Hindi/Urdu Poems
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सोच रहा हूँ जंग छिड़ी तो बाज़ारों का क्या होगा?

बंदूकें तो बिक जाएँगी, गुलदस्तों का क्या होगा?

आज अब्बू ने खाँस दिया तो एक अजीब ख़्याल आया,

छत के एकदम गिर जाने से दीवारों का क्या होगा?

#Jubairaliाबिश
#review

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बारिशें सिर्फ़ मुस्कान नहीं लातीं
टपकते छप्परों से आँसू भी ले आती हैं
सिर्फ़ काग़ज़ की नावें नहीं बहातीं
गीली मिट्टी की फिसलन और
दरारों से टपकते पानी का भय भी लाती हैं
वे केवल ज़मीन को नहीं भिगोतीं
पसीज देती हैं रोज़ कमाने वालों के हृदय को
बारिशें सिर्फ़ मिट्टी की ख़ुशबू नहीं लातीं
सीलन, अँधेरा और बेघर रातें भी साथ लाती हैं।
कभी गड्ढों को भर देती हैं
तो कभी फसलों को बहा ले जाती हैं।

#khayalowaliladki
#review

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हम हर बार शांत रहे..
तो लोगों ने कमजोर समझ लिया।
किसी का कुछ बिगाड़े बिना..
यहां कौन ताकतवर मानता है...

नटराज की पेन्सिल-सा
ख़ुद घिसकर भी दूसरों की लकीरें बनाने वालों
की कौन क़द्र करता है...!!

अब लोगों को पेन जैसे लोग पसंद हैं,
जो रिफिल बदल कर भी काम चला सकें...
या फिर पसंद ना आए तो नया ले आएं...!!

#unknown

#review

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सागर जितनी इच्छाएं मेरी,
बूंद बराबर धैर्य,
अभिलाषाओं की मृगतृष्णा में,
कण बराबर धैर्य।।

धैर्य ऐसा कि पल में बदलें,
संग संग केवल माया चलती।।
कर्म करना मुझको ना भाता,
फल की हरपल चिंता रहती।।

ये समय कितना विस्तृत है,
कर्म भी है कितना कठिन,
श्रम भी पर्वत समान ही है,
जीवन भी है कितना कठिन।।

मेरी चाह भी ग़लत नहीं है,
बिन श्रम के फल कैसे पाऊं।।
मैं तो केवल मानव ही हूं,
बिन धैर्य के मोक्ष कैसे पाऊं।।

#Bhagyashree
#review
16 March 2026

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मेरा गाँव : कुछ हक़ीक़त कुछ फ़साने....!!

नेशनल हाईवे के किनारे..
बेतरतीब ढंग से बसा हुआ मेरा छोटा सा गाँव...
टूटी-फूटी गाँव की सड़क,
जो कुछ पक्की बची है... वो बस मानसून तक...
अतिक्रमण से संकीर्ण हुई गलियां... और खेतों के रास्ते...
छोटा सा बाजार जहाँ...
मीसा की मीनार से भी ज्यादा झुके हुए दुकानों के छज्जे...
जो गली को राहगीरों के लिए नहीं समझते...

जहाँ असंरक्षित जल स्रोत, वन क्षेत्र... गोचर भूमि... और
सरकारी ढांचे... सब खड़े हैं किसी की आश में....

पशुचिकित्सा का हाल पूछो मत...!
इमारतें सब की हैं... भीतर कुछ नहीं...

हर मोड़ पर कुछ लोग बैठे,
स्कूल, कॉलेज या फिर लाइब्रेरी को जाने वालों को
कुछ न कुछ सुना देते हैं..
कोई सामने से जवाब दे भी तो..

राम-राम!
घोर कलयुग!
आजकल के नौजवानों को कुछ तहजीब नहीं...
संस्कारों वाली बात नहीं रही अब...!

मगर
उन्हें...
जो नशीले पदार्थ बेचते..
उनकी तस्करी करते..
या मदिरालयों में बैठे...
वे सब दिखाई न देते....!
"पानी में रहकर मगर से कौन बैर ले भला...!!"

कुछ...
भोले-भाले, सीधे-सादे लोग हैं कि...
जो आज भी दुनियादारी से अनजान हैं,
कंधे पर हाथ रख कोई साथ-साथ चल दे...
कोई हँसकर पास बुलाए तो..
अपना समझ लेते हैं...!!

बुरे लोगों की बुराई पर
'भगवान देख रहे हैं'...!
ऐसा कहते-कहते पीढ़ियाँ खप गईं...!

कुछ तो इतने शातिर कि
किसी को भी बेच खाएं...
सरकारी गरीब... सरकारी किसानों की भरमार है...
राजनीति में सक्रिय लोग....
ज्यादातर इसी सूची में शामिल मिलते हैं...

जमीन-जायदाद के झगड़ों से..
बस... भाई की भाई से,
पिता-पुत्र की,
पड़ोसी की पड़ोसी से
आपस में कम बनती है...

धर्म-जात के झगड़े नहीं..
बस द्वेष की 'बू' है जो
काँटों की बाड़ से आर-पार आती-जाती है..
अगर दीवारें होतीं तो शायद रोक लेतीं...
अब गिलोय नीम पर चढ़ने लगी है...

कुछ जाति विशेष के लिए...
मंदिर के कपाट बंद हैं,
उनके काम भी नियत हैं,
नाई बाल भी नहीं काटता...
और गाँव का चुनाव भी लड़ने नहीं दिया जाता,
वहाँ शिर गिने जाते हैं... चरित्र नहीं..!

समानतावादी सोच के लोग बहुत हैं...
सब खूब पढ़ें...
मगर अधिक पढ़-लिखकर आगे बढ़ें तो
उनके चरित्र पर कीचड़ उछालने वालों की कमी नहीं,
कोई हर्ज नहीं... कोई शर्म-ओ-हया नहीं...!

दहेज गाड़ियां भर-भर के ले सकते हैं..
कोई बोलता नहीं...!
लेकिन बहू नौकरी करे,
उसकी कमाई से घर चलाएं...
ये जरा समाज को अजीब लगता है...!

कन्या भ्रूण हत्या..
बाल विवाह जैसे पाप नहीं करते...
जन्म से ही पराया धन मान कर चलते हैं....
बस उसे जिंदा रखकर रोज़ दम घोंटते,
"जब तक वो लड़की होकर लड़की जैसी दिखाई न दे..!"

खुद से पहले पड़ोसी नौकरी न लग जाए,
उसकी चिंता दिन-रात सताए सबको....
सरकारी नौकरी का मतलब...
इस व्यवस्था से निकलना... या शहर चले जाना रह गया...
पढ़ने के बाद तो सब राजनीति से बहुत दूर भाग रहे...!!

हरा-भरा खुशहाल...
बड़ा ही सुकूनदायक दिखता.... गाँव का माहौल...
अब अंदर से खोखला हो रहा है...

बाकी... कागजों में तो गाँव कब का विकसित हो चुका है...!!
खेल के मैदान....
पक्का इंफ्रास्ट्रक्चर...
हर घर नल,
हर घर बिजली...
और न जाने क्या-क्या... सुख-सुविधाएं,
मानो, जैसे कोई जापान का गाँव हो....!!

अगर कोई ना बोले
तो पंच.. सरपंच..
पटवारी और ग्रामसेवक सब प्रशासनिक अधिकारी नवाबों सी ज़िंदगी जीते हैं...

बाकी और क्या कहना....
देशभक्ति के मायने... लम्बे-चौड़े भाषणों से तय होते हैं...
सच के लिए लड़ने वालो को तो देशद्रोही का तमंगा मिलता है,
और आवाज़ वो उठाए.. जिसको ज़िंदगी से प्यार नहीं...!!

- कुमार


#kumar
#review

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मैंने पढ़ी एक कविता...
नहीं... नहीं... अधूरी कविता...!

किसी ने पूछा..
अधूरी कैसे?

क्योंकि
मैंने तो बस वो पंक्तियाँ पढ़ी...!

जिसने लिखा था...
उसके हाल-ए-दिल को नहीं पढ़ा...!

उसकी संवेदना... उसकी रूह तक नहीं पहुँचा..
कुछ महसूस न कर...
बस... पढ़ा उन स्याही से रंगे
शब्दों के मायाजाल को...

कविता पूरी थी...
मगर मैं उसे अधूरी ही पढ़ पाया..
कवि की निगाहें ढूढ़ती रही किसी पाठक की प्रतिक्रिया को.....!!

— कुमार

#kumar
#review

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मानो शहद की भरी हुई
मेरी गगरि फूट जाती है
मेरा आपा खाने को आता है
सखी..जब तू रूठ जाती है ।

बादल गुजर गया हो जैसे
धरती प्यासी छोड़ कर
गुलशन बैठ गया हो जैसे
मुझसे मुँह मोड़ कर
मेले में अपना खोया हो
मेरा हाथ छोड़ कर
दर्द ने जैसे माफी मांगी
कवि का ह्रदय तोड़ कर
भीतर की बातेँ कहने को
फिर काग़ज़ कलम उठ जाती है
मेरा आपा खाने को आता है
सखी..जब तू रूठ जाती है ।

भैंस ने जैसे भरी दूध की
बाल्टी पे लात मारी हो
चाय में जैसे मक्खी कुदी
गन्ने की पोरी खारी हो
दुकानों पे भीड़ भड़ाका
लेकिन सिर्फ उधारी हो
जग ने खूब सराहा जैसे
लेकिन कानि नारी हो
जैसे कि जल्दी खूब करी पर
गाड़ी छूट जाती है
मेरा आपा खाने को आता है
सखी..जब तू रूठ जाती है ।

सुनो.. यूँ मुझसे रूठा ना कर
तेवर से मुझे कुटा ना कर
हँसी खुशी में क्या जाता है
चुप होके फिर फूटा ना कर
जैसे कि तांगा तुलसी की
गठरी लूट जाती है
जैसे कि हरि भरी किसी की
खेती सूख जाती है
जैसे कि बड़ी इमारत की
मंजिल पहली टूट जाती है
मेरा आपा खाने को आता है
सखी..जब तू रूठ जाती है ।

.......sanjay chauhan
#sanjay
#review

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विलोम शब्दों और अलंकारों से सजाकर...
प्रकृति का मानवीकरण कर,
लावण्य की अतिशयोक्ति कर,
मैं लिखूंगा प्रेम पत्र...

व्याकरण की हर कसौटी पर खरा उतरकर,
भाषा की मानक शुद्धता को आधार बनाकर,
मैं लिखूंगा प्रेम पत्र...

सांसारिकता का संधि-विच्छेद कर,
प्रेम की आवश्यकता को पन्नों पर उकेरकर,
मैं लिखूंगा प्रेम पत्र...

लिपि के विकास को छोड़कर,
भूत-भविष्य के जाल को तोड़कर,
वर्तमान का साथ लिखूंगा...
मैं लिखूंगा प्रेम पत्र...

शब्द-शुद्धि और वाक्य-शुद्धि में,
भले असफल हो जाऊं...
मगर...
पतझड़ में झड़ते फूलों का
शाखाओं से प्रेम को भरपूर लिखूंगा,
मैं लिखूंगा प्रेम पत्र...

सब कुछ न सही...
जो भी लिखूंगा हृदय से लिखूंगा...
किसान का मिट्टी से लगाव सा
अपनत्व का सच लिखूंगा...

मैं लिखूंगा प्रेम पत्र...

–कुमार


#Kumar
#review

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प्रेम जब अंतर्मन से हो
रूप दिखाते दर्पण से हों,
तभी वह केवल प्यार होगा,
मधुवन का प्रिय उपहार होगा।

तब प्रिय को लिखने हेतु
शब्दों का निष्छल बहाव होगा,
पंक्ति पर पंक्ति जुड़ जाएँगी,
वर्ण-वर्ण में प्रिय का नाम होगा।

प्रेम जब अंतर्मन से हो,
रूप दिखाते दर्पण से हों...

नयनों को बंद करने पर भी
मन में प्रिय का आकार होगा,
हृदय में प्रेम की धुन होगी,
हर श्वास में प्रिय का वास होगा।

तब दूरियों का अर्थ शून्य होगा,
विरह भी एक वरदान होगा,
तब समय की सीमा न होगी,
जीवन का हर क्षण स्वीकार होगा।

प्रेम जब अंतर्मन से हों,
रूप दिखाते दर्पण से हों...

तब प्रिय ही ईश्वर का रूप होगा,
प्रेम भी अमूल्य आशीष होगा,
व स्नेह ही जीवन का स्वरूप होगा,
अनंत प्रेम का मधुर आभास होगा।

प्रेम जब अंतर्मन से हो...

#Bhagyashree
#review
19 march 2026

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जब भी ज़माने को देखता हूँ,
स्वयं की तुलना करता हूँ...
हर बार,
स्वयं को अधूरा पाता हूँ।

लोग नदी से बह रहे होते हैं,
मैं थार के सूखे तालाब सा कहीं पड़ा हूँ।

लोग पर्वत से आसमान छू रहे हैं,
मैं रेत सा हवा के झोंकों के साथ भटक रहा हूँ।

लोग सागर से विशाल हैं,
और मैं एक तिनके सा।

सबके यार-दोस्तों की भीड़ साथ खड़ी है,
मैं रेगिस्तान में अकेला खड़ा हूँ।

सब लोग खुलकर बातें कर लेते हैं,
मैं दूसरों के सामने स्वयं को असहज पाता हूँ।

काबिलियत लोगों में भर-भरकर है,
और मेरे पास... कुछ नहीं।

यह सोच-सोच कर,
मन मसोस कर रह जाता हूँ...

— कुमार

#Kumar
#review

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मुझे कुछ न आता हो...
मुर्शिद...!!

फिर भी...
रेगिस्तान में जीना आता है।

मैं बालू से महल बनाता हूँ,
तानपुरे का साज सजाता हूँ,
हवा की सरसराहट से धुन बनाता हूँ,
बारिश को राग सुनाता हूँ।

मैं वीरान होते खेतों में,
सरसों के फूल खिलाता हूँ।
मैं जर्जर दीवारों को,
फिर रंगों से चमकाता हूँ।

हृदय के सवालों के जवाब,
स्वयं ही ढूंढ लेता हूँ।

धैर्य नहीं है मुझमें,
भविष्य के सपने नहीं संजोता हूँ।

मैं जीता हूँ... मैं जीता हूँ...
हर पल... हर क्षण...
दुनियादारी से दूर,
ख़ुद को जीता हूँ...!!

— कुमार


#Kumar
#review

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आज पानी गिर रहा है,
बहुत पानी गिर रहा है,

रात-भर गिरता रहा है,
प्राण मन घिरता रहा है,

अब सवेरा हो गया है,
कब सवेरा हो गया है,

ठीक से मैंने न जाना,
बहुत सोकर सिर्फ़ माना—

क्योंकि बादल की अँधेरी,
है अभी तक भी घनेरी,

अभी तक चुपचाप है सब,
रातवाली छाप है सब,

चार भाई चार बहिनें,
भुजा भाई प्यार बहिनें,

खेलते या खड़े होंगे,
नज़र उनकी पड़े होंगे।

पिताजी जिनको बुढ़ापा,
एक क्षण भी नहीं व्यापा,

रो पड़े होंगे बराबर,
पाँचवें का नाम लेकर,

पाँचवाँ मैं हूँ अभागा,
जिसे सोने पर सुहागा,

पिताजी कहते रहे हैं,
प्यार में बहते रहे हैं,

आज उनके स्वर्ण बेटे,
लगे होंगे उन्हें हेटे,

क्योंकि मैं उन पर सुहागा
बँधा बैठा हूँ अभागा,

और माँ ने कहा होगा,
दुःख कितना बहा होगा

आँख में किस लिए पानी,
वहाँ अच्छा है भवानी,

वह तुम्हारा मन समझ कर,
और अपनापन समझ कर,

गया है सो ठीक ही है,
यह तुम्हारी लीक ही है,

पाँव जो पीछे हटाता,
कोख को मेरी लजाता,

इस तरह होओ न कच्चे,
रो पड़ेगे और बच्चे,

पिताजी ने कहा होगा,
हाय कितना सहा होगा,

कहाँ, मैं रोता कहाँ हूँ,
धीर मैं खोता, कहाँ हूँ,

गिर रहा है आज पानी,
याद आता है भवानी,

उसे थी बरसात प्यारी,
रात-दिन की झड़ी झारी,

खुले सिर नंगे बदन वह,
घूमता फिरता मगन वह,

बड़े बाड़े में कि जाता,
बीज लौकी का लगाता,

तुझे बतलाता कि बेला
ने फलानी फूल झेला,

तू कि उसके साथ जाती,
आज इससे याद आती,

मैं न रोऊँगा,—कहा होगा,
और फिर पानी बहा होगा,

कवि:- भवानीप्रसाद मिश्र

#kumar
#review

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सब लोग कृपया दो hashtag # लगाएं

1. #review

2. अपनी लिखी कविता पे अपने नाम का hashtag # लगाइये, जैसे #yourname

किसी और की कविता share करते हैं और उसका नाम नहीं जानते तो #unknown लगाइए

#review आपके पोस्ट को @HindiPoems में भी साझा करता है, जो कि समूह का चैनल है। ऐसा इसलिए किया जाता है ताकि आपकी रचना को अधिक पाठक मिल सकें और एक ऐसा स्थान बना रहे जहाँ केवल कविता ही साझा की जाए, न कि चर्चाएँ।

#yourname बहुत महत्वपूर्ण है, ताकि यह स्पष्ट हो सके कि रचना आपके द्वारा लिखी गई है। यदि आप किसी और की कविता साझा कर रहे हैं, तो उनके नाम को हैशटैग में ज़रूर लिखें या यदि लेखक का नाम ज्ञात न हो तो #unknown का उपयोग करें।

इसके अलावा #yourname से यह भी आसानी होती है कि समूह/चैनल में आपकी सभी कविताएँ एक साथ खोजी जा सकें। क्यों? ताकि कोई भी व्यक्ति, यहाँ तक कि आप स्वयं भी, उस हैशटैग पर क्लिक करके आपकी पहले साझा की गई सभी कविताएँ पढ़ सके।


#review shares your post in @HindiPoems too which is group's channel. This is done to ensure you get more readership and also a place where only poetry goes in and not any discussions.

#yourname is important so that you claim your write-up that it's written by you. If in case you are sharing other's poetry then you must use their name in hashtag or #unknown in case you don't know who has written it.

Also #yourname makes it easier to find all your poems in group/channel at once. Why? So that someone including you can click on that hashtag and read all of your previous poetry that you shared.

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एक दिन,
मैं कहते-कहते
बहुत आगे निकल जाऊंगा,
तुम्हारी सोच और कल्पना से भी परे।

तब तुम्हें यकीन होगा
कि मेरा कहा
हर एक शब्द सच्चा था।

तब…
तुम भी आओगे मेरे पीछे
मुझे रोकने के लिए,
मेरी सच्चाई स्वीकार करने के लिए,

लेकिन
तब तक मैं
तुम्हारी नज़रों से
ओझल हो चुका होऊंगा।

और जब तुम खोजोगे मुझे
उस राह पर
जहाँ कभी मैं चला था,
तब तुम्हें एहसास होगा
कि मेरे इरादे
महज़ शब्द भर नहीं थे।

तब तुम अपनी तन्हाइयों में
पुकारोगे मेरा नाम,
और याद करोगे बीता वक्त।

लेकिन
वक्त की इस लंबी दूरी में
मैं इतना बदल चुका होऊंगा
कि लौटना भी चाहूं,
तो वापस नहीं लौट पाऊंगा।

और उस वक्त
तुम्हारे लिए
सबसे नेक इंसान बन जाऊंगा मैं,
तुम देख सकोगे
फासला
वक्त के दो पहलुओं के दरमियान।

#Bhagyashree
#review
21 march 2026

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अक्सर मेरी ख्वाहिशें खुद्खुशी कर खुशियों से सवाल करती हैं-
क्या मेरी दुआओं का पता ग़लत था, या मुकद्दर ने दरवाज़ा ही बंद कर लिया?
मैं मुस्कुराता हूं तो लोग सुकून समझ लेते हैं
पर अब उन्हें कैसे समझाऊं
कुछ मुस्कुराहटें आंसुओं का घर होती हैं

#Niharika
#review

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अफरा-तफरी भागा-भागी
उम्र खा रही है
ना जाने ये जिन्दगी
कहाँ जा रही है ।

घर को घर रखने को घर से ही
बेघर होके देखा है
सपनों की कितनी रोटी को
तप के तौवे पे सेंका है
पहाड़ों का कुआ कर दिया
फिर भी चुहि मरी मिली
जानें ईश्वर ने काहे
हमको धरती पे फेंका है
कल्पों सी लंबी सजा भोग
अब नींदे आ रही है
ना जाने ये जिन्दगी
कहाँ जा रही है ।

सायद धरती पे आना जाना
केवल सजा बिताना है
उद्गम ये गोलोक का है या
नरकों का मुहाना है
उसमे भी लंबा लूप सुनो
हर जन्म का आना जाना है
ससुराल भवन एक कैदी का
या श्मशान घाट का थाना है
जब भी तर्कों पे मंथन कर्ता
उथली सांसे आ रही है
ना जाने ये जिन्दगी
कहाँ जा रही है ।

दुनियां के इतने पत्थरों में
कहो मैं कैसे प्रेम भरुं
दिल की बात करूं दिल से
और दिमागों को परे धरूं
विरक्त वैरागी योगी सा
कहो तो कैसे धीर धरूं
थक गया मृत्यु के खेल से
सही मरण को कैसे मरूं
मेरा कांटा सिर्फ सळी
और तेरा कांटा फाळी है
तेरी कुत्ती नाम गुलाबो
मेरी कुत्ती काळी है
दही मानके पूरी दुनिया
कपास चबा रही है
ना जाने ये जिन्दगी
कहाँ जा रही है ।
........ sanjay chauhan

#sanjay
#review

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कल रौशन थी पूरी रात, ज़हन के उजालों से,

दिन ऐसे सियाह हैं, कि परछाईं भी नहीं दिखती

#PriyankaB
#review

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हुस्न के सराब से क्या बहलाओगे मुझे,

मैं जिस्म के फ़रेब से खूब वाक़िफ़ हूँ

#PriyankaB
#review

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Shree Krishna Ji 🌸

श्याम जू के गालों पर घुँघराले बाल,
देखो,पवन से लिपट कैसे रास रचाए हैं।
लट मस्तक पर शेषनाग सी लहराएँ,
मोर पंख में देखो, मेरे श्याम समाए हैं।

पग-पग माटी उड़ाए चलते हैं श्याम,
अधरों की लाली कमल सम प्यारी है।
भँवरदल मोहित हो गुंजन करने लगे,
पीताम्बरी श्याम जू की छवि निराली है।

मंद-मंद यमुना तट पर छाई छवि मनोहारी,
चंद्रमा से अधिक श्याम की उजियारी है।
पायल की रुनझुन मुरली संग झूम रही,
श्याम जू के वर्ण में क्षीरसागर समाए हैं।

नील वर्ण, नील नयन पर प्रेम का श्रृंगार है,
श्याम जू के वक्ष पर वैजयंती विराजी हैं।
अर्ध्दचंद्र भाल पर चन्दन दमक रहा
श्याम जू को देख-देख गोपियां हर्षाती हैं।

#Bhagyashree
#review
25 march 2026

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"नाजायज बच्चे"

परेशान पिता ने
जनता के अस्पताल में फोन किया
"डाक्टर साहब
मेरा पूरा परिवार बीमार हो गया है

बड़े बेटे आंदोलन को बुखार
प्रदर्शन को निमोनिया
तथा
घेराव को कैंसर हो गया है
सबसे छोटा बेटा 'बंद'
हर तीन घंटे बाद उल्टियाँ कर रहा है

मेरा भतीजा हड़ताल सिंह
हार्ट अटैक से मर रहा है
डाक्टर साहब, प्लीज जल्दी आइए
प्यारी बिटिया 'सांप्रदायिकता' बेहोश पड़ी है
उसे बचाइए।"

डाक्टर बोला, "आई एम सौरी
मैं सिद्धांतवादी आदमी हूँ
नाजायज बच्चों का इलाज नहीं करता हूँ।"

रचनाकार :- हुल्लड़ मुरादाबादी



#review

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परी हो तुम....

तुम्हें याद है,
जब मैं पहली दफा तुमसे मिला था,
तब मैंने तुम्हें कहा था,
एक परी हो तुम...

जो सरलता, अच्छाइयाँ, खुशियाँ,
सौभाग्य और प्रेम को बाँटने
तथा समझाने के लिए
इस धरा पर आई है।

तुम्हारी अच्छाइयों में भटककर,
मैं भूल बैठा था कि
एक परी हो तुम,
और अपना हृदय भी
तुम्हें समर्पित कर दिया।

और अंत में,
तुमने छोड़ दिया मुझे भी
उन पत्तियों की तरह
जो छोड़ देती हैं पेड़ को
बसंत से मिलने की ख्वाहिश में।

खैर! पत्तियाँ नादान होती हैं,
उन्हें नहीं मिलता
उनके हिस्से का बसंत,
मगर तुम परी हो, अतः तुम्हें मिल गया
एक नया बसंत, एक नया नाम- अप्सरा।

और,
मैं तुम्हारी दी हुई सौगात लेकर
यही सोचता रहा.... कौन हो तुम?
एक मृगतृष्णा, एक परी या कुछ और।

अपने सारे सवालों और जवाबों से हारकर,
मैं पढ़ बैठा वो सारी किताबें
जिनमें लिखा था
"परी"....

और अंत में मैंने जाना
कुछ परियाँ खुशियाँ देने नहीं आतीं,
वे आती हैं बस मन को उलझाने,
और एक मीठा भ्रम बनकर
आखिर में खो जाने के लिए...

#Bhagyashree
#review
30 March 2026

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