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𝙱𝚑𝚎𝚎𝚔𝚑 𝚖𝚊𝚐𝚗𝚎 𝚙𝚊𝚛 𝚋𝚑𝚒 𝚗𝚊 𝚖𝚒𝚕𝚎
𝚁𝚘𝚗𝚎 𝚙𝚊𝚛 𝚋𝚑𝚒 𝚗𝚊𝚊 𝚖𝚎
𝙺𝚒𝚝𝚗𝚎 𝚋𝚑𝚒 𝚔𝚊𝚛𝚝𝚎 𝚑𝚘 𝚗𝚊𝚑𝚒 𝚖𝚒𝚕𝚎𝚐𝚊
.
𝚁𝚘 𝚕𝚘, 𝚔𝚒𝚝𝚗𝚎 𝚋𝚑𝚒 𝚔𝚊𝚛 𝚕𝚘, 𝚋𝚑𝚒𝚔𝚑 𝚖𝚊𝚗𝚐 𝚕𝚘 𝚗𝚊𝚑𝚒 𝚖𝚒𝚕𝚎𝚐𝚊
. 𝙱𝚊𝚜 𝚢𝚎𝚑𝚒 𝚖𝚒𝚕𝚎𝚐𝚊 𝚢𝚊𝚍𝚎 𝚛𝚘𝚗𝚊
𝙶𝚊𝚗𝚘 𝚔𝚊 𝚊𝚌𝚑𝚊 𝚔𝚊𝚜𝚊 𝚕𝚒𝚜𝚝 𝚢𝚊𝚊𝚍 𝚑𝚘 𝚓𝚊𝚢𝚎𝚐𝚊,
𝙰𝚞𝚛 𝚝𝚞𝚖 𝚑𝚎 𝚜𝚊𝚖𝚓𝚑 𝚖𝚎 𝚗𝚊𝚑𝚒 𝚊𝚊𝚢𝚎𝚐𝚊 𝚢𝚎 𝚀 𝚑𝚘 𝚛𝚊𝚑𝚊 𝚋𝚊𝚜 𝚊𝚙𝚗𝚎 𝚔𝚒𝚜𝚖𝚊𝚝 𝚔𝚘 𝚔𝚘𝚜𝚘 𝚐𝚎,
𝙽𝚊 𝚍𝚒𝚗 𝚗𝚊 𝚛𝚊𝚊𝚝 𝚋𝚊𝚜 , 𝚢𝚎𝚑𝚒 𝚜𝚘𝚌𝚑𝚘 𝚐𝚎 𝚀 𝚍𝚒𝚢𝚊 𝚍𝚊𝚛𝚍 𝚖𝚞𝚓𝚑𝚎 𝚜𝚊𝚖𝚓𝚑 𝚗𝚊𝚊 𝚙𝚊𝚘𝚐𝚎,
.
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#depression #marneKaPalan
#ashu #etc
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𝚁𝚘𝚗𝚎 𝚙𝚊𝚛 𝚋𝚑𝚒 𝚗𝚊𝚊 𝚖𝚎
𝙺𝚒𝚝𝚗𝚎 𝚋𝚑𝚒 𝚔𝚊𝚛𝚝𝚎 𝚑𝚘 𝚗𝚊𝚑𝚒 𝚖𝚒𝚕𝚎𝚐𝚊
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𝚁𝚘 𝚕𝚘, 𝚔𝚒𝚝𝚗𝚎 𝚋𝚑𝚒 𝚔𝚊𝚛 𝚕𝚘, 𝚋𝚑𝚒𝚔𝚑 𝚖𝚊𝚗𝚐 𝚕𝚘 𝚗𝚊𝚑𝚒 𝚖𝚒𝚕𝚎𝚐𝚊
. 𝙱𝚊𝚜 𝚢𝚎𝚑𝚒 𝚖𝚒𝚕𝚎𝚐𝚊 𝚢𝚊𝚍𝚎 𝚛𝚘𝚗𝚊
𝙶𝚊𝚗𝚘 𝚔𝚊 𝚊𝚌𝚑𝚊 𝚔𝚊𝚜𝚊 𝚕𝚒𝚜𝚝 𝚢𝚊𝚊𝚍 𝚑𝚘 𝚓𝚊𝚢𝚎𝚐𝚊,
𝙰𝚞𝚛 𝚝𝚞𝚖 𝚑𝚎 𝚜𝚊𝚖𝚓𝚑 𝚖𝚎 𝚗𝚊𝚑𝚒 𝚊𝚊𝚢𝚎𝚐𝚊 𝚢𝚎 𝚀 𝚑𝚘 𝚛𝚊𝚑𝚊 𝚋𝚊𝚜 𝚊𝚙𝚗𝚎 𝚔𝚒𝚜𝚖𝚊𝚝 𝚔𝚘 𝚔𝚘𝚜𝚘 𝚐𝚎,
𝙽𝚊 𝚍𝚒𝚗 𝚗𝚊 𝚛𝚊𝚊𝚝 𝚋𝚊𝚜 , 𝚢𝚎𝚑𝚒 𝚜𝚘𝚌𝚑𝚘 𝚐𝚎 𝚀 𝚍𝚒𝚢𝚊 𝚍𝚊𝚛𝚍 𝚖𝚞𝚓𝚑𝚎 𝚜𝚊𝚖𝚓𝚑 𝚗𝚊𝚊 𝚙𝚊𝚘𝚐𝚎,
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#depression #marneKaPalan
#ashu #etc
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👍1
अंजान लोग
अचानक से मिले थे
एक दूसरे में खो गए थे
दो अंजान लोग
ना वो उसको जनता था
ना वो उसको जानती थी
मगर फिर भी एक दूसरे का हाथ थाम चुके थे
दो अंजान लोग
दोनो एक दूसरे के बहुत कम वक्त में बेहद करीब हो चुके थे
दोनो एक दूसरे की जान बन चुके थे
दो अंजान लोग
एक रात का है वाकिया जो में लिख के बयान नही कर सकता था
बस महसूस करके थोड़ा शोर मचा सकता था
मगर वो खामोशी पसंद था
मुझे भी खामोश रखा चाहता था
छोड़ के मुझे खामोश कर गया था
दो अंजान लोग
दोनो की मंजिल अलग अलग थी
मगर दोनो एक दूसरे के साथ सफर में ऐसे थे जैसे मंजिल एक हो
दो अंजान लोग
एक पागल था बत्तमीज़ बद्दलिहाज था
दूसरा बे इंतेहाई शरीफ और समझदार था
उन्हें खुद नही पता खुदा उनसे किया चाहता है
वो खुद मिलने के बाद सोच में थे
दो अंजान लोग
जब तक एक दूसरे को देख नही लेते थे
कालजे पे ठंडक नही पड़ती थी
एक दूसरी की आवाज़ सुने बिना दिन की शुरुआत नहीं होती थी
ना जाने कब वो बातो बातो में प्यार की बाते करने लगे थे
ना जाने कब वो दोनो इश्क कर बैठे थे
दो अंजान लोग
फिर एक वक्त ऐसा आया जिसमे से एक को छोड़ को जाना पड़ा था
दूसरे को तड़पा हुआ बिलखता हुआ रोते हुए हाथ जोड़ते रहे गया था....
दो अंजान लोग
वो जाते हुए बहुत सारी दुआ और यादें छोड़ गया
वो दूसरा शायरी में अपने जज़्बात ज़ाहिर करता रहे गया था
दो अंजान लोग
वो छोड़ के मुझे अपनी दुनिया में मशरूफ हो गया था
और में बस काग़ज़ कलम में गजलों नज्मों शायरी में लिपट के रहे गया था....
दो अंजान लोग....!
अचानक से मिले थे
एक दूसरे में खो गए थे
दो अंजान लोग
ना वो उसको जनता था
ना वो उसको जानती थी
मगर फिर भी एक दूसरे का हाथ थाम चुके थे
दो अंजान लोग
दोनो एक दूसरे के बहुत कम वक्त में बेहद करीब हो चुके थे
दोनो एक दूसरे की जान बन चुके थे
दो अंजान लोग
एक रात का है वाकिया जो में लिख के बयान नही कर सकता था
बस महसूस करके थोड़ा शोर मचा सकता था
मगर वो खामोशी पसंद था
मुझे भी खामोश रखा चाहता था
छोड़ के मुझे खामोश कर गया था
दो अंजान लोग
दोनो की मंजिल अलग अलग थी
मगर दोनो एक दूसरे के साथ सफर में ऐसे थे जैसे मंजिल एक हो
दो अंजान लोग
एक पागल था बत्तमीज़ बद्दलिहाज था
दूसरा बे इंतेहाई शरीफ और समझदार था
उन्हें खुद नही पता खुदा उनसे किया चाहता है
वो खुद मिलने के बाद सोच में थे
दो अंजान लोग
जब तक एक दूसरे को देख नही लेते थे
कालजे पे ठंडक नही पड़ती थी
एक दूसरी की आवाज़ सुने बिना दिन की शुरुआत नहीं होती थी
ना जाने कब वो बातो बातो में प्यार की बाते करने लगे थे
ना जाने कब वो दोनो इश्क कर बैठे थे
दो अंजान लोग
फिर एक वक्त ऐसा आया जिसमे से एक को छोड़ को जाना पड़ा था
दूसरे को तड़पा हुआ बिलखता हुआ रोते हुए हाथ जोड़ते रहे गया था....
दो अंजान लोग
वो जाते हुए बहुत सारी दुआ और यादें छोड़ गया
वो दूसरा शायरी में अपने जज़्बात ज़ाहिर करता रहे गया था
दो अंजान लोग
वो छोड़ के मुझे अपनी दुनिया में मशरूफ हो गया था
और में बस काग़ज़ कलम में गजलों नज्मों शायरी में लिपट के रहे गया था....
दो अंजान लोग....!
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