काश और ख़ैर के बीच का फ़र्क़ बस इतना है कि
काश तू होती,
ख़ैर ये ज़िंदगी कंबख़्त बस तेरा ग़म ही देती।
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आपसे मिल के हम कुछ बदल से गए।
इस घड़ियाल की घड़ियाँ अब कुछ थमने से लगीं,
तुम्हारे आने से जिस्म की तरंगें कुछ छिड़ने-सी लगी हैं।
अब किसे बताऊँ क्या होने लगा है मुझमें?
बस ये ज़िंदगी अब कुछ अपनी-अपनी-सी लगने लगी है।
कभी जो बोझ थीं साँसें, अब वो महसूस होती हैं,
तुम्हारी एक नज़र से ख़ामोशियाँ भी बोलती हैं।
मैं जो ख़ुद से भागता फिरता था सदियों से,
तुम्हारे साथ चलकर मंज़िल पहचानने लगा हूँ मैं।
दिल जो पत्थर था, उसे एहसास तुमने दिया,
टूटकर भी मुस्कुराने का हौसला तुमने दिया।
अगर ये ख़्वाब है, तो टूटने न देना इसे,
क्योंकि पहली दफ़ा ज़िंदगी ने मुझे अपना-सा लगाया है।
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वो गर्मियों की छांव थी, वो सर्दियों की धूप थी।