भारत की एक राष्ट्र के रूप में पहचान को दृश्य माध्यम से सम्बद्ध करने हेतु किस चित्रकार ने सर्वप्रथम भारत माता के चित्र की रचना की थी ?
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6%
बंकिमचंद्र
16%
गगनेन्द्रनाथ
68%
अबनींद्रनाथ
9%
रबीन्द्रनाथ टैगोर
2%
जी. के. पारेख
❤3👍1🙏1
बंकिम चंद्र चटर्जी ने किस वर्ष से " बंगदर्शन " पत्रिका का प्रकाशन शुरू किया ?
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18%
1872
26%
1878
46%
1882
9%
1888
1%
1890
❤3
केरल के " श्री नारायण धर्म परिपालन योगम् " का कार्य क्षेत्र क्या था ?
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5%
महिला शिक्षा
74%
दलित एवं किसानों का उत्थान
14%
बाल श्रम निवारण
4%
सती प्रथा
3%
हिन्दू विधवा पुनर्विवाह
❤4
इतिहास के पन्नों से: 'गणिका' और 'वेश्या' के बीच का गहरा अंतर
प्राचीन भारतीय समाज और साहित्य को समझने के लिए, 'गणिका' और 'वेश्या' शब्दों के बीच के महत्वपूर्ण भेद को जानना आवश्यक है। ये दोनों ही एक ही सिक्के के दो पहलू नहीं थे, बल्कि सामाजिक प्रतिष्ठा, शिक्षा और कला के आधार पर इनके दर्जे में ज़मीन-आसमान का अंतर था।
"शृंगार शतक" का प्रमाण: श्रेष्ठता का आधार
लगभग एक हज़ार साल पहले लिखे गए प्रसिद्ध ग्रंथ "शृंगार शतक" के अनुसार, गणिका को वेश्या से कहीं अधिक श्रेष्ठ स्थान प्राप्त था। यह श्रेष्ठता केवल शारीरिक व्यापार पर आधारित नहीं थी, बल्कि ज्ञान, कला और आचरण पर टिकी हुई थी।
गणिका: विद्या, कला और सम्मान की धुरी
गणिकाएँ समाज के सबसे सुसंस्कृत और प्रतिष्ठित वर्गों में गिनी जाती थीं।
चौंसठ कलाओं में निपुण: इन्हें शिक्षित "दरबारी वेश्याओं" या "नर्तकियों" के रूप में देखा जाता था। एक गणिका को चौंसठ कलाओं (संगीत, नृत्य, काव्य, चित्रकला, वास्तुकला, ज्योतिष, आदि) में प्रवीण होना अनिवार्य था। यह योग्यता ही उसे सामान्य वेश्याओं से अलग करती थी।
उच्च आचरण और ज्ञान: वे उच्च गुणों की ग्रहणशील, पढ़ी-लिखी, जानकार और सुंदर मुखाकृति वाली महिलाएँ होती थीं। वे केवल शरीर नहीं, बल्कि प्रेम और निष्ठा के आंतरिक महत्व को भी समझती थीं।
सामाजिक प्रतिष्ठा: गणिकाएँ अभिजात वर्ग के समाज में विशेष रूप से आदरणीय और सम्मानित होती थीं। राजा, महत्वपूर्ण व्यक्ति, और विद्वान लोग उन्हें सम्मान देते थे और उनकी प्रशंसा करते थे। उनका सार्वजनिक तौर पर सम्मान होता था। संस्कृत के अनेक नाटकों में गणिकाएँ ही नायिकाएँ होती थीं, जिन्हें सुसंस्कृत और परिष्कृत महिलाओं के रूप में चित्रित किया गया है।
पेशेवर समर्पण:
उनका पेशा केवल धन कमाना नहीं था; वे अक्सर नृत्य और गायन जैसी ललित कलाओं के प्रति समर्पित और अनुरक्त होती थीं, जिसे वे सम्मानजनक ढंग से करती थीं।
इसके विपरीत, वेश्याएँ मुख्य रूप से भौतिक आवश्यकताओं और वासना से प्रेरित होती थीं।
धन के लिए सेवा:
वेश्या किसी पुरुष के प्रति प्रेम प्रदर्शित करने या उसकी यौन इच्छा की पूर्ति करने का कार्य केवल धन के लिए करती थी। उनकी प्राथमिकता मात्र आर्थिक लाभ होता था।
वेश्याओं को "वासना की ज्वाला" के रूप में वर्णित किया गया है, जो सुंदरता के ईंधन से जलती रहती थी। वासनापूर्ण पुरुष उस ज्वाला में धन और स्वास्थ्य फेंकते थे।
नैतिक अंतर:
हिंदू सिद्धांतवादी भी वेश्याओं को "अनैतिक शरीर के व्यापार में रत" मानते हुए गणिकाओं से स्पष्ट रूप से अलग करते थे।
गणिका एक ऐसी महिला थी जो अपने ज्ञान, कला, उच्च आचरण और सामाजिक सम्मान के कारण एक विशिष्ट दर्ज़ा रखती थी। वह वेश्याओं के छल-फरेब से दूर, एक अभिजात वर्ग की सम्मानित सदस्य थी। जबकि, वेश्या का कार्य मुख्य रूप से धन के लिए शारीरिक संबंधों तक सीमित था। इस प्रकार, यह स्पष्ट होता है कि प्राचीन भारतीय समाज में "वेश्यावृत्ति" के कई आयाम थे, जिनमें "गणिका" का स्थान ज्ञान और कला के सर्वोच्च शिखर पर था।
प्राचीन भारतीय समाज और साहित्य को समझने के लिए, 'गणिका' और 'वेश्या' शब्दों के बीच के महत्वपूर्ण भेद को जानना आवश्यक है। ये दोनों ही एक ही सिक्के के दो पहलू नहीं थे, बल्कि सामाजिक प्रतिष्ठा, शिक्षा और कला के आधार पर इनके दर्जे में ज़मीन-आसमान का अंतर था।
"शृंगार शतक" का प्रमाण: श्रेष्ठता का आधार
लगभग एक हज़ार साल पहले लिखे गए प्रसिद्ध ग्रंथ "शृंगार शतक" के अनुसार, गणिका को वेश्या से कहीं अधिक श्रेष्ठ स्थान प्राप्त था। यह श्रेष्ठता केवल शारीरिक व्यापार पर आधारित नहीं थी, बल्कि ज्ञान, कला और आचरण पर टिकी हुई थी।
गणिका: विद्या, कला और सम्मान की धुरी
गणिकाएँ समाज के सबसे सुसंस्कृत और प्रतिष्ठित वर्गों में गिनी जाती थीं।
चौंसठ कलाओं में निपुण: इन्हें शिक्षित "दरबारी वेश्याओं" या "नर्तकियों" के रूप में देखा जाता था। एक गणिका को चौंसठ कलाओं (संगीत, नृत्य, काव्य, चित्रकला, वास्तुकला, ज्योतिष, आदि) में प्रवीण होना अनिवार्य था। यह योग्यता ही उसे सामान्य वेश्याओं से अलग करती थी।
उच्च आचरण और ज्ञान: वे उच्च गुणों की ग्रहणशील, पढ़ी-लिखी, जानकार और सुंदर मुखाकृति वाली महिलाएँ होती थीं। वे केवल शरीर नहीं, बल्कि प्रेम और निष्ठा के आंतरिक महत्व को भी समझती थीं।
सामाजिक प्रतिष्ठा: गणिकाएँ अभिजात वर्ग के समाज में विशेष रूप से आदरणीय और सम्मानित होती थीं। राजा, महत्वपूर्ण व्यक्ति, और विद्वान लोग उन्हें सम्मान देते थे और उनकी प्रशंसा करते थे। उनका सार्वजनिक तौर पर सम्मान होता था। संस्कृत के अनेक नाटकों में गणिकाएँ ही नायिकाएँ होती थीं, जिन्हें सुसंस्कृत और परिष्कृत महिलाओं के रूप में चित्रित किया गया है।
पेशेवर समर्पण:
उनका पेशा केवल धन कमाना नहीं था; वे अक्सर नृत्य और गायन जैसी ललित कलाओं के प्रति समर्पित और अनुरक्त होती थीं, जिसे वे सम्मानजनक ढंग से करती थीं।
इसके विपरीत, वेश्याएँ मुख्य रूप से भौतिक आवश्यकताओं और वासना से प्रेरित होती थीं।
धन के लिए सेवा:
वेश्या किसी पुरुष के प्रति प्रेम प्रदर्शित करने या उसकी यौन इच्छा की पूर्ति करने का कार्य केवल धन के लिए करती थी। उनकी प्राथमिकता मात्र आर्थिक लाभ होता था।
वेश्याओं को "वासना की ज्वाला" के रूप में वर्णित किया गया है, जो सुंदरता के ईंधन से जलती रहती थी। वासनापूर्ण पुरुष उस ज्वाला में धन और स्वास्थ्य फेंकते थे।
नैतिक अंतर:
हिंदू सिद्धांतवादी भी वेश्याओं को "अनैतिक शरीर के व्यापार में रत" मानते हुए गणिकाओं से स्पष्ट रूप से अलग करते थे।
गणिका एक ऐसी महिला थी जो अपने ज्ञान, कला, उच्च आचरण और सामाजिक सम्मान के कारण एक विशिष्ट दर्ज़ा रखती थी। वह वेश्याओं के छल-फरेब से दूर, एक अभिजात वर्ग की सम्मानित सदस्य थी। जबकि, वेश्या का कार्य मुख्य रूप से धन के लिए शारीरिक संबंधों तक सीमित था। इस प्रकार, यह स्पष्ट होता है कि प्राचीन भारतीय समाज में "वेश्यावृत्ति" के कई आयाम थे, जिनमें "गणिका" का स्थान ज्ञान और कला के सर्वोच्च शिखर पर था।
❤6⚡1
ऑल इंडिया डिप्रेस्ड क्लास एसोसिएशन के प्रथम अध्यक्ष कौन थे ?
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7%
सुभाष चन्द्र बोस
14%
महात्मा गांधी
20%
जवाहर लाल नेहरू
14%
ज्योतिबा फुले
44%
एम. सी. राजा
❤3👍2
𝐇𝐢𝐬𝐭𝐨𝐫𝐲 𝐒𝐭𝐮𝐝𝐲 𝐓𝐢𝐦𝐞 ᵁᵍᶜ ⁿᵉᵗ ᴿᵖˢᶜ ᶠⁱʳˢᵗ ᴳʳᵃᵈᵉ
ऑल इंडिया डिप्रेस्ड क्लास एसोसिएशन के प्रथम अध्यक्ष कौन थे ?
• ऑल इंडिया डिप्रेस्ड क्लास एसोसिएशन - एम. सी. राजा (नागपुर , 1926)
• द ऑल इंडिया डिप्रेस्ड क्लासेज कांग्रेस - बी. आर.अम्बेडकर (नागपुर , 1930)
• ऑल इंडिया डिप्रेस्ड क्लासेज लीग - जगजीवन राम (1935 )
• ऑल इंडिया हरिजन संघ - महात्मा गांधी (1932 , दिल्ली)
• द ऑल इंडिया शिड्यूल्ड कास्ड - बी .आर . अम्बेडकर (नागपुर , 1942)
• द ऑल इंडिया डिप्रेस्ड क्लासेज कांग्रेस - बी. आर.अम्बेडकर (नागपुर , 1930)
• ऑल इंडिया डिप्रेस्ड क्लासेज लीग - जगजीवन राम (1935 )
• ऑल इंडिया हरिजन संघ - महात्मा गांधी (1932 , दिल्ली)
• द ऑल इंडिया शिड्यूल्ड कास्ड - बी .आर . अम्बेडकर (नागपुर , 1942)
❤5👍4
पंचशाला बंदोबस्त के स्थान पर भू - राजस्व इकट्ठा करने की सालाना बंदोबस्त की नीति कब शुरू की गई ?
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9%
1765
39%
1772
34%
1777
11%
1780
8%
1782
❤5
जवाहरलाल नेहरू की अध्यक्षता में अखिल भारतीय देशी राज्य प्रजा परिषद् का सातवां अधिवेशन कहाँ आयोजित हुआ था ?
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5%
गुजरात
30%
लखनऊ
32%
लाहौर
29%
उदयपुर
3%
फरीदकोट
❤5👍1
निम्न में से डाॅ. भीमराव अम्बेडकर द्वारा " जाति प्रथा का विनाश " पुस्तक किस वर्ष लिखी गई ?
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25%
1936
19%
1940
41%
1942
10%
1945
5%
1948
❤5