Forwarded from इतिहास ज्ञान गंगा (पण्डित पुष्यमित्र शुंग)
Fact 📄
मधुबन तथा बाँसखेड़ा लेख, नालन्दा मुहर तथा सोनीप्त मुद्र में हर्ष को 'परममहेश्वर' (शिव का भक्त) कहा गया है।
हर्षचरित के अनुसार- शशांक के विरुद्ध अभियान से पूर्व इसने 'नीललोहित' (शिव) की पूजा की थी। हर्ष की स्वर्ण मुद्रा (फर्रूखाबाद से प्राप्त) पर शिव-पार्वती के चित्र अंकित है।
राजतंरगिणी के अनुसार "बौद्ध धर्म" अपनाने से पूर्व हर्ष शैव था। अतः हर्ष का व्यक्तिगत धर्म शैव ही प्रतीत होता है।।.......
बाँसखेड़ा का ताम्र लेख (628 ईस्वी) उत्तरप्रदेश के शाहजहाँपुर जिले से (1894) में प्राप्त। इसमें हर्ष द्वारा अहिच्छत्र भुक्ति के मर्कटसागर नामक गाँव को बालचन्द्र तथा भट्टस्वामी नामक भारद्वाजगोत्रीय ब्राह्मणों को दान देने का विवरण है। इसमें हर्ष के वंश के मूलपुरुष पुष्यभूति की चर्चा नहीं हैं किन्तु 'नरवर्धन से लेकर राज्यवर्धन द्वितीय तक की सम्पूर्ण वंशावली राजमाताओं के नाम सहित दी गई है। राज्यवर्धन द्वारा मालवराज देवगुप्त पर विजय तथा गौड़ नरेश शंशाक द्वारा उसकी हत्या का विवरण भी दिया गया है। यह हर्षकालीन प्रथम अभिलेख है। इसमें हर्ष के 'हस्ताक्षर' मिलते है तथा हर्ष को 'महाराजाधिराज' कहा गया है।
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मधुबन तथा बाँसखेड़ा लेख, नालन्दा मुहर तथा सोनीप्त मुद्र में हर्ष को 'परममहेश्वर' (शिव का भक्त) कहा गया है।
हर्षचरित के अनुसार- शशांक के विरुद्ध अभियान से पूर्व इसने 'नीललोहित' (शिव) की पूजा की थी। हर्ष की स्वर्ण मुद्रा (फर्रूखाबाद से प्राप्त) पर शिव-पार्वती के चित्र अंकित है।
राजतंरगिणी के अनुसार "बौद्ध धर्म" अपनाने से पूर्व हर्ष शैव था। अतः हर्ष का व्यक्तिगत धर्म शैव ही प्रतीत होता है।।.......
बाँसखेड़ा का ताम्र लेख (628 ईस्वी) उत्तरप्रदेश के शाहजहाँपुर जिले से (1894) में प्राप्त। इसमें हर्ष द्वारा अहिच्छत्र भुक्ति के मर्कटसागर नामक गाँव को बालचन्द्र तथा भट्टस्वामी नामक भारद्वाजगोत्रीय ब्राह्मणों को दान देने का विवरण है। इसमें हर्ष के वंश के मूलपुरुष पुष्यभूति की चर्चा नहीं हैं किन्तु 'नरवर्धन से लेकर राज्यवर्धन द्वितीय तक की सम्पूर्ण वंशावली राजमाताओं के नाम सहित दी गई है। राज्यवर्धन द्वारा मालवराज देवगुप्त पर विजय तथा गौड़ नरेश शंशाक द्वारा उसकी हत्या का विवरण भी दिया गया है। यह हर्षकालीन प्रथम अभिलेख है। इसमें हर्ष के 'हस्ताक्षर' मिलते है तथा हर्ष को 'महाराजाधिराज' कहा गया है।
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UGC NET. इतिहास
इतिहास की महत्त्वपूर्ण पुस्तकें (UGC NET/ PGT/TGT)
💐प्राचीन भारत–के सी श्रीवास्तव, पप्पू सिंह प्रजापत, सौरभ चौबे।
💐मध्यकालीन भारत–सौरभ चौबे, पप्पू सिंह प्रजापत।
💐आधुनिक भारत–परिक्षावाणी, अरविंद भास्कर।
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💐प्राचीन भारत–के सी श्रीवास्तव, पप्पू सिंह प्रजापत, सौरभ चौबे।
💐मध्यकालीन भारत–सौरभ चौबे, पप्पू सिंह प्रजापत।
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महावंश में लिखा है कि निगरोध( एक नाम सुमनरो भी) ने राजा को क्षणिकता का सिद्धांत समझाया क्योंकि निग्रोध राजा अशोक निग्रोध के राजा के सिंहासन पर बैठने से व्याकुल हो गए थे इससे प्रश्न होकर राजा अशोक ने 60 हजार बौद्ध भिक्षुओं का दान नियत किया जो पहले ब्राह्मणों को दिया जाता था इस घटना से एक रात्रि पूर्व सम्राट अशोक एक स्वप्न देखा था जो इस प्रकार था कि धर्म से इतर कार्य करने पर कालाशोक को लोटोकुंबिया नरक में देखते है तथा उनकी बहन आनंदी उनको बौद्ध के बारे में बतलाती है । ये संपूर्ण घटना महावन विहार की है। अभिषेक के चौथे वर्ष इसी समय ही संघमित्रा और सुमन व उपगुप्त तीशय ने बौद्ध धर्म किया था
वहीं महावंश में अद्वितीय महकोला नागराज का प्रकरण भी आता है जिसने चार बुद्धों के दर्शन किए थे उनके द्वारा बुद्ध की प्रतिकृति उत्पन्न की जिससे अशोक ने सर्वप्रथम बुध को देखा और 7 दिवस तक जश्न मनाया (ये प्रमाण भी है अशोक के काल में बुद्ध की मूर्ति बनाने का) यह घटना 260bc के पूर्व की प्रतीत होती है
वहीं दिव्यदान के अनुसार राजा लुंबिनी पहुंचा साथ में उपगुप्त भी थे वहां सम्राट पूर्णरूपेण बौद्ध हुए
इसी द्विवदान में भिक्षु बाल्पाणिदित्य (एक नाम समुद्र भी) के प्रभाव से बौद्ध धर्म में दीक्षित हुए मेरी निजी राय में ये निग्रोध व बाल्पाणिदित्य एक ही व्यक्ति प्रतीत होते है क्योंकि ये दोनों ही बालक बताए गए है )
वहीं आगे वर्णन आता है कि उपगुप्त को गुरु बनाकर बौद्ध धर्मों की तीर्थ यात्रा की यहां गौर करने वाली बात ये है कि उपगुप्त भी पूर्ण संघ को समर्पित या राजकीय पद को त्याग नहीं पाए थे परंतु निग्रोध पूर्ण रूपेण बौद्ध थे
Dinesh k Prajapat
(JRF & Phd Scholor)
वहीं महावंश में अद्वितीय महकोला नागराज का प्रकरण भी आता है जिसने चार बुद्धों के दर्शन किए थे उनके द्वारा बुद्ध की प्रतिकृति उत्पन्न की जिससे अशोक ने सर्वप्रथम बुध को देखा और 7 दिवस तक जश्न मनाया (ये प्रमाण भी है अशोक के काल में बुद्ध की मूर्ति बनाने का) यह घटना 260bc के पूर्व की प्रतीत होती है
वहीं दिव्यदान के अनुसार राजा लुंबिनी पहुंचा साथ में उपगुप्त भी थे वहां सम्राट पूर्णरूपेण बौद्ध हुए
इसी द्विवदान में भिक्षु बाल्पाणिदित्य (एक नाम समुद्र भी) के प्रभाव से बौद्ध धर्म में दीक्षित हुए मेरी निजी राय में ये निग्रोध व बाल्पाणिदित्य एक ही व्यक्ति प्रतीत होते है क्योंकि ये दोनों ही बालक बताए गए है )
वहीं आगे वर्णन आता है कि उपगुप्त को गुरु बनाकर बौद्ध धर्मों की तीर्थ यात्रा की यहां गौर करने वाली बात ये है कि उपगुप्त भी पूर्ण संघ को समर्पित या राजकीय पद को त्याग नहीं पाए थे परंतु निग्रोध पूर्ण रूपेण बौद्ध थे
Dinesh k Prajapat
(JRF & Phd Scholor)
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मेगस्थनीज ने मौर्य प्रशासन में सैनिक गतिविधियों के संचालन के लिए कितनी उप - समितियों का उल्लेख किया है ?
Anonymous Quiz
7%
4
52%
6
28%
8
8%
10
5%
12
❤4
निम्न में से " बाघ में उत्कीर्ण गुफाओं " की संख्या कितनी है ?
Anonymous Quiz
9%
6
36%
9
39%
13
11%
15
5%
20
👍7
हाथी पर सवार सम्राट का चित्र किस गुप्त शासक के सिक्के पर मिलता है ?
Anonymous Quiz
18%
चंद्रगुप्त 2
43%
कुमारगुप्त 1
33%
स्कंदगुप्त
6%
पुरुगुप्त
👍3
Forwarded from ✍ इतिहास की जिज्ञासा
कुम्भ मेला का ऐतिहासिक परिप्रेक्ष्य✍👇
इलाहाबाद कुंभ मेला, माघ मेले को बड़ा और स्थायी रूप देने के लिए प्रयागवाल पुरोहितों द्वारा विकसित किया गया।
जेम्स लोचफेल्ड के अनुसार प्रारंभ में केवल हरिद्वार मेला 'कुंभ मेला' कहलाता था।
18वीं सदी: हरिद्वार मेले के बाद इलाहाबाद के माघ मेले तथा नासिक और उज्जैन के सिंहस्थ मेलों को जोड़ा गया।
कुंभ मेले का धार्मिक और आर्थिक महत्व बढ़ाने तथा इसे चारों शहरों (हरिद्वार, इलाहाबाद, नासिक और उज्जैन) में विस्तार देने में हिन्दू अखाड़ों की भूमिका प्रमुख थी।
इलाहाबाद: 19वीं सदी के अंत तक 'क्वीन ऑफ नॉर्थ'
हाईकोर्ट (1867), मुइर सेंट्रल कॉलेज (1877), और इलाहाबाद विश्वविद्यालय (1887) की स्थापना हुई।
ब्रिटिश हस्तक्षेप न होने की नीति के कारण कुंभ मेले का उपयोग राष्ट्रवादी गतिविधियों के लिए किया गया।
19वीं सदी: इलाहाबाद 1857 के विद्रोह के बाद प्रशासन और धार्मिक गतिविधियों का केंद्र बना।
राष्ट्रीय आंदोलन में कुंभ मेला
1 नवंबर 1858 को इलाहाबाद (मालवीय पार्क) में लॉर्ड कैनिंग ने ब्रिटिश महारानी की घोषणा पढ़ी, जिसमें धार्मिक मामलों में हस्तक्षेप न करने का वादा था।
स्वतंत्रता सेनानी मदन मोहन मालवीय ने इसे भारतीयों के लिए 'मैग्ना कार्टा' कहा।
1907 कुंभ मेला: बाल गंगाधर तिलक ने मेले में स्वदेशी का प्रचार किया।
साधुओं ने स्वदेशी और राष्ट्रवाद का संदेश फैलाया।
गोपाल कृष्ण गोखले ने भी मेले में भाग लिया।
1920: तिलक की मृत्यु के बाद उनकी अस्थियां संगम में विसर्जित की गईं।
1930: कांग्रेस ने कुंभ और माघ मेलों में स्थायी शिविर लगाए।
साधुओं ने विदेशी वस्तुओं और नशे के बहिष्कार के लिए प्रचार किया।
1936 अर्धकुंभ: स्वदेशी लीग ने भारत माता की प्रतिमा प्रदर्शित की।
सामाजिक सुधार और कुंभ मेला
1930 मेला: ब्रिटिश सरकार ने शारदा विवाह अधिनियम (1929) का प्रचार किया।
1998: कुंभ मेले में एंटी-डौरी प्रचार, टीकाकरण अभियान, और कृषि जागरूकता के प्रयास देखे गए।
इलाहाबाद कुंभ मेला, माघ मेले को बड़ा और स्थायी रूप देने के लिए प्रयागवाल पुरोहितों द्वारा विकसित किया गया।
जेम्स लोचफेल्ड के अनुसार प्रारंभ में केवल हरिद्वार मेला 'कुंभ मेला' कहलाता था।
18वीं सदी: हरिद्वार मेले के बाद इलाहाबाद के माघ मेले तथा नासिक और उज्जैन के सिंहस्थ मेलों को जोड़ा गया।
कुंभ मेले का धार्मिक और आर्थिक महत्व बढ़ाने तथा इसे चारों शहरों (हरिद्वार, इलाहाबाद, नासिक और उज्जैन) में विस्तार देने में हिन्दू अखाड़ों की भूमिका प्रमुख थी।
इलाहाबाद: 19वीं सदी के अंत तक 'क्वीन ऑफ नॉर्थ'
हाईकोर्ट (1867), मुइर सेंट्रल कॉलेज (1877), और इलाहाबाद विश्वविद्यालय (1887) की स्थापना हुई।
ब्रिटिश हस्तक्षेप न होने की नीति के कारण कुंभ मेले का उपयोग राष्ट्रवादी गतिविधियों के लिए किया गया।
19वीं सदी: इलाहाबाद 1857 के विद्रोह के बाद प्रशासन और धार्मिक गतिविधियों का केंद्र बना।
राष्ट्रीय आंदोलन में कुंभ मेला
1 नवंबर 1858 को इलाहाबाद (मालवीय पार्क) में लॉर्ड कैनिंग ने ब्रिटिश महारानी की घोषणा पढ़ी, जिसमें धार्मिक मामलों में हस्तक्षेप न करने का वादा था।
स्वतंत्रता सेनानी मदन मोहन मालवीय ने इसे भारतीयों के लिए 'मैग्ना कार्टा' कहा।
1907 कुंभ मेला: बाल गंगाधर तिलक ने मेले में स्वदेशी का प्रचार किया।
साधुओं ने स्वदेशी और राष्ट्रवाद का संदेश फैलाया।
गोपाल कृष्ण गोखले ने भी मेले में भाग लिया।
1920: तिलक की मृत्यु के बाद उनकी अस्थियां संगम में विसर्जित की गईं।
1930: कांग्रेस ने कुंभ और माघ मेलों में स्थायी शिविर लगाए।
साधुओं ने विदेशी वस्तुओं और नशे के बहिष्कार के लिए प्रचार किया।
1936 अर्धकुंभ: स्वदेशी लीग ने भारत माता की प्रतिमा प्रदर्शित की।
सामाजिक सुधार और कुंभ मेला
1930 मेला: ब्रिटिश सरकार ने शारदा विवाह अधिनियम (1929) का प्रचार किया।
1998: कुंभ मेले में एंटी-डौरी प्रचार, टीकाकरण अभियान, और कृषि जागरूकता के प्रयास देखे गए।
👍10❤2👌1
पल्लव शासकों के अनुदान अभिलेखों व सिक्कों पर निम्नलिखित में से किसका अंकन नही है ?
Anonymous Quiz
25%
लिंग
31%
वृषभ
30%
मत्स्य
13%
सिंह
❤2👍1🔥1👌1
𝐇𝐢𝐬𝐭𝐨𝐫𝐲 𝐒𝐭𝐮𝐝𝐲 𝐓𝐢𝐦𝐞 ᵁᵍᶜ ⁿᵉᵗ ᴿᵖˢᶜ ᶠⁱʳˢᵗ ᴳʳᵃᵈᵉ
कई विद्यार्थी इसमें उलझे है कि इनमें से बेस्ट कौनसी है आर्य का ट्रैक रिकॉर्ड काफी अच्छा रहा है और सभी यही पढ़ते आए है लेकिन इसमें अवधारणाओं की थोड़ी कमी ख़लती है क्या वो नाथ पब्लिकेशन ने पूरी किया है या तीनों पार्ट में से कौनसा किस्में ज्यादा अच्छा से लिखा…
नाथ की इस बुक का रिव्यू लिखने को मैने महीना भर पहले बोला था
इस पुस्तक में आपको
(1)
प्राचीन भारत में मौर्य और गुप्त टॉपिक बहुत अच्छे से काम हुआ है वहीं अन्य टॉपिक्स में आपको आर्य से खास कुछ अलग नहीं मिलेगा इनफेक्ट स्रोत ओर पाषाण जैसे टॉपिक आपको निराश की करेंगे
(2)
मध्यकालीन भारत में बहुत अच्छा लिखा है और काफी विस्तृत भी है लेकिन इसकी कमी यह है कि तथ्यों का रिपिटेशन अत्यधिक हुआ है जैसे अकबर पूरा होते ही पुनः शुरू हो जाता है शॉर्ट के नाम पर ,फिर वही तथ्य छाप दिए गए है
इसकी दूसरी ओर सबसे बड़ी खलने वाली कमी यह है कि यहां आपको गलतियों की भरमार मिलेगी
(3) आधुनिक पार्ट में भी अच्छा कार्य हुआ है लेकिन गलतियां आपको यहां भी खूब मिलेगी और रिपिटेशन आपको हर बार इरिटेट करता रहेगा
(काफी गलतियां मैने लेखक को बताई है शायद वे PDF के माध्यम से उपलब्ध करवा दे )
असल में या शायद इस पुस्तक के साथ हुआ ये है कि 4 /5 लेखकों ने बारी बारी से काम किया है तो एक लेखक ने लिख कर दूसरे को सौंपी तो दूसरे ने भी वही तथ्य दुबारा लिख दिए इस कारण 1 ही तथ्य 3/4 बार लिख दिया ओर कई बार अलग अलग भी ।
इन कमियों के बाद भी यह आर्य से अधिक मैटर को समेटे हुए है लेकिन इन कमियों को ढोने से अच्छा है तीनों पार्ट के अलग अलग पुस्तक ही पढ़ी जाए क्योंकि उन्हें पढ़ने में आपको इससे कुछ ही समय अधिक लगेगा ज्यादा नहीं । और यह बुक किसी भी रूप में छोटी भी नहीं कही जा सकती 850+ (पाषाण काल आधा छपना रह गया)
यह रिव्यू पढ़ कर आप सोचेंगे कि नकारात्मक ओर एकतरफा लिखा गया है लेकिन सच्चाई तो यही है ओर विश्वाश नहीं है तो स्वयं पढ़ कर देख लीजिए
✍️ सुरेश बिश्नोई
@Sureshvishnoi99
इस पुस्तक में आपको
(1)
प्राचीन भारत में मौर्य और गुप्त टॉपिक बहुत अच्छे से काम हुआ है वहीं अन्य टॉपिक्स में आपको आर्य से खास कुछ अलग नहीं मिलेगा इनफेक्ट स्रोत ओर पाषाण जैसे टॉपिक आपको निराश की करेंगे
(2)
मध्यकालीन भारत में बहुत अच्छा लिखा है और काफी विस्तृत भी है लेकिन इसकी कमी यह है कि तथ्यों का रिपिटेशन अत्यधिक हुआ है जैसे अकबर पूरा होते ही पुनः शुरू हो जाता है शॉर्ट के नाम पर ,फिर वही तथ्य छाप दिए गए है
इसकी दूसरी ओर सबसे बड़ी खलने वाली कमी यह है कि यहां आपको गलतियों की भरमार मिलेगी
(3) आधुनिक पार्ट में भी अच्छा कार्य हुआ है लेकिन गलतियां आपको यहां भी खूब मिलेगी और रिपिटेशन आपको हर बार इरिटेट करता रहेगा
(काफी गलतियां मैने लेखक को बताई है शायद वे PDF के माध्यम से उपलब्ध करवा दे )
असल में या शायद इस पुस्तक के साथ हुआ ये है कि 4 /5 लेखकों ने बारी बारी से काम किया है तो एक लेखक ने लिख कर दूसरे को सौंपी तो दूसरे ने भी वही तथ्य दुबारा लिख दिए इस कारण 1 ही तथ्य 3/4 बार लिख दिया ओर कई बार अलग अलग भी ।
इन कमियों के बाद भी यह आर्य से अधिक मैटर को समेटे हुए है लेकिन इन कमियों को ढोने से अच्छा है तीनों पार्ट के अलग अलग पुस्तक ही पढ़ी जाए क्योंकि उन्हें पढ़ने में आपको इससे कुछ ही समय अधिक लगेगा ज्यादा नहीं । और यह बुक किसी भी रूप में छोटी भी नहीं कही जा सकती 850+ (पाषाण काल आधा छपना रह गया)
यह रिव्यू पढ़ कर आप सोचेंगे कि नकारात्मक ओर एकतरफा लिखा गया है लेकिन सच्चाई तो यही है ओर विश्वाश नहीं है तो स्वयं पढ़ कर देख लीजिए
✍️ सुरेश बिश्नोई
@Sureshvishnoi99
👍3🔥2👏2❤1😢1
मैं किसी के खिलाफ या साथ नहीं हु पर मैने इतिहास क्षेत्र के नामी विद्वान लेखकों के साथ काम किया है जिनसे आप में कई अभ्यर्थी परिचित भी होंगे ।
मेरा सवाल यही है कि
किसी किताब की प्रूफ रीडिंग नहीं हुई होती क्या? जो बार बार तथ्यों की पुनरावृति हो जाती या गलतियों की गुंजाइश रह जाती ?
मुझे लगता कारण ये है कि आज हर कोई लेखन में कूद रहा और बेरोजगारी को देखते हुए एवं सरकारी नौकरी की चाह ने किताब लेखन को एक बिजनेस सा बना दिया है। हर कोई लेखक बन रहा क्योंकि टेक्नोलोजी के इस्तेमाल ने लेखन का काम आसान कर दिया है वहीं मैटर आज सर्वत्र उपलब्ध है बाजार की टॉप बिकने वाली एक दो किताब को उठा के दूसरी में छाप दो बस इतना ही तो करना पड़ रहा ।
फायदा उठाने की जल्दबाजी में न लेखन सही हो रहा न उसकी भाषा न उसमें कोई सृजनात्मकता न ही अच्छी प्रूफ रीडिंग ।
याद करिए 2018 से पहले कितनी किताबें उपलब्ध थी बाजार में ? जो उपलब्ध थी उनको आने में साल दो साल का समय खफ जाता था..... पर आज मात्र 1 या ज्यादा से ज्यादा 2 माह में किताबें छपने को चली जाती है ।
इसकी वजह से किताबों में उल्लपब्ध तथ्यों की गुणवत्ता पर ही शंका उत्पन्न होती है ।
जबकि पुरानी किताबों में मात्र टाइपिंग की गलती के अलावा एक दो तथ्यात्मक गलती मिलती थी जो सामान्य सी बात है ।
वहीं दूसरी समस्या एक किताब को आए तीन चार माह हुए नहीं की दूसरा एडिशन आने को तैयार मतलब पुनः बेरोजगार अभ्यर्थी को खरीदना पड़ेगा।
आप सभी प्रज्ञाचक्षु खोलकर पुरानी किताबों को देखिए? और विचार कीजिए उनके कितनों के नए एडिशन आए और कितने दिन में आए ?
वर्तमान युग में शिक्षा और बेरोजगारी को अच्छे से भुनाया जा रहा है । परन्तु एक बेरोजगार अभ्यर्थी को देखता हु तो बहुत पीड़ा होती ही है । क्योंकि मैने स्वयं ने वो दिन देखे है जब किताब खरीदने के पैसे नहीं हुआ करते थे।
खैर आदरणीय लेखक मित्रो से निवेदन है नई नई किताबों का लेखन कीजिए परन्तु प्रयास यही करें कि गलतियां कम से कम हो तथ्य की पुनरावृति कम से कम रखी जाए ,लेखन की भाषा शैली को वैज्ञानिक दृष्टिकोण के अनुसार एक सामान्य अभ्यर्थी समझ सके ऐसी रखा जाए एवं तथ्यों की गुणवत्ता को बढ़ाने का प्रयास हो
धन्यवाद
मेरे विचार किसी को ठेस पहुंचाए तो क्षमा करें
Dinesh k Prajapat
(JRF & PHD Scholar)
मेरा सवाल यही है कि
किसी किताब की प्रूफ रीडिंग नहीं हुई होती क्या? जो बार बार तथ्यों की पुनरावृति हो जाती या गलतियों की गुंजाइश रह जाती ?
मुझे लगता कारण ये है कि आज हर कोई लेखन में कूद रहा और बेरोजगारी को देखते हुए एवं सरकारी नौकरी की चाह ने किताब लेखन को एक बिजनेस सा बना दिया है। हर कोई लेखक बन रहा क्योंकि टेक्नोलोजी के इस्तेमाल ने लेखन का काम आसान कर दिया है वहीं मैटर आज सर्वत्र उपलब्ध है बाजार की टॉप बिकने वाली एक दो किताब को उठा के दूसरी में छाप दो बस इतना ही तो करना पड़ रहा ।
फायदा उठाने की जल्दबाजी में न लेखन सही हो रहा न उसकी भाषा न उसमें कोई सृजनात्मकता न ही अच्छी प्रूफ रीडिंग ।
याद करिए 2018 से पहले कितनी किताबें उपलब्ध थी बाजार में ? जो उपलब्ध थी उनको आने में साल दो साल का समय खफ जाता था..... पर आज मात्र 1 या ज्यादा से ज्यादा 2 माह में किताबें छपने को चली जाती है ।
इसकी वजह से किताबों में उल्लपब्ध तथ्यों की गुणवत्ता पर ही शंका उत्पन्न होती है ।
जबकि पुरानी किताबों में मात्र टाइपिंग की गलती के अलावा एक दो तथ्यात्मक गलती मिलती थी जो सामान्य सी बात है ।
वहीं दूसरी समस्या एक किताब को आए तीन चार माह हुए नहीं की दूसरा एडिशन आने को तैयार मतलब पुनः बेरोजगार अभ्यर्थी को खरीदना पड़ेगा।
आप सभी प्रज्ञाचक्षु खोलकर पुरानी किताबों को देखिए? और विचार कीजिए उनके कितनों के नए एडिशन आए और कितने दिन में आए ?
वर्तमान युग में शिक्षा और बेरोजगारी को अच्छे से भुनाया जा रहा है । परन्तु एक बेरोजगार अभ्यर्थी को देखता हु तो बहुत पीड़ा होती ही है । क्योंकि मैने स्वयं ने वो दिन देखे है जब किताब खरीदने के पैसे नहीं हुआ करते थे।
खैर आदरणीय लेखक मित्रो से निवेदन है नई नई किताबों का लेखन कीजिए परन्तु प्रयास यही करें कि गलतियां कम से कम हो तथ्य की पुनरावृति कम से कम रखी जाए ,लेखन की भाषा शैली को वैज्ञानिक दृष्टिकोण के अनुसार एक सामान्य अभ्यर्थी समझ सके ऐसी रखा जाए एवं तथ्यों की गुणवत्ता को बढ़ाने का प्रयास हो
धन्यवाद
मेरे विचार किसी को ठेस पहुंचाए तो क्षमा करें
Dinesh k Prajapat
(JRF & PHD Scholar)
🙏13👍5❤3🔥3👏3😁1
गुप्त अभिलेखों में सोने के सिक्कों के लिए प्रयुक्त दीनार शब्द निम्न में से किस भाषा का है?
Anonymous Quiz
20%
संस्कृत
47%
ग्रीक
11%
चीनी
23%
लेटिन
❤3👍3😱2