कई दिनों से मै स्वयं इस उलझन में था कि ASI के लोगों पर "प्रत्नकीर्त्तिमपावृणु" शब्द का अर्थ क्या है ? क्योंकि कही भी इसका अर्थ नहीं मिलता।
"प्रत्नकीर्त्तिमपावृणु" संस्कृत का एक शब्द है
प्रत्नकीर्त्तिमपावृणु का संधि-विच्छेद इस प्रकार है:
प्रत्न + कीर्ति + अ + पा + वृणु
* प्रत्न: प्राचीन, पुराना
* कीर्ति: यश, प्रसिद्धि, कीर्ति
* अपा: गर्व,अहम
* वृणु: उजागर करना,स्पष्ट करना
इसलिए, संपूर्ण वाक्य का अर्थ होता है किसी प्राचीन यश या कीर्ति के गर्व को अनावृत या उजागर करना
"प्रत्नकीर्त्तिमपावृणु" संस्कृत का एक शब्द है
प्रत्नकीर्त्तिमपावृणु का संधि-विच्छेद इस प्रकार है:
प्रत्न + कीर्ति + अ + पा + वृणु
* प्रत्न: प्राचीन, पुराना
* कीर्ति: यश, प्रसिद्धि, कीर्ति
* अपा: गर्व,अहम
* वृणु: उजागर करना,स्पष्ट करना
इसलिए, संपूर्ण वाक्य का अर्थ होता है किसी प्राचीन यश या कीर्ति के गर्व को अनावृत या उजागर करना
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निम्न में से " prehistory and proto - history of india and pakistan ( 1962 - 63 ) किसकी पुस्तक है ?
Anonymous Quiz
11%
दयाराम साहनी
43%
एच. डी. सांकलिया
27%
राखालदास बनर्जी
11%
एम. एस . वत्स
8%
अमलानंद घोष
👍5
𝐇𝐢𝐬𝐭𝐨𝐫𝐲 𝐒𝐭𝐮𝐝𝐲 𝐓𝐢𝐦𝐞 ᵁᵍᶜ ⁿᵉᵗ ᴿᵖˢᶜ ᶠⁱʳˢᵗ ᴳʳᵃᵈᵉ
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21वीं सदी में भारत अतीत की युद्धभूमि है। एक अनोखे भय, सामाजिक विभाजन और अजनबीपन से मानवता फिर घिर गई है। अतीत की खाइयों में आई इस रौनक को कहीं पुनर्जागरण कहा गया है, कहीं विपर्यय। इसका ज्यादा असर कलाओं, इतिहासबोध और मानवीय संवेदनशीलता पर है। इस परिघटना को समझने के लिए न सिर्फ उत्तर-आधुनिक विमर्शों पर पुनर्विचार जरूरी है, बल्कि आधुनिक महा-आख्यानों से भी आगे बढ़कर सोचना समय की मांग है। हमें नए विचारों की जरूरत है। समाज में 'संवेदनशीलता का संकट' आज चरम पर है। यह उत्तर-आधुनिक वैचारिक खोखलेपन की देन है। अब वे क्षमतावान हैं जो उदार न होकर पोस्ट-मॉडर्न हैं। सभी रंगों के उत्तर-आधुनिक विमर्श, जिनमें नव-धार्मिक विमर्श भी हैं, कट्टर पोस्ट-मॉडर्न हैं। इनमें आधुनिकता के प्रमुख तत्वों-बुद्धिपरकता, समावेशी राष्ट्रीयता, लोकतांत्रिक चेतना और प्रगतिशील सोच का ही विरोध नहीं है, मानवीय मूल्यों से भी किनाराकशी है। अपनी दृष्टि के स्तर पर आधुनिक हुए बिना उत्तर-आधुनिक होने का अर्थ समाज को पुरानी कट्टरताओं के अखाड़े में बदलना है। ऐसी घड़ियों में 'बहुलता' की प्रतिष्ठा न्यायपूर्ण सामंजस्य में न होकर निर्बुद्धिपरक अंतर्शत्रुताओं में होती है और एक सांस्कृतिक गृहयुद्ध की स्थिति आ जाती है, जिसकी कोई भी परिणति हो सकती है। इसमें कुछ भी आश्चर्यजनक नहीं है, यदि 'एलीट बुद्धिजीवी' और 'लोक' आज विपरीत ध्रुव पर हैं। लोकतंत्र के दुरुपयोग और अति-राजनीतिकरण का इससे भिन्न नतीजा नहीं हो सकता कि लोग बड़े पैमाने पर 'आधुनिक प्रिमिटिविज्म' की ओर आकर्षित हों। लोग सोचने लगे हैं कि अब नागरिक समाज नहीं, उनका धार्मिक, जातिवादी या प्रांतीय समुदाय उनके लिए छत है। साहित्य किसी युग में सत्ता के पीछे नहीं चला है। ज्ञान की दुनिया में यह उसकी विशिष्टता है। वस्तुतः साहित्यिक श्रेष्ठता और बौद्धिक स्वतंत्रता के बीच गहरा संबंध है । साहित्य का काम है मनुष्य के दृष्टिकोण, सौंदर्यबोध और भाव जगत का प्रसार करना । उसमें कृत्रिम 'पर’ के लिए जगह नहीं होती । स्थानीयता और अखंडता के बीच अंतर्विरोध नहीं होता। यही वजह है कि साहित्य किसी एक इतिहास का होकर भी उस इतिहास का, एक संस्कृति का होकर भी उस संस्कृति का और किसी खास राजनीति का होकर भी उस राजनीति का अतिक्रमण करता है। उसमें निश्छल असहमति होती है। वह 'पोस्ट-टुथ' जैसी चीजों का जवाब तभी बन पाता है। वह ताकत की भाषाओं द्वारा दवाई गई मनुष्यता की आवाज भी तभी बनता है। साहित्य वफादार मस्तिष्क की जगह विद्रोही मस्तिष्क की रचना है।
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ये रात और ये समय अवश्य ही आपको थोड़ा भारी लग रहा होगा परंतु कल आपके जीवन का सबसे खास दिन होने वाला है कल का सूर्य नई उम्मीद और नई आशाओं के साथ उदय होगा ।
आप के मन में हजार तरह के सवाल आ रहे होंगे कि हमने क्या पढ़ा कितना पढ़ा ये रह गया वो रह गया परंतु यकीन मानिए युद्ध भूमि के समक्ष आकर अपनी पूर्व तैयारी पर विचार करके दुखी होना कायरो का काम है.... स्वयं के आत्म विश्वास को जगाओ अपने मन को दृढ़ करो स्वयं में संकल्प लो जैसे ही युद्ध का शंखनाद होगा मै इस रणक्षेत्र में सबसे उत्तम योद्धा बनकर उभरूंगा ।
याद रखिए सीमित हथियारो का सही उपयोग भी युद्ध में विजय दिल देता है अर्थात कम मेहनत का सही उपयोग भी अक्सर सफलता दिला देता है अतः बिना किसी डर के एग्जाम में जाए मन को कठोर बनाए की चाहे मैने एक दिन भी किताब न उठाई पर मैं इस एग्जाम में सफलता प्राप्त करूंगा ही करूंगा ।
याद रखिए सकारात्मकता जीवन में बेहद जरूरी है अतः उसको सदैव आत्मविश्वास के साथ बनाए रखें । सब का मंगल होगा
कल के लिए आपको ढेरो शुभकामनाएं सभी JRF लेके आना ।
नहीं भी कुछ हुआ तो मत घबराना हम फिर से कर लेंगे क्योंकि कोई हो न हो मै आपके साथ सदैव खड़ा हु
शुभ रात्रि❤️😊
आपका अपना
Dinesh k Prajapat
आप के मन में हजार तरह के सवाल आ रहे होंगे कि हमने क्या पढ़ा कितना पढ़ा ये रह गया वो रह गया परंतु यकीन मानिए युद्ध भूमि के समक्ष आकर अपनी पूर्व तैयारी पर विचार करके दुखी होना कायरो का काम है.... स्वयं के आत्म विश्वास को जगाओ अपने मन को दृढ़ करो स्वयं में संकल्प लो जैसे ही युद्ध का शंखनाद होगा मै इस रणक्षेत्र में सबसे उत्तम योद्धा बनकर उभरूंगा ।
याद रखिए सीमित हथियारो का सही उपयोग भी युद्ध में विजय दिल देता है अर्थात कम मेहनत का सही उपयोग भी अक्सर सफलता दिला देता है अतः बिना किसी डर के एग्जाम में जाए मन को कठोर बनाए की चाहे मैने एक दिन भी किताब न उठाई पर मैं इस एग्जाम में सफलता प्राप्त करूंगा ही करूंगा ।
याद रखिए सकारात्मकता जीवन में बेहद जरूरी है अतः उसको सदैव आत्मविश्वास के साथ बनाए रखें । सब का मंगल होगा
कल के लिए आपको ढेरो शुभकामनाएं सभी JRF लेके आना ।
नहीं भी कुछ हुआ तो मत घबराना हम फिर से कर लेंगे क्योंकि कोई हो न हो मै आपके साथ सदैव खड़ा हु
शुभ रात्रि❤️😊
आपका अपना
Dinesh k Prajapat
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Indian History Question Bank - Hindi PDF.pdf
53.4 MB
भारतीय इतिहास-300+ प्रश्न विस्तृत व्याख्या सहित
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𝐇𝐢𝐬𝐭𝐨𝐫𝐲 𝐒𝐭𝐮𝐝𝐲 𝐓𝐢𝐦𝐞 ᵁᵍᶜ ⁿᵉᵗ ᴿᵖˢᶜ ᶠⁱʳˢᵗ ᴳʳᵃᵈᵉ
सिक्ख गुरू .......... 🌿 गुरू नानक देव जी - 1469 - 1539 ई. ( संगत का सकल्प , लंगर की संस्था ) 🌿 गुरू अंगद देव जी - 1504 - 1552 ई. ( गुरू मुखी लिपि को लोकप्रिय बनाना , लंगर प्रथा का विस्तार , उदासी मत का खण्डन , गोइंदवाल साहिब की स्थापना ) 🌿 गुरू अमरदास…
इनसे एक प्रश्न सुमेलित में आया था .... सिक्ख गुरूओं की मृत्यु ( गुरू नानक देव जी , गुरू अमरदास जी , गुरू हरिगोबिन्द सिंह , बंदा सिंह बहादुर )
👍4
निम्न में से गुरू नानक देव जी की मृत्यु किस वर्ष हुई ?
Anonymous Quiz
14%
1574 ई.
12%
1716 ई.
69%
1539 ई.
6%
1582 ई.
👏5👍2
15 वीं शताब्दी का स्वर्ण से निर्मित सबसे प्रसिद्ध सिक्का " वराह " किस साम्राज्य से संबंधित है ?
Anonymous Quiz
16%
चोल साम्राज्य
51%
विजयनगर साम्राज्य
26%
राष्ट्रकूट साम्राज्य
5%
दिल्ली साम्राज्य
2%
अनुत्तरित प्रश्न
❤3
विजयनगर साम्राज्य के संदर्भ में " कुदिरई चेट्टी " शब्द का संबंध निम्नलिखित में से किससे है ?
Anonymous Quiz
23%
कीमती रत्न विक्रेताओं से
10%
सूफी सन्तों से
33%
भू - राजस्व से
14%
दक्कन स्थापत्य से
20%
घोङे के व्यापारियों से
👍8
ब्राह्मण एक हिंदू जाति है जिसका पूरे भारत के इतिहास में उच्च सामाजिक दर्जा और राजनीतिक प्रभाव रहा है। माना जाता है कि वे सबसे अधिक धार्मिक रूप से शुद्ध जाति हैं और पवित्र ज्ञान को पढ़ाने और संरक्षित करने के लिए जिम्मेदार हैं।
प्रारंभिक इतिहास
ब्राह्मणों का उच्च स्थान उत्तर वैदिक काल से ही चला आ रहा है
ब्राह्मण संभवतः पुजारी, शिक्षक और शासक थे
ब्राह्मणों के पुरोहिती कर्तव्य और जाति संभवतः समय के साथ धीरे-धीरे विकसित हुई
ब्राह्मण पवित्र ग्रंथों के अध्ययन और पाठ के लिए जिम्मेदार थे
ऐतिहासिक भूमिकाएँ
ब्राह्मण प्रायः शासक सरदारों के सलाहकार और मंत्री होते थे
ब्राह्मण कृषक, योद्धा, व्यापारी और कारीगर भी थे
ब्रिटिश उपनिवेशवाद से पहले, ब्रिटिश राज के दौरान और स्वतंत्रता के बाद ब्राह्मण राजनीतिक रूप से प्रभावशाली थे
उल्लेखनीय ब्राह्मण
जवाहरलाल नेहरू : स्वतंत्र भारत के प्रथम प्रधानमंत्री
चाणक्य : एक प्राचीन भारतीय बहुश्रुत जिन्होंने मौर्य साम्राज्य की स्थापना में मदद की
हेमाडपंत : एक देशस्थ ऋग्वेदी ब्राह्मण जिन्होंने सेउना यादव राजवंश में प्रधान मंत्री के रूप में कार्य किया
अन्य जातियां
क्षत्रिय : योद्धाओं और राजकुमारों की जाति
वैश्य : किसानों और व्यापारियों की जाति
शूद्र : नौकरों और बटाईदारों की जाति
प्रारंभिक इतिहास
ब्राह्मणों का उच्च स्थान उत्तर वैदिक काल से ही चला आ रहा है
ब्राह्मण संभवतः पुजारी, शिक्षक और शासक थे
ब्राह्मणों के पुरोहिती कर्तव्य और जाति संभवतः समय के साथ धीरे-धीरे विकसित हुई
ब्राह्मण पवित्र ग्रंथों के अध्ययन और पाठ के लिए जिम्मेदार थे
ऐतिहासिक भूमिकाएँ
ब्राह्मण प्रायः शासक सरदारों के सलाहकार और मंत्री होते थे
ब्राह्मण कृषक, योद्धा, व्यापारी और कारीगर भी थे
ब्रिटिश उपनिवेशवाद से पहले, ब्रिटिश राज के दौरान और स्वतंत्रता के बाद ब्राह्मण राजनीतिक रूप से प्रभावशाली थे
उल्लेखनीय ब्राह्मण
जवाहरलाल नेहरू : स्वतंत्र भारत के प्रथम प्रधानमंत्री
चाणक्य : एक प्राचीन भारतीय बहुश्रुत जिन्होंने मौर्य साम्राज्य की स्थापना में मदद की
हेमाडपंत : एक देशस्थ ऋग्वेदी ब्राह्मण जिन्होंने सेउना यादव राजवंश में प्रधान मंत्री के रूप में कार्य किया
अन्य जातियां
क्षत्रिय : योद्धाओं और राजकुमारों की जाति
वैश्य : किसानों और व्यापारियों की जाति
शूद्र : नौकरों और बटाईदारों की जाति
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महावीर और गौतम बुद्ध दोनों भारतीय इतिहास के महान उपदेशक थे. इनकी कहानियां मौखिक और लिखित साहित्य के ज़रिए अगली पीढ़ियों तक पहुंची हैं. इन दोनों महापुरुषों की विचारधारा अहिंसा पर आधारित थी.
महावीर और बुद्ध के बारे में साहित्य में मिलने वाली जानकारी:
महावीर, जैन धर्म के 24वें तीर्थंकर थे.
गौतम बुद्ध, बौद्ध धर्म के संस्थापक थे.
महावीर को पालि साहित्य में निगंता नटपुत्त के नाम से जाना जाता है.
महावीर का जन्म बिहार के वैशाली के पास कुंडग्राम में हुआ था.
महावीर ने 30 साल की उम्र में राजमहल छोड़ दिया था.
गौतम बुद्ध ने भी कम उम्र में घर छोड़ दिया था.
महावीर और गौतम बुद्ध दोनों ने ही वर्ण व्यवस्था का विरोध किया था.
महावीर और गौतम बुद्ध दोनों की शिक्षाओं में अहिंसा, सत्य, अपरिग्रह, ब्रह्मचर्य, सम्यक दर्शन, सम्यक ज्ञान, सम्यक चरित्र, तप और ध्यान जैसे सिद्धांत शामिल हैं.
महावीर और बुद्ध के बारे में साहित्य में मिलने वाली जानकारी:
महावीर, जैन धर्म के 24वें तीर्थंकर थे.
गौतम बुद्ध, बौद्ध धर्म के संस्थापक थे.
महावीर को पालि साहित्य में निगंता नटपुत्त के नाम से जाना जाता है.
महावीर का जन्म बिहार के वैशाली के पास कुंडग्राम में हुआ था.
महावीर ने 30 साल की उम्र में राजमहल छोड़ दिया था.
गौतम बुद्ध ने भी कम उम्र में घर छोड़ दिया था.
महावीर और गौतम बुद्ध दोनों ने ही वर्ण व्यवस्था का विरोध किया था.
महावीर और गौतम बुद्ध दोनों की शिक्षाओं में अहिंसा, सत्य, अपरिग्रह, ब्रह्मचर्य, सम्यक दर्शन, सम्यक ज्ञान, सम्यक चरित्र, तप और ध्यान जैसे सिद्धांत शामिल हैं.
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चीनी यात्री ह्वेन त्सांग ने 629 से 645 ईस्वी के बीच भारत की यात्रा की थी. वह राजा हर्षवर्धन के शासनकाल में भारत आए थे. ह्वेन त्सांग ने बौद्ध धर्म के बारे में अपने ज्ञान को बढ़ाने और बुद्ध के पवित्र स्थलों की यात्रा करने के लिए भारत की यात्रा की थी.
ह्वेन त्सांग की यात्रा के बारे में कुछ खास बातें:
ह्वेन त्सांग एक चीनी बौद्ध भिक्षु, विद्वान, यात्री, और अनुवादक थे.
ह्वेन त्सांग ने भारत में 14 साल बिताए और कई हिस्सों का दौरा किया.
ह्वेन त्सांग ने भारत से कई भारतीय ग्रंथों को चीन लाने की कोशिश की.
ह्वेन त्सांग ने अपनी यात्राओं के बारे में विस्तृत जानकारी दी.
ह्वेन त्सांग ने बौद्ध धर्म के उद्गम स्थलों का दौरा किया.
ह्वेन त्सांग ने बौद्ध धर्म के बारे में अध्ययन किया और सामाजिक, धार्मिक, और राजनीतिक स्थितियों का अवलोकन किया.
ह्वेन त्सांग ने नालंदा में तर्कशास्त्र, व्याकरण, संस्कृत, और बौद्ध योगशास्त्र सीखा.
ह्वेन त्सांग ने अपने लेखन के ज़रिए चीन में बौद्ध धर्म के विकास में अहम भूमिका निभाई.
ह्वेन त्सांग की यात्रा के बारे में कुछ खास बातें:
ह्वेन त्सांग एक चीनी बौद्ध भिक्षु, विद्वान, यात्री, और अनुवादक थे.
ह्वेन त्सांग ने भारत में 14 साल बिताए और कई हिस्सों का दौरा किया.
ह्वेन त्सांग ने भारत से कई भारतीय ग्रंथों को चीन लाने की कोशिश की.
ह्वेन त्सांग ने अपनी यात्राओं के बारे में विस्तृत जानकारी दी.
ह्वेन त्सांग ने बौद्ध धर्म के उद्गम स्थलों का दौरा किया.
ह्वेन त्सांग ने बौद्ध धर्म के बारे में अध्ययन किया और सामाजिक, धार्मिक, और राजनीतिक स्थितियों का अवलोकन किया.
ह्वेन त्सांग ने नालंदा में तर्कशास्त्र, व्याकरण, संस्कृत, और बौद्ध योगशास्त्र सीखा.
ह्वेन त्सांग ने अपने लेखन के ज़रिए चीन में बौद्ध धर्म के विकास में अहम भूमिका निभाई.
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हर्षचरित, बाणभट्ट द्वारा रचित भारतीय सम्राट हर्षवर्धन की जीवनी है. यह संस्कृत भाषा में लिखा गया था. बाणभट्ट, हर्षवर्धन के दरबारी कवि थे. हर्षचरित, बाणभट्ट की पहली रचना थी. यह संस्कृत भाषा में ऐतिहासिक काव्य रचनाओं की शुरुआत का प्रतीक है.
हर्षचरित के बारे में कुछ और खास बातें:
हर्षचरित का मतलब है, 'हर्ष के कार्य'.
यह काव्य गद्य में लिखा गया है और इसमें आठ अध्याय हैं.
हर्षचरित में उत्तरी भारत के बौद्ध सम्राट हर्ष के दरबार और समय का चित्रण किया गया है.
हर्षचरित को साल 1897 में एडवर्ड बाइल्स कोवेल और फ़्रेडरिक विलियम थॉमस ने अंग्रेज़ी में अनुवादित किया था.
बाणभट्ट, सातवीं शताब्दी के संस्कृत लेखक थे.
बाणभट्ट की एक और प्रसिद्ध रचना कादम्बरी है.
हर्षचरित के बारे में कुछ और खास बातें:
हर्षचरित का मतलब है, 'हर्ष के कार्य'.
यह काव्य गद्य में लिखा गया है और इसमें आठ अध्याय हैं.
हर्षचरित में उत्तरी भारत के बौद्ध सम्राट हर्ष के दरबार और समय का चित्रण किया गया है.
हर्षचरित को साल 1897 में एडवर्ड बाइल्स कोवेल और फ़्रेडरिक विलियम थॉमस ने अंग्रेज़ी में अनुवादित किया था.
बाणभट्ट, सातवीं शताब्दी के संस्कृत लेखक थे.
बाणभट्ट की एक और प्रसिद्ध रचना कादम्बरी है.
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गुप्त काल की शुरुआत 319 ईस्वी में चंद्रगुप्त प्रथम के राज्याभिषेक के साथ हुई थी. गुप्त साम्राज्य, प्राचीन भारत का एक साम्राज्य था. यह साम्राज्य लगभग 240/275 ईस्वी से 550 ईस्वी तक चला. इतिहासकारों के मुताबिक, यह काल भारत का स्वर्ण युग था.
गुप्त साम्राज्य के बारे में कुछ और खास बातें:
गुप्त साम्राज्य की स्थापना श्री गुप्त ने की थी.
चंद्रगुप्त प्रथम के बाद उनका बेटा समुद्रगुप्त गद्दी पर बैठे.
समुद्रगुप्त के बाद उनका बेटा चंद्रगुप्त द्वितीय शासक बना.
गुप्त काल को उत्तर भारत का शास्त्रीय उत्कर्ष माना जाता है.
गुप्त काल में कला, साहित्य, और धर्म की उन्नति हुई.
गुप्त काल में कालिदास संस्कृत के महान कवि और नाटककार थे.
कालिदास की रचनाओं में अभिज्ञानशाकुंतलम और मेघदूतम प्रमुख हैं.
गुप्त साम्राज्य के बारे में कुछ और खास बातें:
गुप्त साम्राज्य की स्थापना श्री गुप्त ने की थी.
चंद्रगुप्त प्रथम के बाद उनका बेटा समुद्रगुप्त गद्दी पर बैठे.
समुद्रगुप्त के बाद उनका बेटा चंद्रगुप्त द्वितीय शासक बना.
गुप्त काल को उत्तर भारत का शास्त्रीय उत्कर्ष माना जाता है.
गुप्त काल में कला, साहित्य, और धर्म की उन्नति हुई.
गुप्त काल में कालिदास संस्कृत के महान कवि और नाटककार थे.
कालिदास की रचनाओं में अभिज्ञानशाकुंतलम और मेघदूतम प्रमुख हैं.
👍4
निम्न में से " आंध्र महिला सभा " के संस्थापक कौन थे ?
Anonymous Quiz
16%
पंडिमा रमाबाई
49%
दुर्गाबाई देशमुख
17%
गायत्री देवी
12%
सरोजनी नायडू
5%
अरूणा आसफ अली
👍5