📕 अमित शाह ने लॉन्च की भारत की पहली सहकारी टैक्सी सेवा ‘भारत टैक्सी’
👉केंद्रीय गृह एवं सहकारिता मंत्री Amit Shah ने भारत की पहली सहकारी (Cooperative) टैक्सी सेवा ‘भारत टैक्सी’ का शुभारंभ किया।
‘भारत टैक्सी’ की प्रमुख विशेषताएँ
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👉केंद्रीय गृह एवं सहकारिता मंत्री Amit Shah ने भारत की पहली सहकारी (Cooperative) टैक्सी सेवा ‘भारत टैक्सी’ का शुभारंभ किया।
‘भारत टैक्सी’ की प्रमुख विशेषताएँ
• देश की पहली कोऑपरेटिव आधारित टैक्सी सेवा
• ड्राइवर ही होंगे सहकारी समिति के सदस्य
• मुनाफे का लाभ सीधे ड्राइवरों को
• पारदर्शी और सस्ती सेवा का उद्देश्य
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📕 सुप्रीम कोर्ट ने अनुच्छेद 21 के तहत पीरियड्स हेल्थ को मौलिक अधिकार घोषित किया
👉 अनुच्छेद 21, Constitution of India के अंतर्गत “जीवन और व्यक्तिगत स्वतंत्रता के अधिकार” की गारंटी देता है।
👉अब इसमें मासिक धर्म स्वास्थ्य और स्वच्छता को भी गरिमापूर्ण जीवन का हिस्सा माना गया है।
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👉 अनुच्छेद 21, Constitution of India के अंतर्गत “जीवन और व्यक्तिगत स्वतंत्रता के अधिकार” की गारंटी देता है।
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वह पथ क्या, पथिक कुशलता क्या,
जिस पथ पर बिखरे शूल न हों,
नाविक की धैर्य परीक्षा क्या,
जब धाराएँ प्रतिकूल न हों।
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जिस पथ पर बिखरे शूल न हों,
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👉UP B.ed 2026 का आवेदन शुरू हो गया है ,जिसको भी करना है वो आवेदन कर दे
👉GEN,OBC,OTHER STATE वालों के लिए शुल्क 1650 rs
👉SC/ST 850 rs
📕प्रस्तावनाः संविधान का हिस्सा है या नहीं
बेरुबारी मामले में (1960):
गोलकनाथ बनाम पंजाब 1967
केशवानंद भारती मामले (1973) में:
एलआईसी ऑफ इंडिया केस (1995)
ने प्रस्तावना को बरकरार रखा और कहा कि यह संविधान का एक अभिन्न अंग है।
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बेरुबारी मामले में (1960):
प्रस्तावना संविधान का हिस्सा नहीं है।
गोलकनाथ बनाम पंजाब 1967
वाद में उद्देशिका संविधान की मूल आत्मा है
केशवानंद भारती मामले (1973) में:
सुप्रीम कोर्ट ने पहले की राय को खारिज कर दिया और कहा कि प्रस्तावना संविधान का एक हिस्सा है और इसमें संशोधन किया जा सकता है, बशर्ते कि बुनियादी सुविधाओं में कोई संशोधन नहीं किया गया हो।।
यह संविधान की सच्ची भावना की व्याख्या करने के लिए एक महत्वपूर्ण मार्गदर्शक है
एलआईसी ऑफ इंडिया केस (1995)
ने प्रस्तावना को बरकरार रखा और कहा कि यह संविधान का एक अभिन्न अंग है।
प्रस्तावना न तो विधायिका की शक्ति का स्रोत है और न ही विधायिका की शक्ति पर रोक है। यह न्यायोचित नहीं है, अर्थात इसके प्रावधान कानून की अदालत में लागू करने योग्य नहीं हैं।
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