया । पेट भले ही दोनों का ना भरा हो मगर खाने में प्यार की मात्र इतनी थी कि दोनों का मन ज़रूर भर गया । कल कुछ अच्छा होगा इस उम्मीद के साथ दोनों एक दुसरे की तरफ़ देख कर मुस्कुराते हुए सपनों की दुनिया घूमने निकल पड़े ।
अगले दिन सुबह के चार बजे
बर्तनों की आवाज़ से हरिराम की नींद खुल गयी । उसने बिस्तर पर देखा तो संतोषी नहीं थी । “अभी तो दिन भी नहीं चढ़ा फिर संतोषी काहे उठ गयी।" हरिराम भी बिस्तर से उठ गया । बाहर जा कर देखा तो संतोषी के हाथ में गुड़ का एक टुकड़ा था जिसके साथ वो पानी पी रही थी ।
दिनकर बाबा आज कुछ ज्यादा ही थक गए थे, इसीलिए आराम फरमाने के लिए धरती की गोद में सरकते चले जा रहे थे । संध्या ने अपनी गुलाबी चुनरी को चारों ओर फैला दिया था । दिन भर काम से थके लोग भी अब थोड़े आराम की चाह में अपने अपने घरों को जा रहे थे । हर किसी के झोले में कुछ ना कुछ ज़रूर था । किसी ने 400 की देहाड़ी में से 20 रुपए की खुशियां खरीद ली थीं, अपने बच्चों के लिए, तो कोई स्वार्थी अपनी थकान का बहाना बना कर ठेके की तरफ घर का कलेश खरीदने निकल पड़ा था, किसी ने बूढ़े पिता के लिए आज बुखार के तीसरे दिन कोई एक ज़रुरत मार कर दवाइयां ले ली थीं, तो किसी ने राशन का सामान खरीद लिया था ।
मगर इन्हीं जैसों में से एक हरिराम आज फिर अपने झोले में सिर्फ मायूसी बटोरे जा रहा था । आज चौथे दिन भी मज़दूर यूनियन की हड़ताल ना टूटी थी । गेहूं ख़ुशी से पिस रहा था, क्योंकि वो जनता था कि आंटा बन कर महंगे दाम में बिक जायेगा मगर हरिराम जैसे घुन तो बेकार में ही पीसे जा रहे थे । मगर करते भी क्या आखिर थे तो घुन ही ना । वही ठेके का काम, वही रोज़ की देहाड़ी । मगर चार दिन से ये देहाड़ी भी बंद थी । पिछला राशन दो दिन तो भूखे पेट की आग को थोड़ा शांत कर गया मगर बाक़ी के दो दिन पहाड़ लग रहे थे । रोज़ इस आस में घर से जाता कि आज हड़ताल टूटेगी, आज कोई काम मिल जायेगा मगर रोज़ निराशा के सिवा और कुछ हाथ नहीं लगता था ।
“नुनुआ की माँ ।” अपने क्वाटर के बाहर छोटे से बरामदे में बिछी टाट पर बैठते हुए हरिराम ने थके हुए स्वर में अपनी पत्नी को पुकारा ।
“आज भी नहीं टूटा ना हड़ताल ?” अन्दर से लोटा में पानी लिए संतोषी आई ।
“कैसे जान जाती हो बिना कहे ही सब बात ?” हरिराम ने लोटा पकड़ते हुए कुछ पल को मायूसी चेहरे से उतार कर उसकी जगह मुस्कराहट सजाते हुए कहा ।
“दस बरस हो गए हैं जी, अब तो आपके बुलाने से ही समझ आ जाता है कि बात खुसी का है या दुखी का ।” पास पड़े गत्ते के टुकड़े को हाथ पंखा बना कर हरिराम को हवा देते हुए संतोषी बोली ।
“रहने दो अब गरम नहीं लगता है, मौसम ठंढाने लगा है ।” मौसम में ठण्ड की आहट महसूस होते ही गरीब का कलेजा एक पल के लिए धक से रह जाता है ये सोच कर कि ठण्ड आ रही है, पता नहीं कैसे समय कटेगा ।
“नहीं तो, अभी कहाँ ठंढा आया है, छठ बाद ठंढा पड़ता है । देखिए आपको पसेना आ रहा है ।” संतोषी ने मन में ठान ही लिया था कि दिसंबर के अंत से पहले वो मानेगी ही नहीं कि ठण्ड पड़ने लगी है । अगर वो ना मानती तो हरिराम को इस तंग हाली में ओढना बिछौना का चिंता भी खाने लगता और वो ऐसा कभी नहीं चाहती थी ।
“आज भी हड़ताल नहीं टूटा । बड़का सब अपना काम अच्छा से चला ही रहा है मगर हम जैसा गरीब सब को सौ रुपैया रोज बढ़ने के नाम पर ई पांच पांच दिन भूखे मार रहा है ।
“अरे आप बेकार का चिंता करते हैं जी, हम मंगला के इहाँ से आंटा ले आये हैं । उसको कोटा में से गहूम मिल जाता है ना तो उसके पास आंटा था । बिहान तक काम चल जायेगा । आप देखिएगा बिहान हड़तालो टूट जाएगा । फिर सब ठीक हो जायेगा ।” हमेशा ही संतोषी की बोली हरिराम के शरीर का सारा थकान निचोड़ लेती है । उसको अपना मन शांत करने के लिए बस संतोषी को एक टक ताकते रहने भर की ज़रुरत ही होती है ।
हरिराम ने अपनी सारी चिंता को किनारे रख कर संतोषी की ओर देखते हुए बड़े शरारती लहज़े में कहा “तुम बोलती बहुते अच्छा हो नुनुआ की माँ ।”
“आपका भी नहीं बुझाता, अभिये केतना टेंसन में थे आ अभिये कईसे बोल रहे हैं ।” संतोषी शर्मा गयी थी ।
हरिराम कुछ और भी कहता मगर तब तक नुनुआ आगया था । फिर संतोषी खाना बनाने चली गयी । रात के समय नुनुआ को खिला कर संतोषी ने हरिराम के लिए खाना परोसा । रोटी और नमक और सूखी मिर्च की चटनी हरिराम के आगे परोस दी संतोषी ने ।
“दाल हम नुनुआ को खिला दिए, आज भर खा लीजिए कल सब ठीक हो जायेगा ।” संतोषी कितनी आशावादी है ये सोच कर हरिराम गहरे से मुस्कुरा दिया ।
“कल क्या होगा वो छोड़ो, आओ पहले खाना खा लें ।”
“अरे आप खाइए ना, हम बर्तन मांज कर खा लेंगे ।” संतोषी ने हरिराम की बात को टालते हुए कहा ।
“बचा होगा तब ना खाओगी, हम जानते हैं इतना ही रोटी बनाई हो और बांकी का कल के लिए बचा ली हो । अब चुप चाप खा लो ।” संतोषी अपनी चोरी पकड़े जाने पर झेंप गयी । दोनों ने साथ साथ खाना खा लिया । पेट भले ही दोनों का ना भरा हो मगर खाने में प्यार की मात्र इतनी थी कि दोनों का मन ज़रूर भर गया । कल कुछ अच्छा होगा इस उम्मीद के साथ दोनों एक दुसरे की तरफ़ देख कर मुस्कुराते हुए सपनों की दुनिया घूमने निकल पड़े ।
अगले दिन सुबह के चार बजे
बर्तनों की आवाज़ से हरिराम की नींद खुल गयी । उसने बिस्तर पर देखा तो संतोषी नहीं थी । “अभी तो दिन भी नहीं चढ़ा फिर संतोषी काहे उठ गयी।" हरिराम भी बिस्तर से उठ गया । बाहर जा कर देखा तो संतोषी के हाथ में गुड़ का एक टुकड़ा था जिसके साथ वो पानी पी रही थी ।
“कहे थे थोड़ा और खा लो हमारी रोटी में से बात नहीं मानी, अब देखो खाली गुड़ का डिब्बा झाड़ कर खा रही हो ।” हरिराम ने संतोषी से मजाक करते हुए कहा ।
“नहीं भूख थोड़े ना लगा है । ऊ आज दिन में पानी नहीं ना पीना है इसीलिए अभी पानी पी रहे थे । भोरे भोरे खली पानी नहीं घोंटा रहा था तो गुड़ वाला डिब्बा झाड़ लिए ।” अपनी बात बताते हुए संतोषी के चेहरे पर पांच साल की बच्ची जैसी मासूमियत झलक रही थी ।
“कहे आज पानी कहे नहीं पीओगी ?”
“ऊ आज, करवाचौथ का पबनी है ना इसीलिए ।” संतोषी व्रत की बात बताते हुए शर्मा गयी ।
“अरे ई सब कबसे करने लगी तुम । चार दिन से तो पबनीये कर रही हो तब इसका क्या जरूरत है बताओ । वैसे भी तुम हमारे साथ हो ना हमको कुछो नहीं होगा । ई सब बड़ा लोग का बात है पगली ।” हरिराम ने संतोषी को समझाते हुए कहा ।
“नहीं जी ऐसा नहीं बोलिए, ई सब अपना संतोस का बात होता है । जब तक हम नहीं जानते थे हम नहीं किए लेकिन अब सब औरत लोग करती है तो हमको भी करना है । सब अपना पति से प्रेम करती है तो रखती है, तो सोचो हम तो आपसे बहुते जादा.....” इस से आगे संतोषी शर्मा गयी के चुप हो गयी ।
“हम जानते हैं तुम हमसे बहुत प्रेम करती हो मगर.....”आगे कुछ बोलने से पहले संतोषी ने अपनी ऊँगली हरिराम के होंठों पर रख दी । हरिराम बेचारा पत्नी की जिद के आगे मुस्कुराने के सिवा और कुछ नहीं कर पाया ।
आज हड़ताल टूट जाएगी इस आस में हरिराम काम पर जाने के लिए निकलने लगा तो संतोषी ने उसे टोका “अरे दू ठो रोटी खा लीजिए तब जईयेगा ।”
“अरे नहीं रात का मिरचाई वाला चटनी गर्मी कर दिया है, पेट ठीक नहीं है । क्या पता आज भी हड़ताल नहीं टूटा तो रात में फिर वही खाना होगा इसी लिए अभी नहीं खायेंगे । हड़ताल नहीं टूटा तो आज जल्दी घर आजाएंगे ।” इतना कहते हुए हरिराम ने अपने कदम तेज़ कर लिए ।
“हाँ आज कईसे भी कर के जल्दी आइयेगा ।” संतोषी की बात पर मुस्कुराते हुए हरिराम आगे बढ़ गया ।
शाम घिर आई थी, हरिराम अभी तक घर नहीं लौटा था । संतोषी को पूरी उम्मीद थी कि आज पक्का हड़ताल टूट गयी होगी । संतोषी को ना जाने क्यों आज बहुत घबराहट हो रही थी । हरिराम भी अभी तक लौटा नहीं था, जबकि वो इतनी देर नहीं करता था । संतोषी की बेचैनी बढती जा रही थी ।
इतने में हरिराम सामने से आता दिखा । संतोषी ने सोच लिया था कि आज वो हरिराम को टोकेगी नहीं, क्योंकि उसने उसकी बात नहीं मानी । मगर जब हरिराम पास आया तो उसके सर पर बंधी पट्टी देख संतोषी अपना सारा गुस्सा भूल गयी ।
“हे भगबान, ई क्या हो गया जी ।” संतोषी ने हैरानी में पूछा ।
“अरे कुछो नहीं जरा सा चोट है ।”
“जरा सा चोट है ई ? इतना बड़ा पट्टी बंधा है आ कहते हैं जरा सा चोट है । आप ठीक हैं ना ।” संतोषी की बेचैनी बढती जा रही थी ।
“हाँ हाँ एक दम ठीक हैं, ई लो इसमें मिठाई है और रासन है ।” हरिराम ने ख़ुशी से थैला संतोषी की ओर बढ़ाते हुए कहा ।
“अरे आग लगे मिठाई आ रासन में, आप ई बताइए ई सब कैसे होगया । ई चोट कैसे लगा ।” हरिराम अपनी पीड़ा भरी कराहटों को छुपाने की कोशिश तो कर रहा था मगर वो संतोषी से छुप ना पायीं ।
“बताते हैं जरा साँस लेने दो । दिन में जब गए काम के लिए तो पता चला हड़ताल नहीं टूटा है । हम बहुत मायूस हो कर लौट ही रहे थे कि एक ठो सेठ जी मिल गए । उनको मजदूर नहीं मिल रहा था । हमको बोले कि हजार रुपईया देंगे देहाड़ी का । सीमेंट लोड करना ट्रक में । काम भरी था मगर पईसा अच्छा था इसीलिए हम हाँ बोल दिए । सारा काम हो गया लेकिन अंत में देह में बहुत कमजोरी बुझाने लगा और हम सीमेंट के बोरी लिए गिर गए । सर हमारा एक ठो पत्थर से जा टकराया, ऊ तो तुम्हारा ही पुन परताप था जो बच गए नहीं तो कहीं सीमेंट का बोरा हमारे सर पर गिरता तो समझो बचते नहीं । सेठ जी अच्छा आदमी थे, अपने से इलाज करा दिए आ इहाँ तक छोड़ भी गए ।” हरिराम बोलता रहा संतोषी आंसू बहती रही ।
“आपको कहे थे कुछो खा लीजिए, इहाँ नहीं तो बहार ही खा लेते मगर आप हमारा सुनते कहाँ हैं ।” संतोषी अब बच्चों की तरह रोने लगी ।
“तुम भी हमारा कहाँ सुनती हो, हम बोले थे मत करो पबनी लेकिन नहीं सुनी । अब तुम भूखी रही तो हम कईसे खा लेते । सेठ जी के यहाँ नास्ता मिला था, हम ही नहीं किये । हाँ एक ठो गलती हो गया दबाई खाना था तब पानी पीना पड़ा । देखना कहीं हमारा पबनी टूटने से तुम मत मर जाना ।” हरिराम की आखरी बात पर संतोषी रोते हुए भी हँस पड़ी । उसकी आँखों में हरिराम के प्रति पहले से कहीं ज्यादा स्नेह उमड़ आया ।
“आप नहीं सुधरिएगा । और हम नहीं मरने वाले इतना जल्दी, जान लीजिए । अब जल्दी चलिए चंदरमा देख के कुछो खा लिया जाए ।
“नहीं भूख थोड़े ना लगा है । ऊ आज दिन में पानी नहीं ना पीना है इसीलिए अभी पानी पी रहे थे । भोरे भोरे खली पानी नहीं घोंटा रहा था तो गुड़ वाला डिब्बा झाड़ लिए ।” अपनी बात बताते हुए संतोषी के चेहरे पर पांच साल की बच्ची जैसी मासूमियत झलक रही थी ।
“कहे आज पानी कहे नहीं पीओगी ?”
“ऊ आज, करवाचौथ का पबनी है ना इसीलिए ।” संतोषी व्रत की बात बताते हुए शर्मा गयी ।
“अरे ई सब कबसे करने लगी तुम । चार दिन से तो पबनीये कर रही हो तब इसका क्या जरूरत है बताओ । वैसे भी तुम हमारे साथ हो ना हमको कुछो नहीं होगा । ई सब बड़ा लोग का बात है पगली ।” हरिराम ने संतोषी को समझाते हुए कहा ।
“नहीं जी ऐसा नहीं बोलिए, ई सब अपना संतोस का बात होता है । जब तक हम नहीं जानते थे हम नहीं किए लेकिन अब सब औरत लोग करती है तो हमको भी करना है । सब अपना पति से प्रेम करती है तो रखती है, तो सोचो हम तो आपसे बहुते जादा.....” इस से आगे संतोषी शर्मा गयी के चुप हो गयी ।
“हम जानते हैं तुम हमसे बहुत प्रेम करती हो मगर.....”आगे कुछ बोलने से पहले संतोषी ने अपनी ऊँगली हरिराम के होंठों पर रख दी । हरिराम बेचारा पत्नी की जिद के आगे मुस्कुराने के सिवा और कुछ नहीं कर पाया ।
आज हड़ताल टूट जाएगी इस आस में हरिराम काम पर जाने के लिए निकलने लगा तो संतोषी ने उसे टोका “अरे दू ठो रोटी खा लीजिए तब जईयेगा ।”
“अरे नहीं रात का मिरचाई वाला चटनी गर्मी कर दिया है, पेट ठीक नहीं है । क्या पता आज भी हड़ताल नहीं टूटा तो रात में फिर वही खाना होगा इसी लिए अभी नहीं खायेंगे । हड़ताल नहीं टूटा तो आज जल्दी घर आजाएंगे ।” इतना कहते हुए हरिराम ने अपने कदम तेज़ कर लिए ।
“हाँ आज कईसे भी कर के जल्दी आइयेगा ।” संतोषी की बात पर मुस्कुराते हुए हरिराम आगे बढ़ गया ।
शाम घिर आई थी, हरिराम अभी तक घर नहीं लौटा था । संतोषी को पूरी उम्मीद थी कि आज पक्का हड़ताल टूट गयी होगी । संतोषी को ना जाने क्यों आज बहुत घबराहट हो रही थी । हरिराम भी अभी तक लौटा नहीं था, जबकि वो इतनी देर नहीं करता था । संतोषी की बेचैनी बढती जा रही थी ।
इतने में हरिराम सामने से आता दिखा । संतोषी ने सोच लिया था कि आज वो हरिराम को टोकेगी नहीं, क्योंकि उसने उसकी बात नहीं मानी । मगर जब हरिराम पास आया तो उसके सर पर बंधी पट्टी देख संतोषी अपना सारा गुस्सा भूल गयी ।
“हे भगबान, ई क्या हो गया जी ।” संतोषी ने हैरानी में पूछा ।
“अरे कुछो नहीं जरा सा चोट है ।”
“जरा सा चोट है ई ? इतना बड़ा पट्टी बंधा है आ कहते हैं जरा सा चोट है । आप ठीक हैं ना ।” संतोषी की बेचैनी बढती जा रही थी ।
“हाँ हाँ एक दम ठीक हैं, ई लो इसमें मिठाई है और रासन है ।” हरिराम ने ख़ुशी से थैला संतोषी की ओर बढ़ाते हुए कहा ।
“अरे आग लगे मिठाई आ रासन में, आप ई बताइए ई सब कैसे होगया । ई चोट कैसे लगा ।” हरिराम अपनी पीड़ा भरी कराहटों को छुपाने की कोशिश तो कर रहा था मगर वो संतोषी से छुप ना पायीं ।
“बताते हैं जरा साँस लेने दो । दिन में जब गए काम के लिए तो पता चला हड़ताल नहीं टूटा है । हम बहुत मायूस हो कर लौट ही रहे थे कि एक ठो सेठ जी मिल गए । उनको मजदूर नहीं मिल रहा था । हमको बोले कि हजार रुपईया देंगे देहाड़ी का । सीमेंट लोड करना ट्रक में । काम भरी था मगर पईसा अच्छा था इसीलिए हम हाँ बोल दिए । सारा काम हो गया लेकिन अंत में देह में बहुत कमजोरी बुझाने लगा और हम सीमेंट के बोरी लिए गिर गए । सर हमारा एक ठो पत्थर से जा टकराया, ऊ तो तुम्हारा ही पुन परताप था जो बच गए नहीं तो कहीं सीमेंट का बोरा हमारे सर पर गिरता तो समझो बचते नहीं । सेठ जी अच्छा आदमी थे, अपने से इलाज करा दिए आ इहाँ तक छोड़ भी गए ।” हरिराम बोलता रहा संतोषी आंसू बहती रही ।
“आपको कहे थे कुछो खा लीजिए, इहाँ नहीं तो बहार ही खा लेते मगर आप हमारा सुनते कहाँ हैं ।” संतोषी अब बच्चों की तरह रोने लगी ।
“तुम भी हमारा कहाँ सुनती हो, हम बोले थे मत करो पबनी लेकिन नहीं सुनी । अब तुम भूखी रही तो हम कईसे खा लेते । सेठ जी के यहाँ नास्ता मिला था, हम ही नहीं किये । हाँ एक ठो गलती हो गया दबाई खाना था तब पानी पीना पड़ा । देखना कहीं हमारा पबनी टूटने से तुम मत मर जाना ।” हरिराम की आखरी बात पर संतोषी रोते हुए भी हँस पड़ी । उसकी आँखों में हरिराम के प्रति पहले से कहीं ज्यादा स्नेह उमड़ आया ।
“आप नहीं सुधरिएगा । और हम नहीं मरने वाले इतना जल्दी, जान लीजिए । अब जल्दी चलिए चंदरमा देख के कुछो खा लिया जाए ।
“हाँ चलो, सब आज का पबनी ख़तम करेगा आ हम लोग तीन दिन से सह रहा पबनी समाप्त करेंगे ।” हरिराम की बात पर दोनों खिलखिला कर हँस पड़े । उधर नुनुआ सब बातों से अंजान झोले में से मिठाई निकल कर उसे अमृत जान गपागप खाने लगे । उसे खाता देख दोनों की जैसे तीन दिन से पेट में जल रही भूख की आग अचानक से शांत हो गयी । सब चाँद को देख अपना व्रत तोड़ने में लगे हुए थे और चाँद इन दोनों के प्रेम को देख कर अपने चेहरे पर सुकून भरी मुस्कराहट सजाए बैठा था ।
#फिर_दोबारा_से
धीरज झा
#फिर_दोबारा_से
धीरज झा
*जामुन एक ऐसा वृक्ष जिसके अंग अंग में औषधि है।*🍇 🍇अगर जामुन की मोटी लकड़ी का टुकडा पानी की टंकी में रख दे तो टंकी में शैवाल, हरी काई नहीं जमेगी और पानी सड़ेगा भी नहीं।
🍇जामुन की इस खुबी के कारण इसका इस्तेमाल नाव बनाने में बड़ा पैमाने पर होता है।
🍇पहले के जमाने में गांवो में जब कुंए की खुदाई होती तो उसके तलहटी में जामून की लकड़ी का इस्तेमाल किया जाता है जिसे जमोट कहते है।
🍇दिल्ली की निजामुद्दीन बावड़ी का हाल ही में हुए जीर्णोद्धार से ज्ञात हुआ 700 सालों के बाद भी गाद या अन्य अवरोधों की वजह से यहाँ जल के स्तोत्र बंद नहीं हुए हैं।
🍇भारतीय पुरातत्व विभाग के प्रमुख के.एन. श्रीवास्तव के अनुसार इस बावड़ी की अनोखी बात यह है कि आज भी यहाँ लकड़ी की वो तख्ती साबुत है जिसके ऊपर यह बावड़ी बनी थी। श्रीवास्तव जी के अनुसार उत्तर भारत के अधिकतर कुँओं व बावड़ियों की तली में जामुन की लकड़ी का इस्तेमाल आधार के रूप में किया जाता था।
🍇स्वास्थ्य की दृष्टि से विटामिन सी और आयरन से भरपूर जामुन शरीर में न केवल हीमोग्लोबिन की मात्रा को बढ़ाता। पेट दर्द, डायबिटीज, गठिया, पेचिस, पाचन संबंधी कई अन्य समस्याओं को ठीक करने में अत्यंत उपयोगी है।
🍇एक रिसर्च के मुताबिक, जामुन के पत्तियों में एंटी डायबिटिक गुण पाए जाते हैं, जो रक्त शुगर को नियंत्रित करने करती है। ऐसे में जामुन की पत्तियों से तैयार चाय का सेवन करने से डायबिटीज के मरीजों को काफी लाभ मिलेगा।
🍇सबसे पहले आप एक कप पानी लें। अब इस पानी को तपेली में डालकर अच्छे से उबाल लें। इसके बाद इसमें जामुन की कुछ पत्तियों को धो कर डाल दें। अगर आपके पास जामुन की पत्तियों का पाउडर है, तो आप इस पाउडर को 1 चम्मच पानी में डालकर उबाल सकते हैं। जब पानी अच्छे से उबल जाए, तो इसे कप में छान लें। अब इसमें आप शहद या फिर नींबू के रस की कुछ बूंदे मिक्स करके पी सकते हैं।
🍇जामुन की पत्तियों में एंटी बैक्टीरियल गुण होते हैं. इसका सेवन मसूड़ों से निकलने वाले खून को रोकने में और संक्रमण को फैलने से रोकता है। जामुन की पत्तियों को सुखाकर टूथ पाउडर के रूप में प्रयोग कर सकते हैं. इसमें एस्ट्रिंजेंट गुण होते हैं जो मुंह के छालों को ठीक करने में मदद करते हैं। मुंह के छालों में जामुन की छाल के काढ़ा का इस्तेमाल करने से फायदा मिलता है। जामुन में मौजूद आयरन खून को शुद्ध करने में मदद करता है।
🍇जामुन की लकड़ी न केवल एक अच्छी दातुन है अपितु पानी चखने वाले (जलसूंघा) भी पानी सूंघने के लिए जामुन की लकड़ी का इस्तेमाल करते।
*☘️एक कदम आयुर्वेद की ओर☘️*
🙏🏻
🍇जामुन की इस खुबी के कारण इसका इस्तेमाल नाव बनाने में बड़ा पैमाने पर होता है।
🍇पहले के जमाने में गांवो में जब कुंए की खुदाई होती तो उसके तलहटी में जामून की लकड़ी का इस्तेमाल किया जाता है जिसे जमोट कहते है।
🍇दिल्ली की निजामुद्दीन बावड़ी का हाल ही में हुए जीर्णोद्धार से ज्ञात हुआ 700 सालों के बाद भी गाद या अन्य अवरोधों की वजह से यहाँ जल के स्तोत्र बंद नहीं हुए हैं।
🍇भारतीय पुरातत्व विभाग के प्रमुख के.एन. श्रीवास्तव के अनुसार इस बावड़ी की अनोखी बात यह है कि आज भी यहाँ लकड़ी की वो तख्ती साबुत है जिसके ऊपर यह बावड़ी बनी थी। श्रीवास्तव जी के अनुसार उत्तर भारत के अधिकतर कुँओं व बावड़ियों की तली में जामुन की लकड़ी का इस्तेमाल आधार के रूप में किया जाता था।
🍇स्वास्थ्य की दृष्टि से विटामिन सी और आयरन से भरपूर जामुन शरीर में न केवल हीमोग्लोबिन की मात्रा को बढ़ाता। पेट दर्द, डायबिटीज, गठिया, पेचिस, पाचन संबंधी कई अन्य समस्याओं को ठीक करने में अत्यंत उपयोगी है।
🍇एक रिसर्च के मुताबिक, जामुन के पत्तियों में एंटी डायबिटिक गुण पाए जाते हैं, जो रक्त शुगर को नियंत्रित करने करती है। ऐसे में जामुन की पत्तियों से तैयार चाय का सेवन करने से डायबिटीज के मरीजों को काफी लाभ मिलेगा।
🍇सबसे पहले आप एक कप पानी लें। अब इस पानी को तपेली में डालकर अच्छे से उबाल लें। इसके बाद इसमें जामुन की कुछ पत्तियों को धो कर डाल दें। अगर आपके पास जामुन की पत्तियों का पाउडर है, तो आप इस पाउडर को 1 चम्मच पानी में डालकर उबाल सकते हैं। जब पानी अच्छे से उबल जाए, तो इसे कप में छान लें। अब इसमें आप शहद या फिर नींबू के रस की कुछ बूंदे मिक्स करके पी सकते हैं।
🍇जामुन की पत्तियों में एंटी बैक्टीरियल गुण होते हैं. इसका सेवन मसूड़ों से निकलने वाले खून को रोकने में और संक्रमण को फैलने से रोकता है। जामुन की पत्तियों को सुखाकर टूथ पाउडर के रूप में प्रयोग कर सकते हैं. इसमें एस्ट्रिंजेंट गुण होते हैं जो मुंह के छालों को ठीक करने में मदद करते हैं। मुंह के छालों में जामुन की छाल के काढ़ा का इस्तेमाल करने से फायदा मिलता है। जामुन में मौजूद आयरन खून को शुद्ध करने में मदद करता है।
🍇जामुन की लकड़ी न केवल एक अच्छी दातुन है अपितु पानी चखने वाले (जलसूंघा) भी पानी सूंघने के लिए जामुन की लकड़ी का इस्तेमाल करते।
*☘️एक कदम आयुर्वेद की ओर☘️*
🙏🏻
65 वर्षीय शर्मा जी थे। उनकी दोस्ती एक सुंदर महिला से फेसबुक पर हो गयी।
गुड मॉर्निंग, nice pic , wow, से आगे कुछ बातें इनबॉक्स में भी होने लगी।
शर्मा जी खुश रहने लगे। रोज़ इधर उधर से फेसबुकिया फूल💐 भेज देते।
एक दिन उनके मन की हो गयी।
इनबॉक्स में नंबर मांग लिया महिला ने।
अब क्या था। व्हाट्सअप शुरू।
जनाब रोमांटिक मैसेज👨❤️👨 भेजने लगे।
अरे फेसबुक पर महिला आपकी पोस्ट लाइक भर कर ले तो आप स्वयं को शाहरुख खान के अवतार समझने लगते हो। और अगर इस उम्र में फ्रेंड रिक्वेस्ट आ जाये तो कहना ही क्या।
खैर...एक दिन महिला ने फ़ोन लगा लिया: "जल्दी आ जाओ..मेरे पति बाहर गए हैं।"
जनाब बिजली की स्पीड से पहुंच गए।
बात शुरू होने से पहले ही शर्मा जी ने पूछा: “तुम्हारे पति आ गए तो?”
महिला बोली: “नहीं आएंगे और अगर आ भी जाएं तो तुम कालीन साफ करने लगना, थोड़ी देर में चले जायेंगे। वरना टेबल , पंखे साफ करते रहना”
ये बात चल ही रही थी कि डोर बेल बज गई। पतिदेव आ गए।
जनाब शर्मा जी घबरा कर अपना रुमाल निकाल कर टेबल साफ करने लगे।
महिला ने झाड़ू , फटका, डस्टर , वाइपर ला कर पटक दिया।
“लो साफ करो”
पति ने पूछा "कौन है ये।”
पत्नी बोली।
सफाई के लिए हाउसकीपिंग कम्पनी ने भेजा है।
सफाई चलती रही। एक पुराने कप में सफाई वाले शर्मा जी को चाय☕ भी मिली
पंखे, खिड़कियों, कालीनों आदि की सफाई के बाद बुरी तरह थके हारे जनाब शर्मा जी बोले:
“जाऊं मैडम”.
क्योंकि पतिदेव तो खिसकने का नाम ही नहीं ले रहे थे।
मैडम बोली: ओके।
हस्बैंड ने कहा , “पैसे कितने देना है”
पत्नी मुस्कुराते हुए बोली
इनकी कंपनी में एडवांस जमा कर दिया था।
_बाहर निकलते ही शर्मा जी को उनके मित्र भटनागर साहब मिल गये और छूटते ही बोले.. कर आए सफाई शर्मा साहब... पिछले , साल मुझसे करवाई थी....🥴😃😜_
*फिलहाल शर्मा जी ने अब फेसबुक से दूरी बना ली है...* *_
📌दीवाली नजदीक है इसलिए सावधान रहें.. या फिर रुमाल लेकर सफाई करने के लिए तैयार रहें...जनहित में जारी_* 😃😃😃🤣🤣
दीपावली की अग्रिम शुभकामनाएं
गुड मॉर्निंग, nice pic , wow, से आगे कुछ बातें इनबॉक्स में भी होने लगी।
शर्मा जी खुश रहने लगे। रोज़ इधर उधर से फेसबुकिया फूल💐 भेज देते।
एक दिन उनके मन की हो गयी।
इनबॉक्स में नंबर मांग लिया महिला ने।
अब क्या था। व्हाट्सअप शुरू।
जनाब रोमांटिक मैसेज👨❤️👨 भेजने लगे।
अरे फेसबुक पर महिला आपकी पोस्ट लाइक भर कर ले तो आप स्वयं को शाहरुख खान के अवतार समझने लगते हो। और अगर इस उम्र में फ्रेंड रिक्वेस्ट आ जाये तो कहना ही क्या।
खैर...एक दिन महिला ने फ़ोन लगा लिया: "जल्दी आ जाओ..मेरे पति बाहर गए हैं।"
जनाब बिजली की स्पीड से पहुंच गए।
बात शुरू होने से पहले ही शर्मा जी ने पूछा: “तुम्हारे पति आ गए तो?”
महिला बोली: “नहीं आएंगे और अगर आ भी जाएं तो तुम कालीन साफ करने लगना, थोड़ी देर में चले जायेंगे। वरना टेबल , पंखे साफ करते रहना”
ये बात चल ही रही थी कि डोर बेल बज गई। पतिदेव आ गए।
जनाब शर्मा जी घबरा कर अपना रुमाल निकाल कर टेबल साफ करने लगे।
महिला ने झाड़ू , फटका, डस्टर , वाइपर ला कर पटक दिया।
“लो साफ करो”
पति ने पूछा "कौन है ये।”
पत्नी बोली।
सफाई के लिए हाउसकीपिंग कम्पनी ने भेजा है।
सफाई चलती रही। एक पुराने कप में सफाई वाले शर्मा जी को चाय☕ भी मिली
पंखे, खिड़कियों, कालीनों आदि की सफाई के बाद बुरी तरह थके हारे जनाब शर्मा जी बोले:
“जाऊं मैडम”.
क्योंकि पतिदेव तो खिसकने का नाम ही नहीं ले रहे थे।
मैडम बोली: ओके।
हस्बैंड ने कहा , “पैसे कितने देना है”
पत्नी मुस्कुराते हुए बोली
इनकी कंपनी में एडवांस जमा कर दिया था।
_बाहर निकलते ही शर्मा जी को उनके मित्र भटनागर साहब मिल गये और छूटते ही बोले.. कर आए सफाई शर्मा साहब... पिछले , साल मुझसे करवाई थी....🥴😃😜_
*फिलहाल शर्मा जी ने अब फेसबुक से दूरी बना ली है...* *_
📌दीवाली नजदीक है इसलिए सावधान रहें.. या फिर रुमाल लेकर सफाई करने के लिए तैयार रहें...जनहित में जारी_* 😃😃😃🤣🤣
दीपावली की अग्रिम शुभकामनाएं
और चांद मुस्कुरा दिया (कहानी)
दिनकर बाबा आज कुछ ज्यादा ही थक गए थे, इसीलिए आराम फरमाने के लिए धरती की गोद में सरकते चले जा रहे थे । संध्या ने अपनी गुलाबी चुनरी को चारों ओर फैला दिया था । दिन भर काम से थके लोग भी अब थोड़े आराम की चाह में अपने अपने घरों को जा रहे थे । हर किसी के झोले में कुछ ना कुछ ज़रूर था । किसी ने 400 की देहाड़ी में से 20 रुपए की खुशियां खरीद ली थीं, अपने बच्चों के लिए, तो कोई स्वार्थी अपनी थकान का बहाना बना कर ठेके की तरफ घर का कलेश खरीदने निकल पड़ा था, किसी ने बूढ़े पिता के लिए आज बुखार के तीसरे दिन कोई एक ज़रुरत मार कर दवाइयां ले ली थीं, तो किसी ने राशन का सामान खरीद लिया था ।
मगर इन्हीं जैसों में से एक हरिराम आज फिर अपने झोले में सिर्फ मायूसी बटोरे जा रहा था । आज चौथे दिन भी मज़दूर यूनियन की हड़ताल ना टूटी थी । गेहूं ख़ुशी से पिस रहा था, क्योंकि वो जनता था कि आंटा बन कर महंगे दाम में बिक जायेगा मगर हरिराम जैसे घुन तो बेकार में ही पीसे जा रहे थे । मगर करते भी क्या आखिर थे तो घुन ही ना । वही ठेके का काम, वही रोज़ की देहाड़ी । मगर चार दिन से ये देहाड़ी भी बंद थी । पिछला राशन दो दिन तो भूखे पेट की आग को थोड़ा शांत कर गया मगर बाक़ी के दो दिन पहाड़ लग रहे थे । रोज़ इस आस में घर से जाता कि आज हड़ताल टूटेगी, आज कोई काम मिल जायेगा मगर रोज़ निराशा के सिवा और कुछ हाथ नहीं लगता था ।
“नुनुआ की माँ ।” अपने क्वाटर के बाहर छोटे से बरामदे में बिछी टाट पर बैठते हुए हरिराम ने थके हुए स्वर में अपनी पत्नी को पुकारा ।
“आज भी नहीं टूटा ना हड़ताल ?” अन्दर से लोटा में पानी लिए संतोषी आई ।
“कैसे जान जाती हो बिना कहे ही सब बात ?” हरिराम ने लोटा पकड़ते हुए कुछ पल को मायूसी चेहरे से उतार कर उसकी जगह मुस्कराहट सजाते हुए कहा ।
“दस बरस हो गए हैं जी, अब तो आपके बुलाने से ही समझ आ जाता है कि बात खुसी का है या दुखी का ।” पास पड़े गत्ते के टुकड़े को हाथ पंखा बना कर हरिराम को हवा देते हुए संतोषी बोली ।
“रहने दो अब गरम नहीं लगता है, मौसम ठंढाने लगा है ।” मौसम में ठण्ड की आहट महसूस होते ही गरीब का कलेजा एक पल के लिए धक से रह जाता है ये सोच कर कि ठण्ड आ रही है, पता नहीं कैसे समय कटेगा ।
“नहीं तो, अभी कहाँ ठंढा आया है, छठ बाद ठंढा पड़ता है । देखिए आपको पसेना आ रहा है ।” संतोषी ने मन में ठान ही लिया था कि दिसंबर के अंत से पहले वो मानेगी ही नहीं कि ठण्ड पड़ने लगी है । अगर वो ना मानती तो हरिराम को इस तंग हाली में ओढना बिछौना का चिंता भी खाने लगता और वो ऐसा कभी नहीं चाहती थी ।
“आज भी हड़ताल नहीं टूटा । बड़का सब अपना काम अच्छा से चला ही रहा है मगर हम जैसा गरीब सब को सौ रुपैया रोज बढ़ने के नाम पर ई पांच पांच दिन भूखे मार रहा है ।
“अरे आप बेकार का चिंता करते हैं जी, हम मंगला के इहाँ से आंटा ले आये हैं । उसको कोटा में से गहूम मिल जाता है ना तो उसके पास आंटा था । बिहान तक काम चल जायेगा । आप देखिएगा बिहान हड़तालो टूट जाएगा । फिर सब ठीक हो जायेगा ।” हमेशा ही संतोषी की बोली हरिराम के शरीर का सारा थकान निचोड़ लेती है । उसको अपना मन शांत करने के लिए बस संतोषी को एक टक ताकते रहने भर की ज़रुरत ही होती है ।
हरिराम ने अपनी सारी चिंता को किनारे रख कर संतोषी की ओर देखते हुए बड़े शरारती लहज़े में कहा “तुम बोलती बहुते अच्छा हो नुनुआ की माँ ।”
“आपका भी नहीं बुझाता, अभिये केतना टेंसन में थे आ अभिये कईसे बोल रहे हैं ।” संतोषी शर्मा गयी थी ।
हरिराम कुछ और भी कहता मगर तब तक नुनुआ आगया था । फिर संतोषी खाना बनाने चली गयी । रात के समय नुनुआ को खिला कर संतोषी ने हरिराम के लिए खाना परोसा । रोटी और नमक और सूखी मिर्च की चटनी हरिराम के आगे परोस दी संतोषी ने ।
“दाल हम नुनुआ को खिला दिए, आज भर खा लीजिए कल सब ठीक हो जायेगा ।” संतोषी कितनी आशावादी है ये सोच कर हरिराम गहरे से मुस्कुरा दिया ।
“कल क्या होगा वो छोड़ो, आओ पहले खाना खा लें ।”
“अरे आप खाइए ना, हम बर्तन मांज कर खा लेंगे ।” संतोषी ने हरिराम की बात को टालते हुए कहा ।
“बचा होगा तब ना खाओगी, हम जानते हैं इतना ही रोटी बनाई हो और बांकी का कल के लिए बचा ली हो । अब चुप चाप खा लो ।” संतोषी अपनी चोरी पकड़े जाने पर झेंप गयी । दोनों ने साथ साथ खाना खा लिया । पेट भले ही दोनों का ना भरा हो मगर खाने में प्यार की मात्र इतनी थी कि दोनों का मन ज़रूर भर गया । कल कुछ अच्छा होगा इस उम्मीद के साथ दोनों एक दुसरे की तरफ़ देख कर मुस्कुराते हुए सपनों की दुनिया घूमने निकल पड़े ।
अगले दिन सुबह के चार बजे
बर्तनों की आवाज़ से हरिराम की नींद खुल गयी । उसने बिस्तर पर देखा तो संतोषी नहीं थी । “अभी तो दिन भी नहीं चढ़ा फिर संतोषी काहे उठ गयी।" हरिराम भी बिस्तर से उठ गया । बाहर जा कर देखा तो संतोषी के हाथ में गुड़ का एक टुकड़ा था जिसके साथ वो पानी पी रही थी ।
दिनकर बाबा आज कुछ ज्यादा ही थक गए थे, इसीलिए आराम फरमाने के लिए धरती की गोद में सरकते चले जा रहे थे । संध्या ने अपनी गुलाबी चुनरी को चारों ओर फैला दिया था । दिन भर काम से थके लोग भी अब थोड़े आराम की चाह में अपने अपने घरों को जा रहे थे । हर किसी के झोले में कुछ ना कुछ ज़रूर था । किसी ने 400 की देहाड़ी में से 20 रुपए की खुशियां खरीद ली थीं, अपने बच्चों के लिए, तो कोई स्वार्थी अपनी थकान का बहाना बना कर ठेके की तरफ घर का कलेश खरीदने निकल पड़ा था, किसी ने बूढ़े पिता के लिए आज बुखार के तीसरे दिन कोई एक ज़रुरत मार कर दवाइयां ले ली थीं, तो किसी ने राशन का सामान खरीद लिया था ।
मगर इन्हीं जैसों में से एक हरिराम आज फिर अपने झोले में सिर्फ मायूसी बटोरे जा रहा था । आज चौथे दिन भी मज़दूर यूनियन की हड़ताल ना टूटी थी । गेहूं ख़ुशी से पिस रहा था, क्योंकि वो जनता था कि आंटा बन कर महंगे दाम में बिक जायेगा मगर हरिराम जैसे घुन तो बेकार में ही पीसे जा रहे थे । मगर करते भी क्या आखिर थे तो घुन ही ना । वही ठेके का काम, वही रोज़ की देहाड़ी । मगर चार दिन से ये देहाड़ी भी बंद थी । पिछला राशन दो दिन तो भूखे पेट की आग को थोड़ा शांत कर गया मगर बाक़ी के दो दिन पहाड़ लग रहे थे । रोज़ इस आस में घर से जाता कि आज हड़ताल टूटेगी, आज कोई काम मिल जायेगा मगर रोज़ निराशा के सिवा और कुछ हाथ नहीं लगता था ।
“नुनुआ की माँ ।” अपने क्वाटर के बाहर छोटे से बरामदे में बिछी टाट पर बैठते हुए हरिराम ने थके हुए स्वर में अपनी पत्नी को पुकारा ।
“आज भी नहीं टूटा ना हड़ताल ?” अन्दर से लोटा में पानी लिए संतोषी आई ।
“कैसे जान जाती हो बिना कहे ही सब बात ?” हरिराम ने लोटा पकड़ते हुए कुछ पल को मायूसी चेहरे से उतार कर उसकी जगह मुस्कराहट सजाते हुए कहा ।
“दस बरस हो गए हैं जी, अब तो आपके बुलाने से ही समझ आ जाता है कि बात खुसी का है या दुखी का ।” पास पड़े गत्ते के टुकड़े को हाथ पंखा बना कर हरिराम को हवा देते हुए संतोषी बोली ।
“रहने दो अब गरम नहीं लगता है, मौसम ठंढाने लगा है ।” मौसम में ठण्ड की आहट महसूस होते ही गरीब का कलेजा एक पल के लिए धक से रह जाता है ये सोच कर कि ठण्ड आ रही है, पता नहीं कैसे समय कटेगा ।
“नहीं तो, अभी कहाँ ठंढा आया है, छठ बाद ठंढा पड़ता है । देखिए आपको पसेना आ रहा है ।” संतोषी ने मन में ठान ही लिया था कि दिसंबर के अंत से पहले वो मानेगी ही नहीं कि ठण्ड पड़ने लगी है । अगर वो ना मानती तो हरिराम को इस तंग हाली में ओढना बिछौना का चिंता भी खाने लगता और वो ऐसा कभी नहीं चाहती थी ।
“आज भी हड़ताल नहीं टूटा । बड़का सब अपना काम अच्छा से चला ही रहा है मगर हम जैसा गरीब सब को सौ रुपैया रोज बढ़ने के नाम पर ई पांच पांच दिन भूखे मार रहा है ।
“अरे आप बेकार का चिंता करते हैं जी, हम मंगला के इहाँ से आंटा ले आये हैं । उसको कोटा में से गहूम मिल जाता है ना तो उसके पास आंटा था । बिहान तक काम चल जायेगा । आप देखिएगा बिहान हड़तालो टूट जाएगा । फिर सब ठीक हो जायेगा ।” हमेशा ही संतोषी की बोली हरिराम के शरीर का सारा थकान निचोड़ लेती है । उसको अपना मन शांत करने के लिए बस संतोषी को एक टक ताकते रहने भर की ज़रुरत ही होती है ।
हरिराम ने अपनी सारी चिंता को किनारे रख कर संतोषी की ओर देखते हुए बड़े शरारती लहज़े में कहा “तुम बोलती बहुते अच्छा हो नुनुआ की माँ ।”
“आपका भी नहीं बुझाता, अभिये केतना टेंसन में थे आ अभिये कईसे बोल रहे हैं ।” संतोषी शर्मा गयी थी ।
हरिराम कुछ और भी कहता मगर तब तक नुनुआ आगया था । फिर संतोषी खाना बनाने चली गयी । रात के समय नुनुआ को खिला कर संतोषी ने हरिराम के लिए खाना परोसा । रोटी और नमक और सूखी मिर्च की चटनी हरिराम के आगे परोस दी संतोषी ने ।
“दाल हम नुनुआ को खिला दिए, आज भर खा लीजिए कल सब ठीक हो जायेगा ।” संतोषी कितनी आशावादी है ये सोच कर हरिराम गहरे से मुस्कुरा दिया ।
“कल क्या होगा वो छोड़ो, आओ पहले खाना खा लें ।”
“अरे आप खाइए ना, हम बर्तन मांज कर खा लेंगे ।” संतोषी ने हरिराम की बात को टालते हुए कहा ।
“बचा होगा तब ना खाओगी, हम जानते हैं इतना ही रोटी बनाई हो और बांकी का कल के लिए बचा ली हो । अब चुप चाप खा लो ।” संतोषी अपनी चोरी पकड़े जाने पर झेंप गयी । दोनों ने साथ साथ खाना खा लिया । पेट भले ही दोनों का ना भरा हो मगर खाने में प्यार की मात्र इतनी थी कि दोनों का मन ज़रूर भर गया । कल कुछ अच्छा होगा इस उम्मीद के साथ दोनों एक दुसरे की तरफ़ देख कर मुस्कुराते हुए सपनों की दुनिया घूमने निकल पड़े ।
अगले दिन सुबह के चार बजे
बर्तनों की आवाज़ से हरिराम की नींद खुल गयी । उसने बिस्तर पर देखा तो संतोषी नहीं थी । “अभी तो दिन भी नहीं चढ़ा फिर संतोषी काहे उठ गयी।" हरिराम भी बिस्तर से उठ गया । बाहर जा कर देखा तो संतोषी के हाथ में गुड़ का एक टुकड़ा था जिसके साथ वो पानी पी रही थी ।


