✅ Important 2018 judgements of Supreme Court in hindi
ऐसे 35 महत्त्वपूर्ण फ़ैसलों की यह सूची जो सुप्रीम कोर्ट ने वर्ष 2018 के दौरान दिए :-
सबरीमाला
भक्ति में लैंगिक भेदभाव नहीं हो सकता है। सबरीमाला में कोर्ट ने सभी उम्र की महिलाओं के प्रवेश की अनुमति 4:1 से दी। इस पीठ की एकमात्र महिला जज इन्दु मल्होत्रा ने बहुमत के इस फ़ैसले के ख़िलाफ़ अपना फ़ैसला दिया। इस फ़ैसले की काफी दिनों से प्रतीक्षा की जा रही थी। [Indian Young Lawyer's Association & Ors. V. State of Kerala & Ors.]
समलैंगिकता
सुप्रीम कोर्ट ने अपने फ़ैसले से दो वयस्कों के बीच सहमति से समलैंगिक सम्बन्धों को आपराधिक मानने वाले 157 साल पुराने क़ानून को अंततः समाप्त कर दिया।ऐसा करते हुए कोर्ट ने आईपीसी की धारा 377 को असंवैधानिक क़रार दे दिया। यह फ़ैसला पाँच जजों की पीठ ने दिया। [Navtej Singh Johar& Ors. V. Union of India]
आधार
सुप्रीम कोर्ट की संविधान पीठ ने आधार अधिनियम की धारा 33(2), 47 और 57 को समाप्त कर दिया; इससे जुड़े राष्ट्रीय सुरक्षा के अपवाद को भी ग़ैरक़ानूनी क़रार दिया और यह कि निजी क्षेत्र आधार डाटा की माँग नहीं कर सकता। इस फ़ैसके को पीठ के लिए न्यायमूर्ति एके सीकरी ने लिखा जिसे मुख्य न्यायाधीश न्यायमूर्ति दीपक मिश्राऔर एएम खानविलकर की सम्मति प्राप्त थी। [Justice K. S. Puttuswamy (Retd.) and Anr V Union of India & Ors.]
व्यभिचार
इस फ़ैसले से भी सुप्रीम कोर्ट ने 158 साल पुराने इस क़ानून को समाप्त कर दिया। पीठ ने आईपीसी की धारा 497 को ग़ैरक़ानूनी क़रार दिया।इस क़ानून के द्वारा पति को किसी महिला का मालिक समझा जाता था। यह क़ानून व्यभिचार को ग़ैरक़ानूनी मानता था। हालाँकि, कोर्ट ने कहा है कि व्यभिचार को तलाक़ का आधार माना जाएगा। फ़ैसलेमें यह भी कहा गया कि अगर व्यभिचार के कारण पति या पत्नी आत्महत्या करने को उद्यत होते हैं तो व्यभिचार करने वाले पार्टनर को हत्या के लिए उकसाने के जुर्म में आईपीसी की धारा 306 के तहत सज़ा हो सकती है। [Joseph Shine V. Union of India]
इच्छामृत्यु
गरिमापूर्ण मौत का अधिकार एक मौलिक अधिकार है, इस फ़ैसले ने इस बात को माना। सुप्रीम कोर्ट की पीठ ने इस फ़ैसले में इच्छामृत्यु को सही ठहराया और मृत्यपूर्व वसीयत बनाकर इस बारे में निर्देश देने की अनुमति भी दे दी और कहा कि यह क़ानूनी रूप से वैध होगा। कोर्ट ने यह भी कहा कि गरिमापूर्वक जीना एक मौलिकअधिकार है और इसी तरह भयानक रूप से गम्भीर बीमारी से ग्रस्त और जिसके ठीक होने की कोई संभावना अब नहीं है ऐसे व्यक्ति के मरने की प्रक्रिया को आसान बनाना भी इसका हिस्सा है। [Common Cause (A Regd. Society) V. Union of India & Anr]
पदोन्नति में एससी/एसटी के लिए आरक्षण
सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट किया कि एससी/एसटी को सरकारी नौकरियों में पदोन्नति देने के मामले में आरक्षण देने के लिए क्वांटिफिएबल डाटा की ज़रूरत नहीं होगी। इससे पहले 2006 में नागराज मामले में अपने फ़ैसले में सुप्रीम कोर्ट ने कहा था कि इन्हें प्रोमोशन तभी दिया जा सकता है जब सरकार इनके पिछड़ेपन के बारे में क्वांटिफिएबल डाटा दे।पर कोर्ट ने इस मसले को किसी बड़ी पीठ को सौंपने से मना कर दिया। पाँच जजों की पीठ ने क्वांटिफिएबल डाटा की ज़रूरत को इंदिरा साहनी मामले में सुप्रीम के फ़ैसले के ख़िलाफ़ है। [Jarnail Singh v LachhmiNarain Gupta& Ors.]
आईपीसी की धारा 498A
सुप्रीम कोर्ट ने आईपीसी की धारा 498A के दुरुपयोग को रोकने के लिए राजेश शर्मा मामले में जो दिशानिर्देश जारी किए थे उसमें संशोधन किया और 'कल्याणकारी समिति' की बात को अब नकार दिया। तीन जजों की पीठ ने पहले दिए गए दिशानिर्देश को वापस ले लिया जिसे दो जजों की पीठ ने जारी किया था और जिसमें कहा गया थाकि आईपीसी की धारा 498A के तहत की गई शिकायत पर पहले परिवार कल्याण समिति ग़ौर करेगी और उसके बाद ही आगे की क़ानूनी कार्रवाई होगी। [Social Action Forum For Manav Adhikar V. Union of India]
हादिया
इस चर्चित मामले में दिए गए अपने फ़ैसले में सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि अपना धर्म बदलना इच्छानुरूप धर्म के चुनाव का मौलिक अधिकार है। सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले में अपने फ़ैसले में केरल हाईकोर्ट के फ़ैसले को उलट दिया जिसने हादिया और शफ़िन जहाँ की शादी को इस आधार पर अवैध क़रार दिया था कि शादी के लिए धर्म परिवर्तनकिया गया था। सुप्रीम कोर्ट ने अपने फ़ैसले में कहा कि हाईकोर्ट संविधान के अनुच्छेद 226 के तहत दोनों की शादी को ग़लत नहीं ठहरा सकता। हालाँकि, उसने NIA को इस मामले में अपनी जाँच जारी रखने को कहा। [Shafin Jahan V. Ashokan K. M. & Ors]
अयोध्या
ऐसे 35 महत्त्वपूर्ण फ़ैसलों की यह सूची जो सुप्रीम कोर्ट ने वर्ष 2018 के दौरान दिए :-
सबरीमाला
भक्ति में लैंगिक भेदभाव नहीं हो सकता है। सबरीमाला में कोर्ट ने सभी उम्र की महिलाओं के प्रवेश की अनुमति 4:1 से दी। इस पीठ की एकमात्र महिला जज इन्दु मल्होत्रा ने बहुमत के इस फ़ैसले के ख़िलाफ़ अपना फ़ैसला दिया। इस फ़ैसले की काफी दिनों से प्रतीक्षा की जा रही थी। [Indian Young Lawyer's Association & Ors. V. State of Kerala & Ors.]
समलैंगिकता
सुप्रीम कोर्ट ने अपने फ़ैसले से दो वयस्कों के बीच सहमति से समलैंगिक सम्बन्धों को आपराधिक मानने वाले 157 साल पुराने क़ानून को अंततः समाप्त कर दिया।ऐसा करते हुए कोर्ट ने आईपीसी की धारा 377 को असंवैधानिक क़रार दे दिया। यह फ़ैसला पाँच जजों की पीठ ने दिया। [Navtej Singh Johar& Ors. V. Union of India]
आधार
सुप्रीम कोर्ट की संविधान पीठ ने आधार अधिनियम की धारा 33(2), 47 और 57 को समाप्त कर दिया; इससे जुड़े राष्ट्रीय सुरक्षा के अपवाद को भी ग़ैरक़ानूनी क़रार दिया और यह कि निजी क्षेत्र आधार डाटा की माँग नहीं कर सकता। इस फ़ैसके को पीठ के लिए न्यायमूर्ति एके सीकरी ने लिखा जिसे मुख्य न्यायाधीश न्यायमूर्ति दीपक मिश्राऔर एएम खानविलकर की सम्मति प्राप्त थी। [Justice K. S. Puttuswamy (Retd.) and Anr V Union of India & Ors.]
व्यभिचार
इस फ़ैसले से भी सुप्रीम कोर्ट ने 158 साल पुराने इस क़ानून को समाप्त कर दिया। पीठ ने आईपीसी की धारा 497 को ग़ैरक़ानूनी क़रार दिया।इस क़ानून के द्वारा पति को किसी महिला का मालिक समझा जाता था। यह क़ानून व्यभिचार को ग़ैरक़ानूनी मानता था। हालाँकि, कोर्ट ने कहा है कि व्यभिचार को तलाक़ का आधार माना जाएगा। फ़ैसलेमें यह भी कहा गया कि अगर व्यभिचार के कारण पति या पत्नी आत्महत्या करने को उद्यत होते हैं तो व्यभिचार करने वाले पार्टनर को हत्या के लिए उकसाने के जुर्म में आईपीसी की धारा 306 के तहत सज़ा हो सकती है। [Joseph Shine V. Union of India]
इच्छामृत्यु
गरिमापूर्ण मौत का अधिकार एक मौलिक अधिकार है, इस फ़ैसले ने इस बात को माना। सुप्रीम कोर्ट की पीठ ने इस फ़ैसले में इच्छामृत्यु को सही ठहराया और मृत्यपूर्व वसीयत बनाकर इस बारे में निर्देश देने की अनुमति भी दे दी और कहा कि यह क़ानूनी रूप से वैध होगा। कोर्ट ने यह भी कहा कि गरिमापूर्वक जीना एक मौलिकअधिकार है और इसी तरह भयानक रूप से गम्भीर बीमारी से ग्रस्त और जिसके ठीक होने की कोई संभावना अब नहीं है ऐसे व्यक्ति के मरने की प्रक्रिया को आसान बनाना भी इसका हिस्सा है। [Common Cause (A Regd. Society) V. Union of India & Anr]
पदोन्नति में एससी/एसटी के लिए आरक्षण
सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट किया कि एससी/एसटी को सरकारी नौकरियों में पदोन्नति देने के मामले में आरक्षण देने के लिए क्वांटिफिएबल डाटा की ज़रूरत नहीं होगी। इससे पहले 2006 में नागराज मामले में अपने फ़ैसले में सुप्रीम कोर्ट ने कहा था कि इन्हें प्रोमोशन तभी दिया जा सकता है जब सरकार इनके पिछड़ेपन के बारे में क्वांटिफिएबल डाटा दे।पर कोर्ट ने इस मसले को किसी बड़ी पीठ को सौंपने से मना कर दिया। पाँच जजों की पीठ ने क्वांटिफिएबल डाटा की ज़रूरत को इंदिरा साहनी मामले में सुप्रीम के फ़ैसले के ख़िलाफ़ है। [Jarnail Singh v LachhmiNarain Gupta& Ors.]
आईपीसी की धारा 498A
सुप्रीम कोर्ट ने आईपीसी की धारा 498A के दुरुपयोग को रोकने के लिए राजेश शर्मा मामले में जो दिशानिर्देश जारी किए थे उसमें संशोधन किया और 'कल्याणकारी समिति' की बात को अब नकार दिया। तीन जजों की पीठ ने पहले दिए गए दिशानिर्देश को वापस ले लिया जिसे दो जजों की पीठ ने जारी किया था और जिसमें कहा गया थाकि आईपीसी की धारा 498A के तहत की गई शिकायत पर पहले परिवार कल्याण समिति ग़ौर करेगी और उसके बाद ही आगे की क़ानूनी कार्रवाई होगी। [Social Action Forum For Manav Adhikar V. Union of India]
हादिया
इस चर्चित मामले में दिए गए अपने फ़ैसले में सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि अपना धर्म बदलना इच्छानुरूप धर्म के चुनाव का मौलिक अधिकार है। सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले में अपने फ़ैसले में केरल हाईकोर्ट के फ़ैसले को उलट दिया जिसने हादिया और शफ़िन जहाँ की शादी को इस आधार पर अवैध क़रार दिया था कि शादी के लिए धर्म परिवर्तनकिया गया था। सुप्रीम कोर्ट ने अपने फ़ैसले में कहा कि हाईकोर्ट संविधान के अनुच्छेद 226 के तहत दोनों की शादी को ग़लत नहीं ठहरा सकता। हालाँकि, उसने NIA को इस मामले में अपनी जाँच जारी रखने को कहा। [Shafin Jahan V. Ashokan K. M. & Ors]
अयोध्या
🔥2
अपने इस विवादास्पद मामले में सुप्रीम कोर्ट की पीठ ने कहा कि इस्माइल फ़ारूक़ी मामले में जो बातें कही गई हैं उसे भूमि अधिग्रहण की प्रक्रिया के आलोक में देखा जाना चाहिए; कोर्ट ने यह भी कहा कि यह अयोध्या के भूमि विवाद मामले में संगत नहीं है। सुप्रीम कोर्ट ने यह फ़ैसला 2:1 से दिया और अयोध्या-राम जन्मभूमि विवाद को किसी बड़ी पीठ को सौंपने से मना कर दिया। इस मामले में बहुमत के इस फ़ैसले को न्यायमूर्ति अशोक भूषण ने अपने और मुख्य न्यायाधीश न्यायमूर्ति दीपक मिश्रा के लिए लिखा पर एक अन्य जज न्यायमूर्ति एस अब्दुल नज़ीर ने इस फ़ैसले के ख़िलाफ़ अपना फ़ैसला लिखा। बहुमत के फ़ैसले में कहा गया कि इस्माइल फ़ारूक़ी मामले में यह कहना कि मस्जिद इस्लाम का अभिन्न हिस्सा नहीं है, को भूमि अधिग्रहण की प्रक्रिया के संदर्भ में समझा जाना चाहिए। [M. Siddiq (D) THR LRS..Mahant Suresh Das & Ors.]
सुप्रीम कोर्ट की कार्यवाही का सीधा प्रसारण
कोर्ट की कार्यवाही का सीधा प्रसारण आम लोगों के हित में है। सुप्रीम कोर्ट की पीठ ने कहा कि संविधान के अनुच्छेद 145 के अधीन शीघ्र ही इसके लिए नियमों का निर्धारण किया जाएगा। [Swapnil Tripathi V. Supreme Court of India]
रफ़ाल
सुप्रीम कोर्ट ने 2015 में हुए रफ़ाल लड़ाकू विमान सौदे की जाँच की अपील की याचिका अस्वीकार कर दी। अदालत ने इस सौदे से सम्बंधित किसी भी पक्ष जैसे, निर्णय लेने की प्रक्रिया, मूल्य निर्धारण और ख़रीद की प्रक्रिया की जाँच की अपील स्वीकार नहीं की।कोर्ट ने कहा कि किस एक व्यक्ति की सोच के आधार पर कोर्ट कोईनिर्णय नहीं ले सकता। कोर्ट ने यह भी कहा कि किसी व्यक्तिगत तथ्यों या परिस्थितियों के आलोक में रक्षा ख़रीद के बारे में न्यायिक पुनरीक्षण का निर्धारण करना होगा। [Manohar Lal Sharma V. Narendra Damodar Das Modi & Ors.]
भीड़ हिंसा (LYNCHING)
कोर्ट ने भीड़ द्वारा देश भर में लोगों को मार दिए जाने की घटना की निंदा की और इस बारे में दिशानिर्देश जारी किए। न्यायमूर्ति दीपक मिश्रा की अध्यक्षता वाली पीठ ने कहा की भीड़ तंत्र की डरावनी गतिविधियों को देश में हावी होने की इजाज़त नहीं दी जा सकती हैं। [Tehseen S. Poonawalla V. Union of India & Ors.]
पटाखे चलाने के बारे में कोर्ट ने पटाखा चलाने पर पूर्ण प्रतिबंध लगाने से मना कर दिया;
पटाखों की ऑनलाइन बिक्री पर रोक लगा दी। कोर्ट ने कहा कि सिर्फ़ ऐसे व्यापारी ही इसकी बिक्री कर सकते हैं जिनके पास लाइसेंस है। इसके अलावा कोर्ट ने उस समय का निर्धारण भी कर दिया जिसके बीच पटाखा छोड़े जा सकते हैं। [Arjun Gopal & Ors. V. Union of India & Ors.]
बरी किए जाने के ख़िलाफ़ पीड़ित को अपील का अधिकार
एक महत्त्वपूर्ण फ़ैसले में सुप्रीम कोर्ट के न्यायमूर्ति मदन बी लोकुर, एस अब्दुल नज़ीर और दीपक गुप्ता की पीठ ने कहा कि अपील की विशेष अनुमति लिए बिना ही कोई पीड़ित किसी आरोपी के बरी होने के ख़िलाफ़ अपील कर सकता है। [Mallikarjun Kodagali (Dead) ... vs The State Of Karnataka]
इसरो के पूर्व वेज्ञानिक नांबी नारायण पर फ़ैसला
सुप्रीम कोर्ट ने इसरो के पूर्व वैज्ञानिक नांबी नारायण को ₹50 लाख का मुआवज़ा देने का आदेश दिया। कोर्ट ने सुप्रीम कोर्ट के पूर्व जज न्यायमूर्ति डीके जैन की अध्यक्षता में एक कमिटी का भी गठन कर दिया जिसे उनके ख़िलाफ़ साज़िश में पुलिस की भूमिका की जाँच का ज़िम्मा सौंपा गया। तीन जजों की पीठ ने उनकी याचिका पर यह फ़ैसला सुनाया जिन्होंने अपने ख़िलाफ़ केरल पुलिस के शीर्ष अधिकारियों की साज़िश के विरुद्ध कार्रवाई करने की माँग की थी। उन्होंने आरोप लगाया था कि पुलिस ने उनको यातना भी दी थी और उन्हें ग़ैर क़ानूनी ढंग से जेल में बंद कर दिया था। [S. Nambi Narayanan V. Siby Mathews &Ors.]
जज लोया के मौत का विवाद
सुप्रीम कोर्ट की पीठ ने जज लोया के मौत की जाँच कराने के बारे में दायर याचिका को ख़ारिज कर दिया। सुप्रीम कोर्ट के मुख्य न्यायाधीश न्यायमूर्ति दीपक मिश्रा की अध्यक्षता में न्यायमूर्ति डीवाई चंद्रचूड़ और एएम खानविलकर की तीन जजों की पीठ ने सीबीआई के विशेष जज की मौत के इस मामले में दायर कई याचिकाओं पर सुनवाई करते हुएइस मामले की स्वतंत्र जाँच की अर्ज़ी ख़ारिज कर दी। [TehseenPoonawalla V. Union of India & Anr.]
एलजी बनाम दिल्ली सरकार
इस मामले में सुप्रीम कोर्ट की संविधान पीठ ने कहा कि दिल्ली के उप राज्यपाल को दिल्ली सरकार के मंत्रिमंडल की सलाह के अनुरूप कार्य करना होगा। सिर्फ़ भूमि, पुलिस और आम व्यवस्था के मामले में ही उसको अपने विवेक से निर्णय लेने का अधिकार है। पीठ ने कहा कि एलजी हर मामले में अपनी टाँग नहीं अड़ा सकता है।हालाँकि, कोर्ट ने कहा कि एलजी को सरकार के निर्णय के बारे में बताना ज़रूरी है पर हर मामलों में एलजी की अनुमति लेने की ज़रूरत नहीं हैं। कोर्ट ने अपने निर्णय
सुप्रीम कोर्ट की कार्यवाही का सीधा प्रसारण
कोर्ट की कार्यवाही का सीधा प्रसारण आम लोगों के हित में है। सुप्रीम कोर्ट की पीठ ने कहा कि संविधान के अनुच्छेद 145 के अधीन शीघ्र ही इसके लिए नियमों का निर्धारण किया जाएगा। [Swapnil Tripathi V. Supreme Court of India]
रफ़ाल
सुप्रीम कोर्ट ने 2015 में हुए रफ़ाल लड़ाकू विमान सौदे की जाँच की अपील की याचिका अस्वीकार कर दी। अदालत ने इस सौदे से सम्बंधित किसी भी पक्ष जैसे, निर्णय लेने की प्रक्रिया, मूल्य निर्धारण और ख़रीद की प्रक्रिया की जाँच की अपील स्वीकार नहीं की।कोर्ट ने कहा कि किस एक व्यक्ति की सोच के आधार पर कोर्ट कोईनिर्णय नहीं ले सकता। कोर्ट ने यह भी कहा कि किसी व्यक्तिगत तथ्यों या परिस्थितियों के आलोक में रक्षा ख़रीद के बारे में न्यायिक पुनरीक्षण का निर्धारण करना होगा। [Manohar Lal Sharma V. Narendra Damodar Das Modi & Ors.]
भीड़ हिंसा (LYNCHING)
कोर्ट ने भीड़ द्वारा देश भर में लोगों को मार दिए जाने की घटना की निंदा की और इस बारे में दिशानिर्देश जारी किए। न्यायमूर्ति दीपक मिश्रा की अध्यक्षता वाली पीठ ने कहा की भीड़ तंत्र की डरावनी गतिविधियों को देश में हावी होने की इजाज़त नहीं दी जा सकती हैं। [Tehseen S. Poonawalla V. Union of India & Ors.]
पटाखे चलाने के बारे में कोर्ट ने पटाखा चलाने पर पूर्ण प्रतिबंध लगाने से मना कर दिया;
पटाखों की ऑनलाइन बिक्री पर रोक लगा दी। कोर्ट ने कहा कि सिर्फ़ ऐसे व्यापारी ही इसकी बिक्री कर सकते हैं जिनके पास लाइसेंस है। इसके अलावा कोर्ट ने उस समय का निर्धारण भी कर दिया जिसके बीच पटाखा छोड़े जा सकते हैं। [Arjun Gopal & Ors. V. Union of India & Ors.]
बरी किए जाने के ख़िलाफ़ पीड़ित को अपील का अधिकार
एक महत्त्वपूर्ण फ़ैसले में सुप्रीम कोर्ट के न्यायमूर्ति मदन बी लोकुर, एस अब्दुल नज़ीर और दीपक गुप्ता की पीठ ने कहा कि अपील की विशेष अनुमति लिए बिना ही कोई पीड़ित किसी आरोपी के बरी होने के ख़िलाफ़ अपील कर सकता है। [Mallikarjun Kodagali (Dead) ... vs The State Of Karnataka]
इसरो के पूर्व वेज्ञानिक नांबी नारायण पर फ़ैसला
सुप्रीम कोर्ट ने इसरो के पूर्व वैज्ञानिक नांबी नारायण को ₹50 लाख का मुआवज़ा देने का आदेश दिया। कोर्ट ने सुप्रीम कोर्ट के पूर्व जज न्यायमूर्ति डीके जैन की अध्यक्षता में एक कमिटी का भी गठन कर दिया जिसे उनके ख़िलाफ़ साज़िश में पुलिस की भूमिका की जाँच का ज़िम्मा सौंपा गया। तीन जजों की पीठ ने उनकी याचिका पर यह फ़ैसला सुनाया जिन्होंने अपने ख़िलाफ़ केरल पुलिस के शीर्ष अधिकारियों की साज़िश के विरुद्ध कार्रवाई करने की माँग की थी। उन्होंने आरोप लगाया था कि पुलिस ने उनको यातना भी दी थी और उन्हें ग़ैर क़ानूनी ढंग से जेल में बंद कर दिया था। [S. Nambi Narayanan V. Siby Mathews &Ors.]
जज लोया के मौत का विवाद
सुप्रीम कोर्ट की पीठ ने जज लोया के मौत की जाँच कराने के बारे में दायर याचिका को ख़ारिज कर दिया। सुप्रीम कोर्ट के मुख्य न्यायाधीश न्यायमूर्ति दीपक मिश्रा की अध्यक्षता में न्यायमूर्ति डीवाई चंद्रचूड़ और एएम खानविलकर की तीन जजों की पीठ ने सीबीआई के विशेष जज की मौत के इस मामले में दायर कई याचिकाओं पर सुनवाई करते हुएइस मामले की स्वतंत्र जाँच की अर्ज़ी ख़ारिज कर दी। [TehseenPoonawalla V. Union of India & Anr.]
एलजी बनाम दिल्ली सरकार
इस मामले में सुप्रीम कोर्ट की संविधान पीठ ने कहा कि दिल्ली के उप राज्यपाल को दिल्ली सरकार के मंत्रिमंडल की सलाह के अनुरूप कार्य करना होगा। सिर्फ़ भूमि, पुलिस और आम व्यवस्था के मामले में ही उसको अपने विवेक से निर्णय लेने का अधिकार है। पीठ ने कहा कि एलजी हर मामले में अपनी टाँग नहीं अड़ा सकता है।हालाँकि, कोर्ट ने कहा कि एलजी को सरकार के निर्णय के बारे में बताना ज़रूरी है पर हर मामलों में एलजी की अनुमति लेने की ज़रूरत नहीं हैं। कोर्ट ने अपने निर्णय
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में यह भी कहा कि दिल्ली 'राज्य' नहीं है और उसको संविधान के तहत विशेष अधिकार मिला हुआ है। [Govt. of NCT of Delhi V. Union of India & Anr.]
छह माह से अधिक का स्थगन नहीं
न्यायमूर्ति आदर्श कुमार गोयल की अध्यक्षता में
छह माह से अधिक का स्थगन नहीं
न्यायमूर्ति आदर्श कुमार गोयल की अध्यक्षता में
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Legal Update.pdf
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PLR Project Ltd vs Mahanadi Coalfields Pvt. Ltd. 2019 ( 3 Judges Bench)
Collegium Recommendations.✍✅Difference between Appeal vs revision and Reference vs Revision under code of criminal procedure, 1973
✓ Lachhman dass v. santokh singh,
1995
✓ State of kerala v. K.M. charia
abdullah, 1965
✓ Associated cement co. Ltd. v.
keshavanand, 1998
🤝 #Section_395_crpc and
#Section_396_crpc - Reference
⏫ #Section_372_crpc to #Section_394_crpc - Appeal
🙅♂️ #Section_397_crpc to #Section_402_crpc - Revision
👉Difference between Review, Revision & Appeal in CPC
https://t.me/CurrentLegalGK/323
🤔Why there is No review in Criminal Law❓ comment 👇
✓ Lachhman dass v. santokh singh,
1995
✓ State of kerala v. K.M. charia
abdullah, 1965
✓ Associated cement co. Ltd. v.
keshavanand, 1998
🤝 #Section_395_crpc and
#Section_396_crpc - Reference
⏫ #Section_372_crpc to #Section_394_crpc - Appeal
🙅♂️ #Section_397_crpc to #Section_402_crpc - Revision
👉Difference between Review, Revision & Appeal in CPC
https://t.me/CurrentLegalGK/323
🤔Why there is No review in Criminal Law❓ comment 👇
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Can A Juvenile In Conflict With The Law Seek Anticipatory Bail Under S. 438 Cr.PC? Supreme Court To Consider
https://www.livelaw.in/top-stories/can-a-juvenile-in-conflict-with-the-law-seek-anticipatory-bail-under-s-438-crpc-supreme-court-to-consider-239911
https://www.livelaw.in/top-stories/can-a-juvenile-in-conflict-with-the-law-seek-anticipatory-bail-under-s-438-crpc-supreme-court-to-consider-239911
www.livelaw.in
Can A Juvenile In Conflict With The Law Seek Anticipatory Bail Under S. 438 Cr.PC? Supreme Court To Consider
The Supreme Court is set to consider the question of whether an Anticipatory Bail filed under Sec
38686201011150147529judgement09-oct-2023-497709.pdf
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Common intention v common object
Chandra Pratap Singh v State of M.P 2023
Use this type of langauge in your answer
“A clear distinction is made out between common intention and common object in that common intention denotes action in concert and necessarily postulates the existence of a prearranged plan implying a prior meeting of the minds, while common object does not necessarily require proof of prior meeting of minds or preconcert.
Chandra Pratap Singh v State of M.P 2023
Use this type of langauge in your answer
“A clear distinction is made out between common intention and common object in that common intention denotes action in concert and necessarily postulates the existence of a prearranged plan implying a prior meeting of the minds, while common object does not necessarily require proof of prior meeting of minds or preconcert.
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Accused need not prove the existence of private self-defence beyond reasonable doubt
The court also noticed several judgments including
#BNS@CurrentLegalGK
The court also noticed several judgments including
Rizan and Another v. State of Chhattisgarh through the Chief Secretary, in which it was held that the accused need not prove the existence of private self-defence beyond reasonable doubt and that it would suffice if he could show that the preponderance of probabilities is in favour of his plea, just as in a civil case. #BNS@CurrentLegalGK
❤3🔥1
If the accused is already shown to witness the Sanctity of test identification parade is doubtful
#CurrentLegalGK
#CurrentLegalGK
The origins of “Justice must be seen to be done”
https://www.barandbench.com/columns/the-origins-of-justice-must-be-seen-to-be-done
https://www.barandbench.com/columns/the-origins-of-justice-must-be-seen-to-be-done
Bar and Bench - Indian Legal news
The origins of “Justice must be seen to be done”
Few sentences have been quoted more often than the aphorism: “Justice must not only be done, but must also be seen to be done”. This dictum was laid down by Lor